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दिल्ली हिंसा: पुलिस की नाकामी से जलती रही दिल्ली और मदद मांगते रहे लोग

  • Updated on 2/29/2020

नई दिल्ली/प्रियंका। दिल्ली में भड़की हिंसा भले ही थम चुकी है लेकिन इस हिंसा के निशां अब हर गली, हर चौराहे पर देखे जा सकते हैं। इस हिंसा में 42 लोगों की जान जा चुकी हैं जबकि 200 से ज्यादा लोग घायल हैं। 3 दिनों तक चली इस हिंसा के बाद कई कहानियां सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां धर्म के नाम पर मार-काट की वीभत्स घटनाएं हैं तो दूसरी तरफ भाईचारे और एकता की दास्तानें भी सुनी जा सकती हैं। इस बीच पुलिस की भूमिका भी सामने आई जिसपर कई सिवलिया निशान खड़े हो रहे हैं। 

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दिल्ली पुलिस की नाकामी
बताया जा रहा है कि दिल्ली हिंसा के पहले दिन से लेकर 3-4 दिन तक पुलिस के पास पीड़ितों की हजारों की तादात में कॉल्स आई थीं, लेकिन पुलिस स्टेशन से इन कॉल्स पर कोई नहीं पहुंचा! एक रिपोर्ट की माने तो 23 फरवरी को पुलिस कंट्रोल रूम के पास हिंसा प्रभावित इलाकों से 13000 से ज्यादा कॉल्स आई थीं। लेकिन पुलिस पहुंची ही नहीं, यहां दिल्ली पुलिस की भूमिका बेहद कमजोर नजर आती है। यहां पुलिस यह तक समझने में नाकाम रही कि ऐसा क्या किया जाए जिससे बिगड़े हालात को काबू किया जा सके। सब कुछ दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे होता रहा और पुलिस यहां तमाशबीन रही। 

ये दिल्ली पुलिस की नाकामी ही है जो अपने विभाग का ही एक कर्मचारी हेड कांस्टेबल रतनलाल पुलिस के रहते शहीद हो गया। पुलिस की नाकामी की एक तस्वीर और देखने को मिली जिसमें शाहरुख़ नाम का हमलावर गोली चला रहा है और ड्यूटी पर तैनात दिल्ली पुलिस का जवान उसे समझाने जा रहा था।

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पुलिस के पास नहीं अनुभव
जानकर ये कहते हैं कि दिल्ली पुलिस को दंगों जैसी स्थिति का सामना करने का कोई अनुभव नहीं है। इससे पहले भी जब दिल्ली में 1984 सिख विरोधी दंगा, मंडल आयोग के वक्त भड़की हिंसा, एल के आडवाणी के रथ यात्रा के दौरान तनाव और 1992 में बाबरी ढांचा गिराए जाने के वक्त हिंसा भड़की थी तब भी पुलिस का यही रवैया दिखने को मिला था।

जवाबों से बचती रही पुलिस
जेएनयू में हुई हिंसा के आरोप जब पुलिस पर लगे तो पुलिस इन आरोपों के बचाव में लगी रही और पुलिस को इस बात पर सफाई देनी पड़ी कि क्यों सीएए के विरोध पर दिल्ली पुलिस ने जामिया यूनिवर्सिटी में घुसकर छात्रों पर हमले किए। अब दिल्ली हिंसा के बाद पुलिस को फिर इन सवालों का सामना करना पड़ रहा है कि आखिर कैसे और क्यों दिल्ली हिंसा में स्थिति की गलत समीक्षा की गई और शांति बहाल करने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ा।

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पुलिस करती रही ऑडर का इंतजार
दिल्ली हिंसा पीड़ितों की माने तो शुरुआत में पुलिस हर जगह दिखाई दी लेकिन मूक दर्शक की तरह, और बाद में जब हिंसा फैली तब पुलिस गायब थी। यहां हैरानी की बात ये भी रही कि जहां हिंसा हुई वहां से कुछ दूरी पर ही दिल्ली पुलिस का मुख्यालय है। पुलिस पर ये भी आरोप लगे कि पुलिस अपने आला अधिकारीयों के आर्डर का इंतजार कर रही थी। वहीँ, जब हिंसा भड़की तो दिल्लीे पुलिस कंट्रोल रूम में हजारों कॉल्स आये जो अपने-अपने इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा की रिर्पोट करने और मदद के लिए किए गए थे। जिन्हें पूरा कर पाने में पुलिस ने फिर आर्डर मिलने का इंतजार किया।

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पुलिस की सबसे बड़ी गलती 
पुलिस की सबसे बड़ी गलती ये मानी जा रही है कि जब नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुए तभी उन्हें एक्शन लेना चाहिए था। जामिया मिल्लिया इस्लामिया से शुरू हुआ प्रदर्शन शाहीनबाग, हौजरानी, सीलमपुर, जाफराबाद जैसे स्थानों पर विरोध बन कर फैलता गया लेकिन पुलिस इंतज़ार करती रही। वहीँ जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा पर थे तो उसी दौरान जाफराबाद में मेट्रो स्टेरशन के नीचे धरना शुरु हुआ और तभी सीएए के समर्थन में भाजपा नेता कपिल मिश्रा आए और तब कपिल मिश्रा ने पुलिस अधिकारी के बगल में खड़े होकर ‘अल्टीमेट’ जैसा भड़काऊ बयान दिया।

होना तो ये चाहिए था कि इस वक़्त ही पुलिस को कड़ा एक्शन लेना चाहिए था लेकिन पुलिस इंतज़ार करती रही। अब इस गलती, नाकामी या चूक को पुलिस कुछ भी बहाना दे लेकिन यही सब बातें दिल्ली में बड़ी हिंसा की वजह बनी।

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