Monday, Sep 27, 2021
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2050 तक कैंसर और हार्ट अटैक के मुकाबले सेप्सिस से ज्यादा होगी मौत 

  • Updated on 9/15/2021

आईएचडब्लू कॉउंसिल की दूसरी सेप्सिस समिट में विशेषज्ञों का खुलासा 
नई दिल्ली/टीम डिजिटल। देश में सेप्सिस को लेकर जागरुकता की बेहद कमी है। नतीजतन, नवजात शिशुओं और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य पर इसका गहरा असर पड़ रहा है।

विशेषज्ञों ने इसपर चिंता व्यक्त की है और चेतावनी देते हुए कहा है कि वर्ष 2050 तक सेप्सिस से होने वाली मौत के आंकड़े कैंसर और हार्ट अटैक के आंकड़ों को भी पीछे छोड़ सकते हैं। इंटीग्रेटेड हेल्थ एंड वेलबीइंग (आईएचडब्लू) काउंसिल द्वारा आयोजित वर्चुअल सेप्सिस समिट इंडिया में विशेषज्ञों ने एंटीबायोटिक दवाओं के बड़े पैमाने पर उपयोग को नियंत्रित करने के साथ सेप्सिस के प्रति जागरुकता और शीघ्र निदान (डायगनोसिस) को बचाव का महत्वपूर्ण जरिया बताया। 
 

क्रिटिकल केयर एंड एनेस्थिसियोलॉजी के चेयरमैन डॉ. यतिन मेहता के मुताबिक भारत जैसे विकासशील देशों में एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग के कारण मल्टीड्रग रजिस्टेंस की वजह से मौत ज्यादा हो रही है। चिकित्सा क्षेत्र में कई अदभुत प्रगति होने के बावजूद टेर्टियरी केयर अस्पतालों में 50 से 60 प्रतिशत मरीजों को सेप्सिस और सेप्टिक शॉक होता है। इसलिए इस बीमारी के निवारण के लिए जागरूकता, और शीघ्र डायगनोसिस की आवश्यकता है।
 

 

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