Saturday, Nov 16, 2019
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राजनीतिक हत्याएं दिखा रहीं विभिन्न दलों का क्रूर चेहरा 

  • Updated on 6/28/2019

देश के विभिन्न भागों में पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक हत्याओं का सिलसिला लगातार जारी है जो चुनाव परिणाम आने के बाद और भी बढ़ गया है। स्थिति की गंभीरता इसी महीने के निम्र उदाहरणों से स्पष्टï है : 

  • 02 जून को बंगाल के 24 परगना में एक भाजपा कार्यकत्र्ता और दक्षिण दिनाजपुर में तृणमूल कांग्रेस के एक सदस्य की हत्या कर दी गई। 
  • 05 जून को लखीमपुर के गांव में सपा वर्कर की हत्या की गई। 
  • 07 जून को हापुड़ के गांव ददारा में सपा वर्कर को मार डाला।
  • 08 जून को 24 परगना जिले तथा बशीर हाट में गुंडों ने 3 भाजपा वर्करों की आंखों में गोली मार कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया।
  • 09 जून को हावड़ा में एक भाजपा वर्कर का शव पेड़ से लटकता मिला। 
  • 11 जून को मालदा में भाजपा नेता अनिल सिंह की हत्या कर दी गई।
  • 14 जून को झारखंड में गुमला में एक भाजपा वर्कर को मार दिया गया।
  • 14 जून को 24 परगना में भाजपा की एक महिला वर्कर की हत्या की गई।
  • 15 जून को मुॢशदाबाद जिले में अराजक तत्वों ने तृणमूल कांग्रेस के 3 वर्करों को गोलियों से भून डाला। 
  • 18 जून को छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में समाजवादी पार्टी के नेता ‘संतोष पुनेम’ की हत्या कर दी गई। 
  • 20 जून को बंगाल के 24 परगना जिले के ‘भाटपारा’ में 2 भाजपा कार्यकत्र्ताओं को गोलियों से भून दिया गया। 
  • 22 जून को बंगाल के आमडांगा में माकपा के 2 वर्करों की हत्या कर दी गई।
  • 26 जून को बर्दवान में एक पुरोहित की लाश छत से लटकती मिली। तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा समर्थकों पर उसकी हत्या का आरोप लगाया है। 
  • 27 जून को फरीदाबाद में हरियाणा कांग्रेस के प्रवक्ता विकास चौधरी की अज्ञात हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी। उन्हें उस समय 10 से अधिक गोलियां मारी गईं जब वह कसरत करके जिम से बाहर निकल रहे थे। 

उपरोक्त घटनाओं से स्पष्टï है कि देश में न सिर्फ राजनीतिक ङ्क्षहसा जारी है बल्कि प्रतिद्वंद्वी दलों द्वारा अपने विरोधियों को निपटाने के लिए क्रूरतम तरीके इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
कहीं धारदार हथियारों का इस्तेमाल किया जा रहा है, कहीं आंखें निकाली जा रही हैं और कहीं हत्या करके शवों को पेड़ों से लटकाया जा रहा है।
निश्चय ही यह लोकतंत्र का चेहरा नहीं है और इससे लगता है कि समय बीतने के साथ-साथ हमारे लोकतंत्र में भागीदार विभिन्न राजनीतिक दल परिपक्व होने की बजाय प्रतिद्वंद्विता के चलते असहनशील और क्रूर होते जा रहे हैं।    

                                                                                                                                          —विजय कुमार 

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