Friday, Jan 18, 2019

चूल्हों के पीछे बन गए ‘बंकर’

  • Updated on 1/11/2019

दहशत के कारण मजबूर हुए लोगों के लिए समय के चक्कर ने हालात ऐसे बना दिए कि अपनी जान की सलामती हेतु उनको घरों में बंकर बनाने पड़ रहे हैं। जिंदगी रूपी ‘मासूम-बोट’ को खूनी पंजों में जकडऩे के लिए सीमा पार से ‘खौफ के पंख’ कई दशकों से फड़फ़ड़ा रहे हैं और इस खतरे से बचाव हेतु कई प्रयास भी साथ-साथ किए गए।

अब जम्मू-कश्मीर के सीमांत क्षेत्रों में स्थित गांवों के लोगों को पाकिस्तानी सैनिकों की गोलीबारी से सुरक्षित रखने के लिए घरों में बंकरों के निर्माण को अमल में लाया जा रहा है। इन बंकरों को देखने का अवसर तब मिला जब ‘पंजाब केसरी’ की राहत टीम ने साम्बा सैक्टर में उन लोगों तक पहुंच की, जिनके घरों की दीवारें अक्सर गोलीबारी से कांपती रहती हैं। 

सीमा के बिल्कुल किनारे पर स्थित एक ऐसे ही गांव में देखा कि घरों के आंगनों में जहां रोटी-सब्जी बनाने के लिए चूल्हे बने हुए हैं, उनके पिछली ओर कंकरीट के बंकर बनाए जा रहे हैं ताकि गोलीबारी के समय पारिवारिक सदस्य वहां शरण ले सकें। इन बंकरों के निर्माण का सारा खर्च सरकार द्वारा दिया जा रहा है। जिन लोगों के पास बंकर बनाने के लिए जगह नहीं है, उनके लिए ऐसा प्रबंध स्कूल या अन्य किसी सार्वजनिक स्थान पर किया जा रहा है। ऐसे बंकरों में 50 से अधिक लोगों के बैठ सकने की जगह होती है।

घरों में कुछ बंकर इस तरह से बनाए गए हैं जिन्हें एक छोटी-सी सुरंग के रास्ते रहने वाले कमरों से जोड़ा गया है। गांव से 500 मीटर की दूरी पर ही सीमा है। मैदानी इलाका होने के कारण सीमा के आरपार स्पष्ट देखा जा सकता है। जब इस क्षेत्र में तार-बाड़ नहीं थी और सुरक्षा के प्रबंध भी अधिक कड़े नहीं थे तो लोग अक्सर आर-पार आ-जा सकते थे। तब दोनों ओर के कुछ लोग इस आवागमन का जायज-नाजायज लाभ भी उठा लेते थे तथा कइयों ने तो अपने हाथ भी रंग लिए। 

गांव में सुरक्षा चौकी 
नंगा नामक इस गांव में सीमा सुरक्षा बल की एक चौकी भी बनी हुई है। सुरक्षा कर्मचारी अपनी जान पर खेल कर सीमा की सुरक्षा करते हैं तथा अपने नागरिकों की सुरक्षा का फर्ज भी निभाते हैं। राहत टीम के सदस्यों ने वहां तैनात जवानों तथा एक अधिकारी मनु मंगोत्रा के साथ अनौपचारिक मुलाकात भी की और महसूस किया कि वे सभी कितनी हिम्मत तथा मुस्तैदी के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं।

सुरक्षा कर्मी केवल सीमा की रखवाली ही नहीं करते, बल्कि वे गांव के लोगों के दुख-सुख में भी काम आते हैं। गांववासियों के साथ उनके सौहार्दपूर्ण व गर्मजोशी भरे संबंध देखने में आए। सुरक्षा कर्मियों की एक विशेष बात देखने में आई कि वे खुद भी सफाई पर विशेष ध्यान देते हैं तथा गांववासियों को भी इसके प्रति प्रोत्साहित करते हैं। गांवों की युवा पीढ़ी ऐसे प्रयासों में आगे होकर भूमिका निभाती है। 

युवाओं में ‘उडारी’ मारने की इच्छा 
सीमांत क्षेत्र के गांवों में कुछ परिवार ऐसे हैं जिनकी आॢथक स्थिति मजबूत है। इसकी झलक उनके घरों से भी मिलती है तथा आंगन में खड़ी कारों से भी। ऐसे घरों के बच्चे स्कूलों की पढ़ाई करके ही मन में विदेशों को ‘उडारी’ मारने की इच्छा पाल लेते हैं। कालेजों में जाकर उनकी यह इच्छा और भी बलवती हो जाती है।

सीमांत गांव के एक युवक ने बताया कि उसके बहुत से साथी विदेशों में चले गए हैं तथा वह खुद भी पढऩे के लिए बाहर जाने की तैयारी कर रहा है। उसका कहना था कि सीमांत गांवों के हालात बहुत खराब हैं, जहां अक्सर गोलीबारी होती रहती है। रोजगार के भी कोई प्रबंध नहीं तथा नौकरियां भी नहीं मिलतीं। इस स्थिति के कारण ही युवाओं में विदेशों के प्रति रुझान बढ़ रहा है। 

गोलियों से बचाएंगे पेड़ 
सीमांत गांवों में पाकिस्तान की ओर से आती गोलाबारी से बचाव के लिए जहां बंकर बनाए जा रहे हैं, वहीं बड़ी संख्या में पेड़ लगाए जाने की भी जरूरत महसूस की जा रही है। एक सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि यदि गांवों में सीमा की ओर पेड़ों की घनी कतार लगा दी जाए तो पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा चलाए जाते मोर्टार तथा गोलियों आदि से नुक्सान की आशंका बहुत कम हो सकती है। 

गोला जब किसी छोटी-सी चीज से भी टकराता है तो वहीं फट जाता है। इसलिए गांव के बाहर यदि पेड़ों की बाड़ खड़ी होगी तो उस गांव की ओर दागा गया गोला पेड़ से टकराने के बाद रास्ते में ही फट जाएगा। उन्होंने कहा कि सभी सीमांत गांवों की सुरक्षा के लिए बड़ी संख्या में पेड़ लगाए जाने अत्यंत आवश्यक हैं। इसके लिए सुरक्षा कर्मी सहयोग देने को तैयार हैं। 

जरूरत इस बात की है कि पेड़ों की बाड़ लगाने के मामले में सरकार को उपयुक्त कदम उठाने चाहिएं तथा इस काम के लिए संबंधित गांवों के लोगों को भी जागरूक किया जाना चाहिए।

समाज सेवी संस्थाएं तथा गैर-सरकारी संगठन भी इस मामले में महत्वपूर्ण योगदान डाल सकते हैं। इससे नागरिकों की सुरक्षा हो सकेगी तथा पर्यावरण को स्वच्छ रखने में भी मदद मिलेगी। इसके महत्व को ध्यान में रखते हुए यह कार्य तुरंत किया जाना चाहिए।                                                                                                             ---जोगिन्द्र संधू

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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