Wednesday, Apr 25, 2018

ब्लॉग :दयाल सिंह मजीठिया खुद ‘वंदे मातरम्’ का साकार रूप थे

  • Updated on 12/9/2017

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। कई लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है? लेकिन यदि हम अपने राजनीतिज्ञों, शिक्षाविदों एवं सार्वजनिक हस्तियों के एक खास वर्ग द्वारा नए नामकरण के प्रति अवांछित उत्साह के संदर्भ में देखें तो शायद सब कुछ नाम में ही होता है। 18 नवम्बर के उस निर्णय को ही लें जिसके अंतर्गत  दिल्ली यूनिवर्सिटी के सहशिक्षा संस्थान ‘दयाल सिंह ईवनिंग कालेज’ की गवर्निंग बाडी ने इसका नाम बदलकर वंदे मातरम् ईवनिंग कालेज रख दिया था। 

मैं यह नहीं जानता कि यह किसके दिमाग की कारस्तानी है। कालेज के प्रधानाचार्य कहते हैं कि यह निर्णय  किसी ‘राजनीतिक व्यक्ति के दबाव’ के बिना लिया गया था। मैं निश्चय से नहीं कह सकता कि कालेज के प्रधानाचार्य को गवर्निंग बाडी की ओर से ‘सच्चाई’ बोलने का अधिकार दिया गया था या नहीं। 

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यह कोई लुकी-छिपी बात नहीं कि आजकल भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में कुछ भी ‘गुप्त’ राजनीतिक या पंथक एजैंडे के बिना नहीं होता। फिर भी मैं यह अवश्य कहूंगा कि गवर्निंग बाडी के सदस्यों ने संस्थान का नाम बदलकर वंदे मातरम् की भावना को बहुत आहत किया है। या तो वह सरदार दयाल सिंह मजीठिया द्वारा पीछे छोड़ी गई शिक्षा एवं ज्ञान निर्माण की 
विरासत के बारे में कुछ नहीं जानते या फिर वह सीधे शब्दों में कुछ वाहवाही बटोरने के लिए राजनीतिक आकाओं का हुक्म बजा रहे हैं। 

गवर्निंग बाडी को यह स्मरण करने की जरूरत है कि दयाल सिंह ने जो काम इस देश में पहली बार किया वह वंदे मातरम् की असली भावना का ही साकार रूप है। वह भारत के प्रथम कोटि के दूरद्रष्टाओं में से एक थे जो अपने समय से बहुत आगे थे। उन्होंने पंजाब नैशनल बैंक जैसा सफल बैंकिंग संस्थान स्थापित करने में निर्णायक भूमिका अदा की थी। दयाल सिंह कालेज और दयाल सिंह लाइबे्ररी की स्थापना उनकी मृत्यु के बाद उनके द्वारा विरासत में निर्धारित कोष में से की गई थी। 

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द ट्रिब्यून की स्थापना 1881 में लाहौर में की गई थी और यह अविभाजित पंजाब के लोगों में सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक जागृति पैदा करने के उनके विराट स्वप्न का हिस्सा थी। ब्रिटिश शासन दौरान इस अखबार ने सामाजिक, आॢथक व राजनीतिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई थी और जागरूक जनमत विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। 
मेरे मन में सरदार दयाल सिंह मजीठिया के प्रति अगाध सम्मान और श्रद्धा है क्योंकि 20 वर्षों तक ‘द ट्रिब्यून’ से मेरा करीबी रिश्ता रहा है-पहले 11 वर्ष तक सहायक सम्पादक के रूप में और फिर 9 वर्ष तक सम्पादक के रूप में। मैं गर्व से यह उद्घोष कर सकता हूं कि भारत की स्वतंत्रता में अग्रणी भूमिका अदा करने के साथ-साथ ‘द ट्रिब्यून’ ने सदैव ‘‘उदारवादी, नैतिक व लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों का झंडा बुलंद रखा है और प्रगतिशील व आधुनिक तर्ज पर समाज के पुनॢनर्माण और राष्ट्रीय एकता का पक्षधर रहा है।’’ दयाल सिंह की पथप्रदर्शक भावना ‘द ट्रिब्यून ट्रस्ट’ के अखबारों के माध्यम से आज भी प्रवाहित हो रही है। 

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सर सैयद अहमद खान के समकालीन मौलवी सैयद इकबाल अली ने दयाल सिंह के बारे में कहा था : ‘‘सच्ची बात यह है कि केवल लाहौर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण पंजाब में यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जिसकी सच्चाई पर सारा भारत गर्व कर सकता है तो वह हैं दयाल सिंह मजीठिया।

दयाल सिंह के घनिष्ठ मित्र जोगेन्द्र चंद्र बोस ने उन्हें ‘‘पंजाब के शिक्षण समुदाय का नेता’’ की संज्ञा दी थी।  ट्रिब्यून के 130 वर्ष पूरे होने के मौके पर प्रोफैसर वी.एन. दत्ता ने लिखा : ‘‘दयाल सिंह ने जिस भी काम की योजना बनाई उसे अंजाम तक पहुंचाया। वह सचमुच में पंजाब में एक नए युग के संदेशवाहक थे। उन्होंने 20वीं शताब्दी के पहले 15 वर्षों दौरान पंजाब में ‘नरमपंथियों’ के केन्द्र बिंदू के रूप में काम किया। अपने समय में उन्हें जितना सम्मान मिला वह आश्चर्यजनक है। वह सचमुच में देश की अग्रणी हस्तियों में से एक थे।’’

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मैं दयाल सिंह ईवनिंग कालेज की गवर्निंग बाडी के कल्याण हेतु यह स्मरण करवाना चाहता हूं कि जागरूक जनमत का सृजन करने और पुस्तकालयों के निर्माण के माध्यम से उन्होंने विद्या और ज्ञान को बढ़ावा देने में ऐेतिहासिक भूमिका अदा की थी। दिल्ली में 1959 में स्थापित किए गए इस कालेज के सरपरस्तों को शायद शिक्षा क्षेत्र की एक दंत कथाओं जैसी विभूति के बारे में सही जानकारी ही नहीं है। दयाल सिंह के बारे में सबसे सटीक टिप्पणी यह है कि वह ‘‘परम्परा और आधुनिकता का सुमेल थे।’’
मेरा नुक्ता बिल्कुल सरल है: एक गवर्निंग बाडी के सदस्यों ने उस महान आत्मा की समृद्ध धरोहर का नामोनिशां मिटाने की हिमाकत क्यों की जोकि हमारी मातृभूमि के गीत ‘वंदे मातरम्’ की भावना का पूरी तरह प्रतिनिधित्व करते थे? दयाल सिंह का सम्पूर्ण जीवन व भारतीय समाज को उनका योगदान मातृभूमि की स्तुति में खुद एक जीवंत भजन जैसा है। मेरा गवर्निंग बाडी से विनम्र निवेदन है कि वह अपने फैसले पर फिर से गौर फरमाए और फिर से उलटा घुमाए। 

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दयाल सिंह वंदे मातरम् की भावना का बिल्कुल उन अर्थों में प्रतिनिधित्व करते हैं जिन अर्थों में महर्षि अरविंद ने इसे जाना था। इस भावना की किसी भी कीमत पर हत्या नहीं होनी चाहिए। गवर्निंग बाडी द्वारा उठाया गया कदम निरक्षरता से मुक्ति हासिल करने के भारत के संघर्ष की भावना के ही विरुद्ध जाता है। 

इसे हमारी बदनसीबी ही कहा जा सकता है कि ‘‘विद्वान लोग’’ भी अक्सर नाम बदलने की जादूगरी का आसान-सा रास्ता अपनाने के झांसे में आ जाते हैं, बिना यह सोचे-समझे कि किसी महान आत्मा ने देश की भलाई के लिए कितना बड़ा योगदान दिया है। शिक्षा और ज्ञान सृजन के महान कार्य नाम बदलने की नौटंकियों द्वारा अंजाम नहीं दिए जा सकते। 
कालेज की गवॄनग बाडी के माननीय सदस्यों की जानकारी हेतु मैं सुरेन्द्र नाथ बनर्जी के वे शब्द स्मरण करवाना चाहूंगा जो उन्होंने अपने संस्मरणों में अपने करीबी सहयोगी दयाल सिंह के बारे में लिखे थे।

(द ट्रिब्यून) पंजाब को दयाल सिंह मजीठिया का कोई इकलौता उपहार नहीं है। उनके पास तो जो कुछ था, उन्होंने सब कुछ देश के कल्याण हेतु लगा दिया और दयाल सिंह कालेज पंजाब के सबसे होनहार सपूतों में से एक की शाश्वत यादगार है जिसकी मौत पर पंजाब के साथ-साथ पूरे भारत ने भी शोक मनाया था।

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दयाल सिंह कालेज के स्थापना दिवस के मौके पर 3 मई 1910 को लाहौर में पंजाब के लै. गवर्नर सर लुई विलियम डेन ने उनकी राष्ट्रभक्ति और जनकल्याण की भावना की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। 100 सवालों का एक सवाल यह है कि एक देशभक्त तथा दूरद्रष्टा संस्थान के निर्माता का नाम मिटाने में उसी की याद में बने हुए ईवनिंग कालेज के सरपरस्त क्यों शामिल हुए जोकि आज और कल के विद्यार्थियों की कई पीढ़ियों के लिए प्रेरक बना रहेगा? यह भी स्मरण रखने योग्य है कि देशभक्ति केवल नारेबाजी मात्र नहीं है।

यह अपने विशाल समाज के भले में कुछ सृजनात्मक और परोपकारी कार्य होता है। महान लोगों के कृतत्व पर पर्दापोशी करने से कोई राष्ट्र महान नहीं बन सकता और न ही इससे शिक्षा एवं समाज कल्याण को ही शक्ति मिल सकती है। 

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