Monday, Jan 21, 2019

इस दुनिया के ‘चाणक्य’...

  • Updated on 12/21/2018

कुछ दशक पूर्व अपनी जेब में कुछ रुपए लेकर मैं बम्बई शहर, अब मुम्बई, में स्थानांतरित हो गया था और जिस उत्पाद को बेचा करता था उसे घर-घर तक पहुंचाने लगा। ऐसे ही घरों में से एक में मैं एक डाक्टर से मिला जो मेरा करीबी मित्र बन गया।

‘‘बॉब,’’ जब हम उनके घर में ही बने क्लीनिक में बैठ कर उनकी पत्नी मीना द्वारा मेरे लिए विशेष रूप से बनाई गई चाय की चुस्कियां ले रहे थे तो डा. देसाई ने कहा, ‘‘इस शहर में तुम लोगों को एक बार मूर्ख बनाकर निकल सकते हो लेकिन तुम दूसरी बार उन्हें मूर्ख नहीं बना सकते।’’मैंने उनकी सलाह गांठ बांध ली और एक सफल व्यवसाय खड़ा किया।

अभी हाल ही में आए राजनीतिक परिणामों में मैंने देखा कि डाक्टर के शब्द कितने सच हैं। हमारे देश ने 2014 में किए गए प्रत्येक वायदे पर विश्वास किया और आज परिणाम दिखाते हैं कि अधिकतर लोगों ने उन पर दूसरी बार विश्वास नहीं किया।

मुझे नागरिकों के एक समूह के साथ जाने के लिए बुलाया गया, जिन्हें उनकी सोसायटी में पानी की समस्या थी। मैंने एक पर्यवेक्षक के तौर पर जाने का फैसला किया। ‘‘क्या आपने समाचार पत्र देखे?’’ सचिव ने एकत्र लोगों से पूछा, ‘‘हमारे शहर को केवल 20 प्रतिशत पानी मिला।’’ 

अब समाचार पत्रों में लिखने वाले के तौर पर मैं जानता था कि वह मराठवाड़ा में सूखे संबंधी एक रिपोर्ट का हवाला दे रहे थे। इसका मुम्बई के साथ कोई लेना-देना नहीं था, जिसकी झील की क्षमता लगभग 1.42 करोड़ लीटर थी और मुम्बई ने केवल सितम्बर महीने में 1.32 करोड़ लीटर पानी हासिल किया, जो मात्र 7 प्रतिशत कम था।

फिर भी मैंने देखा कि प्रदर्शनकारी उनके शब्दों पर विश्वास कर रहे थे और यहां तक कि उस समय कांप भी रहे थे जब सचिव ने उन्हें चेतावनी दी कि मुम्बई की सड़कों पर दंगे होंगे क्योंकि लोग पानी के टैंकरों के लिए लड़ेंगे।

हमारे देश में गत 4 वर्षों में झूठ पर विश्वास करने ने नाजुक सामाजिक ताने-बाने को काफी नुक्सान पहुंचाया है क्योंकि इसमें उद्देश्यपूर्ण तरीके से गहरे तथा व्यापक विभाजन पैदा कर दिए गए हैं।

इससे मेरे मन में एक प्रश्र उठता है कि ‘‘कैसे हम उनके पहले झूठ के साथ ‘चाणक्यों’ को बच कर निकलने से रोक सकते हैं।’’ क्योंकि पहले झूठ तथा दूसरे के बीच के समय में ऐसा नुक्सान किया जा चुका होता है, जिसकी क्षतिपूॢत नहीं की जा सकती। 

मेरा मानना है कि हमें सतर्क रहना होगा। भाषण तथा उसके कहने का तरीका अथवा वाकपटुता कितनी भी प्रभावी हो, हमें उसकी विषयवस्तु पर प्रश्र उठाने की जरूरत है।

एक दिन मैंने एक बैठक में ऐसे ही वक्ता को बहुत प्रभावशाली तथा विचारशील लहजे में बोलते सुना कि सदस्य यह मानने को मजबूर हो गए कि वे कितने भाग्यशाली हैं कि उन्हें थोड़ा-बहुत पानी मिल रहा है। यदि उन्होंने केवल तथ्यों का अध्ययन किया होता, पड़ोसी हाऊसिंग सोसायटियों के साथ अपनी स्थिति की तुलना की होती तो वे संतुष्ट होकर नहीं बल्कि अपने अधिकारों की मांग करते हुए घर लौटते।

विश्व के चाणक्य बहुत चतुर हैं, वे आपकी असुरक्षाओं का इस्तेमाल करते हैं, डर का इस्तेमाल करते हैं और हर किसी के सामने ऐसा प्रदॢशत करते हैं जैसे वे रक्षक या उद्धारक हैं। लेकिन यदि आप अत्यधिक देरी से अपने सबक नहीं सीखना चाहते, यदि आप यह एहसास होने से पहले कि क्या हो रहा है, विनाश को नहीं देखना चाहते तो अपने दिमाग को प्रश्र करने, समीक्षा तथा इंकार करने के लिए इस्तेमाल करना शुरू करें, केवल आपके लिए कृत्रिम चमक-दमक के साथ पेश की गई कल्पनाओं के कीचड़ को ही स्वीकार न करें।                                                              ---राबर्ट क्लीमैंट्स

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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