can congress stay without the struggle of the nehru-gandhi family

क्या कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार के ठप्पे के बिना रह सकती है

  • Updated on 7/8/2019

लोकसभा चुनावों (Lok Sabha Election) के बाद कांग्रेस (Congress) अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है लेकिन कांग्रेस की कार्यप्रणाली पर करीबी नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि दशकों तक कांग्रेस ने नेहरू-गांधी (Nehru-Gandhi) परिवार के बिना जीवन की योजना नहीं बनाई थी। ऐसा राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की हत्या के बाद हुआ कि केन्द्र में सरकार होने के बावजूद एक ऐसा समय आया जब पी.वी. नरसिम्हा राव के अंतर्गत पार्टी कमजोर हुई और बंट गई तथा उस समय चीजें बद से बदतर हो गईं जब सीताराम केसरी पार्टी के अध्यक्ष बने। पार्टी को अब बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है तथा मुख्य विरोधी भाजपा अब अधिक लोकप्रिय है और इसकी उपस्थिति सारे देश में है। वर्तमान में विपक्ष में कांग्रेस के पास जय प्रकाश नारायण, राज नारायण, चन्द्रशेखर, जगजीवन राम, ज्योति बसु तथा जॉर्ज फर्नांडीज जैसे नेता नहीं हैं, जो इस समय भाजपा की लोकप्रियता का सामना कर सकते थे।
यह कांग्रेस का पतन तथा कमजोरी है जिसने राज्यों में राष्ट्रीय दृष्टिकोण के बिना क्षेत्रीय दलों को बढ़ावा दिया। फिलहाल कांग्रेस के सामने तात्कालिक लक्ष्य 5 राज्यों में सत्ता बनाए रखना है जहां उसकी सरकारें हैं और सोनिया गांधी तथा प्रियंका गांधी को आगे रह कर पार्टी का नेतृत्व करने व कांग्रेस को बचाने के लिए दबाव बनाने हेतु पार्टी नेता उनसे मिलेंगे। इस बीच राहुल गांधी के इस्तीफे के मद्देनजर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के लिए किसी युवा नेता का समर्थन किया है। उनके अनुसार देश में विशाल तथा बढ़ रही युवा जनसंख्या के लिए अध्यक्ष भी युवा होना चाहिए।

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भविष्य के लिए ममता की मेहनत
लोकसभा चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य में अपनी पार्टी तृणमूल को मजबूत करने के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं। इसके लिए उन्होंने पार्टी कार्यकत्र्ताओं तथा नेताओं को निर्देश दिया है कि वह सरकारी कार्यक्रमों में किसी दलाली अथवा भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करेंगी। दूसरे, उन्होंने शिक्षा तथा राज्य की सरकारी नौकरियों में उच्च जाति के आॢथक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया है। उन्होंने सभी दलों के अनुसूचित जाति/जनजाति तथा आदिवासी विधायकों को बुलाकर उन्हें इन समुदायों के कल्याण हेतु सुझाव देने को कहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि तृणमूल ने इन क्षेत्रों में लोकसभा सीटें भाजपा को खो दी हैं। भाजपा ने अधिकतर आदिवासी सीटें जीत ली हैं विशेषकर पुरुलिया, बांकुड़ा तथा बीरभूम जिलों में। इन तीन जिलों में भाजपा ने अधिकतर सीटें जीती हैं विशेष कर चाय बागानों में जहां आदिवासी चाय मजदूरों ने खुलकर भाजपा का समर्थन किया। यह दिलचस्प है कि आदिवासियों तथा अनुसूचित जातियों/जनजातियों की मदद के ममता के प्रयास की भाजपा सहित सभी विपक्षी दलों ने प्रशंसा की है। दरअसल आने वाले विधानसभा चुनावों के कारण दीदी इन मुद्दों पर कड़ी मेहनत कर रही हैं।

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वसुंधरा के लिए बुरा दौर
राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया एक बुरे दौर से गुजर रही हैं। भाजपा में उनके उत्थान के कारण किसी समय हर कोई उनसे आशीर्वाद लेने का प्रयास करता था परंतु राजस्थान विधानसभा चुनावों में पराजय के शीघ्र बाद और लोकसभा चुनाव जीतने के बाद सशक्त वसुंधरा राजे राजस्थान में सबसे कमजोर भाजपा नेता बन गईं क्योंकि भाजपा का अब यह मानना है कि वसुंधरा राजे के कारण ही भाजपा विधानसभा चुनाव हारी। 

केन्द्रीय उच्च कमान ने वसुंधरा राजे को नजरअंदाज करते हुए उनके विरोधी गजेन्द्र सिंह शेखावत को मोदी मंत्रिमंडल में जगह दे दी तथा ओम बिरला को लोकसभा का स्पीकर बना दिया, जिससे भाजपा कार्यकत्र्ताओं के बीच यह संकेत गया है कि केन्द्रीय उच्च कमान ने पूर्व मुख्यमंत्री राजे को बुरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है और उनके किसी समय वफादार रहे मदन लाल सैनी के निधन के बाद उच्च कमान ने अपना इरादा दर्शा दिया है कि राज्य भाजपा अध्यक्ष का पद किसी युवा नेता को दिया जाएगा जिसके लिए कुछ नाम चर्चा में हैं जैसे कि विधायक सतीश पूनिया, पूर्व मंत्री अरुण चतुर्वेदी, विधायक मदन दिलावर तथा लोकसभा सांसद कर्नल राज्यवद्र्धन सिंह राठौर। चारों विरोधी खेमे से और आर.एस.एस. की पृष्ठभूमि वाले हैं तथा ऐसा दिखाई देता है कि नया राज्याध्यक्ष अगले विधानसभा चुनावों में भाजपा का मुख्यमंत्री पद का नया उम्मीदवार होगा।

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वास्तुदोष का डर
सुषमा स्वराज ने लुटियन्स में अपना बंगला खाली कर दिया है और साऊथ दिल्ली के पते पर चली गई हैं। उमा भारती भी ऐसा करने वाली हैं। यद्यपि भाजपा के दो वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवानी तथा मुरली मनोहर जोशी पृथ्वीराज रोड तथा रायसीना रोड पर अपने बंगलों को न तो खाली करेंगे और न ही उन्हें ऐसा करने के लिए कहा जाएगा। अडवानी तथा जोशी को जैड प्लस सुरक्षा प्राप्त है और इसलिए उन्हें कम से कम एक वर्ष का विस्तार दिया जाएगा। इसके पीछे कारण सुरक्षा ङ्क्षचताएं बताया जा रहा है। इस बीच अरुण जेतली द्वारा हाल ही में 2, कृष्णा मेनन मार्ग को खाली किया गया है जो बड़े सरकारी बंगलों में से एक है, मगर केन्द्रीय मंत्री वास्तुदोष बारे सोचते हुए उसमें जाने से कतरा रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं साऊथ दिल्ली में अपना निजी आवास छोड़ कर इस बंगले में आने के बाद हुईं, जिसमें वह तब आए जब वह विपक्ष के नेता और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री थे।

ए.आई.एम.आई.एम. के अच्छे दिन
असदुद्दीन ओवैसी के इस समय मुस्कुराने का एक कारण है क्योंकि ए.आई.एम.आई.एम. को विपक्ष के नेता के पद हेतु एक विधायक को नामांकित करने की क्लीयरैंस मिल गई है। ए.आई.एम.आई.एम. को एक शहर आधारित पार्टी होने के नाते लम्बे समय से खारिज किया जाता रहा है और इसकी शक्ति हैदराबाद के मुस्लिम प्रभुत्व वाले क्षेत्रों तक ही सीमित है। 2014 में ए.आई.एम.आई.एम. को एक राज्य स्तरीय पार्टी के तौर पर पहचान मिली थी और 2018 में इसने कांग्रेस की 28.4 प्रतिशत वोटों के मुकाबले महज 2.7 प्रतिशत वोटें प्राप्त की थीं परंतु अब विधानसभा में नम्बर दो पार्टी के तौर पर उभरी है क्योंकि तेलंगाना में कांग्रेस के 19 विधायकों में से 12 दल बदलकर के. चन्द्रशेखर राव की टी.आर.एस. में शामिल हो गए हैं और एक संसद में चला गया है, जिससे कांग्रेस के 6 विधायक रह गए हैं, जबकि ए.आई.एम.आई.एम. के 7 तथा भाजपा के पास एक सीट है।                                                                                                  राहिल नोरा चोपड़ा

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