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blog: how many zombies are concerned about media!

BLOG: मीडिया को लेकर कितनी जजमेंटल हैं कंगना!

  • Updated on 7/17/2019

आज के दौर में मीडिया की मौजूदगी वैसी ही है जैसे कहा जाता है- जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। रुपहले पर्दे पर अपने जलवे से सबको कायल कर चुकी कंगना को अब न तो खनकने की जरुरत है और न किसी निर्माता के दरवाजे पर दोड़ने की आवश्यकता है। हां अगर कंगना ठुमकती है तो मीडिया वालों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। ठुमकना तो खैर उनके पेशे का हिस्सा है, उसमें कुछ भी बुराई नहीं है।

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हिमाचल प्रदेश के एक छोटे शहर से उठकर मुंबई तक का सफर एक महिला के लिए अब मुश्किल नहीं है लेकिन कंपीटिशन के इस दौर में अपना जगह बनाना इतना आसान भी नहीं है। खासकरके जब हम महिला के परिपेक्ष्य में बात करते है। जैसा कि कंगना के साथ देखने को मिला है। वौ दौर बीत गया जब किसी छोटे से कस्बे से मुंबई पहुंचना ही कठिनाई भरा सफर होता था।

कंगना भले ही 'क्वीन' न हो लेकिन हाल के दिनों में मीडिया पर जिस तरह से अपना गुस्सा जाहिर की है उससे तो यही लगता है कि वो अब  जज्बाती से ज्यादा 'जजमेंटल' होने लगी है। आखिर क्यों अभिनेत्री कंगना रनौत पत्रकार जस्टिन राव पर इतनी गुस्से में आ गई कि शब्दों की सीमा को भी भूलकर पूरे मीडिया जगत पर ही बरस पड़ी।

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यह लड़ाई क्या दो व्यक्ति का न होकर दो ऐसे ऑरगेनाइजेशन का है जिसमें एक तरफ कलाकार है जो डायरेक्टर के इशारे पर पर्दे पर थिरकते है शायद इतना कि यह भी भूल जाते है कि 'शॉट कट' होने के बाद उनकी अपनी निजी जिंदगी शुरु हो जाती है। अब जो भी बोलना है वो उनके फिल्म का हिस्सा नहीं है।

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लेकिन आदत इतनी बुरी बला है कि जो छूटती ही नहीं। कारण कलाकार तो ईमानदारी से अपने किरदार में डूबकर उसे जीवंत कर देते है। जब निकलते है तो सामने मीडिया लपक लेती है। यहीं से शुरु होता है किसी कलाकार की मीडिया से दोस्ती या कुछ भी मन मुताबिक नहीं हुआ तो दुश्मनी भी करने में देरी नहीं लगती है। 

अब ये मीडिया जगत ही ऐसी है जो अपने दम पर कुछ अलग खबर को ढ़ूंढ़ ही लेती है। जो शायद आप नहीं दिखाना चाह रहे हो। फिर आपको बुरा लगे तो लगे अपना काम पंगा लेने से ज्यादा इस बात पर खत्म होती है कि सच्चाई कभी दब कर दम न तोड़ दे।  

लेकिन कंगना ने मीडिया के उस दुखती रग पर हाथ रख दी जिसमें कुछ सच्चाई भी है जिससे इनकार भी नहीं किया जा सकता। अगर कंगना को अपने पिछले फिल्म मणिकर्णिका को लेकर पत्रकार के सवाल से आपत्ति है, तब तो शायद वो मेंटल हो रही है। क्योंकि अगर आपके काम की तारिफ हो सकती है तो आलोचना भी होती है। इसमें भोले बाबा की तरह विषपान करना सीखिये।       

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शायद ही कोई कलाकार होगा जिनको आलोचना या तारिफ मीडिया से नहीं मिला हो। लेकिन गिनती में भी ऐसे कलाकार नहीं हैं जो मीडिया से इतनी बदतमीजी से पेश आई हो। जैसा कि कंगना के मामले में हुआ है। उन्हें याद रखना चाहिए कि वे सफल एक्ट्रेस हो सकती है लेकिन उनकी शालीनता बहुत मायने रखती है। कहा जा सकता है कि कंगना के सर पर सफलता सर चढ़कर बोल रही है तो उन्हें माधुरी दीक्षित, श्रीदेवी, रेखा जैसी कलाकार से सीखनी चाहिए। जिनकी अदब की आज भी चर्चा होती है।    

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मीडिया की कुछ खामियों की तरफ कंगना ने गाहे-बगाहे इशारा तो जरुर की है जिसकी हमें आत्ममंथन भी करनी चाहिए। एक तरफ हाल के दिनों में पत्रकारों को खबरों को लेकर दवाब फिल्मी ही नहीं राजनीतिक क्षेत्रों से भी बनाई जाती है। जैसा कि उत्तरप्रदेश में देखने को मिला जब उच्चतम न्यायालय ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए आदेश दिया कि हर हाल में प्रेस की आजादी अक्षुण्ण रखी जानी चाहिए।

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दूसरी तरफ मीडिया जगत में अपने खबरों से लेकर व्यवहार में जो गिरावट आई है उसे कतई सही नहीं ठहराया जा सकता। दूसरों पर अंगुली उठाने की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ हमें अपनी तरफ भी झांकना चाहिए, कि कहीं हमारे गिरेबां इतने दागदार न हो जाए कि कंगना जैसी कलाकारों को इतनी आजादी मिले कि खुलकर विरोध इस कदर करना पड़ जाए कि न जाने शब्दों से हमेशा खेलने वाले पत्रकारों की विवशता स्पष्ट दिखने लगे।  

लेखक- कुमार आलोक भास्कर। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।   

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