Monday, Mar 30, 2020
by raising issue of the country will the bjp and congress able to win in delhi

'मैदान दिल्ली का मुद्दा देश का' उठाकर क्या BJP- कांग्रेस ढहा पाएंगे केजरीवाल का किला ?

  • Updated on 1/23/2020

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। कौन होगा दिल्ली (Delhi) का अगला सीएम- यह सवाल राजधानी की फिजाओं में फिर से तैरने लगी है। विधानसभा चुनाव को लेकर एक तरफ आप पार्टी के स्टार प्रचारक और सीएम अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) अपने विरोधियों को चुनौती पर चुनौती देते जा रहे हैं। जिसमें उन्होंने सबसे बड़ा चुनावी पासा जो सत्ता में वापसी के लिये खेला वो मुफ्त बांटने की है। जिससे पूरी विपक्षी पार्टी बीजेपी (Bjp) और कांग्रेस (Congress) हतप्रभ है। हालांकि यह भी सौ फीसदी सच है कि बीजेपी और कांग्रेस ने राष्ट्रीय मुद्दा और अपने राष्ट्रीय नेतृत्व से ही अरविंद केजरीवाल को पटखनी देने का मन बना लिया है। दोनों विपरीत पार्टी- बीजेपी और कांग्रेस में कम से कम मुद्दे और चेहरे को लेकर विलक्षण समानता दिख रही है।

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आप सरकार ने जनता के साथ किया है छल
लेकिन इस बीच अरविंद केजरीवाल के मुफ्त बांटने की स्कीम पर तंज कसते हुए प्रदेश बीजेपी मनोज तिवारी ने बड़ा हमला किया है। उन्होंने केजरीवाल पर आरोप लगाया कि आप सरकार पिछले 4 साल 8 महीने जनता की अनदेखी करती रही है। लेकिन जब एमसीडी और लोकसभा चुनाव में जनता ने पटखनी दे दी तो सामने विधानसभा चुनाव देखते ही अचानक मेहरबान हो गए। सवाल उठता है कि केजरीवाल ने जो मुफ्त की घोषणा की वो सही है या मनोज तिवारी ने जो तंज कसा उसमें दम है।

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विधानसभा चुनाव 2015 में केजरीवाल उभरे नायक की तरह
इसका हमें मैग्निफाइड ग्लास से विश्लेषण करना पड़ेगा, तभी सारी स्थिति स्पष्ट हो पाएगी। यह बात तो सही है कि अरविंद केजरीवाल ने जब 2013 और 2015 का दिल्ली विधानसभा चुनाव में जिस तरह का चुनावी दांव खेला उसका निशाना सही लगा था। इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन जब 2 साल के बाद यानी 2017 के MCD का चुनाव हुआ तो केजरीवाल की लोकप्रियता को बड़ा झटका लगा। बीजेपी ने जोरदार वापसी करते हुए तीनों निगमों की सीटों पर कब्जा कर लिया। यह क्यों हुआ जिस केजरीवाल को 2015 विधानसभा चुनाव में दिल्ली की जनता ने हाथों हाथ लिया उसे 2 साल के भीतर ही जमींदोज कर दिया। 

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निगम और लोकसभा चुनाव में कम हुई केजरीवाल की लोकप्रियता
क्या अरविंद केजरीवाल का जादू उतर चुका है? जैसा कि हाल के लोकसभा चुनाव 2019 में जिस तरह से दिल्ली की जनता ने पीएम नरेंद्र मोदी के हाथों में न सिर्फ सातों सीटें दे दी बल्कि कांग्रेस के हाथों को भी मजबूत कर दिया। यहां फिर अरविंद केजरीवाल फिसल गए- वो भी तीसरे नंबर पर पहुंचे। एक सत्तासीन पार्टी के लिये लगातार चुनाव हारना सही संकेत नहीं है।

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आप पार्टी के सामने सत्ता वापसी की चुनौती

अगर एक तरफ बीजेपी लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने के बाद लगातार राज्यों के चुनाव हारती जा रही है उससे मोदी और शाह के करिश्मा को धक्का लगा है। वैसे ही हमें मानना पड़ेगा कि अरविंद केजरीवाल के सामने भी सत्ता में वापसी करना बहुत बड़ी चुनौती बरकरार रहेगी। क्योंकि 2017 और 2019 के चुनाव में मिली करारी हार से आप पार्टी को 2020 के विधानसभा चुनाव में पार करना आसान नहीं होने वाला है।

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सीएए से बदल सकती है बीजेपी के लिये समीकरण
भले ही बीजेपी और कांग्रेस खेमे में केजरीवाल के सामने एक अदद चेहरे की कमी कहीं न कहीं खल तो रही है। लेकिन बीजेपी ने CAA पर जिस तरह से समर्थन हासिल करने के लिये जनता के बीच जाने का फैसला किया है उससे ध्रुवीकरण करने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। साथ ही Unauthorised Colony को लेकर मालिकाना हक देने का काम जिस तरह से मोदी सरकार ने किया है उसका असर चुनाव परिणाम बाद ही स्पष्ट होगा।

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कांग्रेस को भी उम्मीद जनता करेगी समर्थन

वहीं कांग्रेस ने CAA और NRC को लेकर मोदी सरकार को देश भर और दिल्ली में घेरने में कामयामबी हासिल की है। या यूं कहिये कि हाल के दिनों में कांग्रेस अपनी खिसकी जमीन को वापस हासिल करने के लिये बीजेपी पर भारी साबित हुई है। तो ऐसे में CAA की छाया में दिल्ली विधानसभा चुनाव का होना कहीं न कहीं बीजेपी और कांग्रेस के लिये प्रतिष्ठा का विषय बन चुका है। सामने आप पार्टी पुरजोर तैयारी में जुट गई है कि किसी तरह केजरीवाल का किला को बजाया जा सके। फिलहाल 11 फरवरी तक का इंतजार किजीए।

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