Friday, Jan 28, 2022
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राज्य की सीमाओं को पार कर विदेशों तक जा पहुंचा छठ महापर्व

  • Updated on 11/7/2021

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। सूर्य की उपासना का महापर्व छठ, अब सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि सूर्य की किरणों की तरह ही फेलते हुए भारत के अन्य राज्यों व समुद्र पार कर कई देशों तक पहुंच चुका है। यही वजह है कि छठ पूजा के पहले से ही सरकारें उसकी तैयारियों में जूट जाया करती हैं। गंगा के घाट से होते हुए सूर्य की उपासना का यह पर्व समुद्र के किनारों तक जा पहुंचा है। यही इस पर्व की सुंदरता है।

पूर्वांचलियों की मांग पर शीला सरकार ने छठ पूजा पर सरकारी अवकाश की घोषणा भी की
बता दें कि आज से करीब तीन दशक पहले तक छठ पूजा का राजधानी दिल्ली में उतना महत्व नहीं था। इसे सिर्फ दिल्ली में रहने वाले चुनिंदा बिहार के लोगों द्वारा मनाया जाता था लेकिन काम की तलाश में दिल्ली की ओर आए भारी संख्या में बिहार के मजदूरों ने यमुना नदी के किनारे को उत्सव के रूप में तब्दील कर दिया। यमुना नदी की रौनक और बढते पूर्वांचल के प्रतिनिधित्व ने सरकारों को छठ व्रत के महत्व को समझने के लिए मजबूर कर दिया। यही वजह रही कि शीला दीक्षित की सरकार के दौरान छठ घाटों पर विशेष काम किया गया क्योंकि व्रतधारियों की संख्या इतनी अधिक बढ गई थी कि यमुना घाट भी छोटा पडने लगा था। यही वजह है कि आज दिल्ली की प्रत्येक विधानसभा में करीब आधा दर्जन से अधिक छठपूजा स्थल अवश्य देखने को मिल जाते हैं। इसके बाद पूर्वांचलियों की मांग पर शीला सरकार ने छठ पूजा पर सरकारी अवकाश की घोषणा भी की। 
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महिला सशक्तिकरण व जाति के बंधनों तोडता है छठ महापर्व

छठ महापर्व की विशेषता की बात की जाए तो इसकी सबसे बडी सुंदरता इसका महिला सशक्तिकरण हैं, जिसमें एक व्रतधारी महिला के अगल-बगल पूरे परिवार का केंद्र बिंदू स्थापित हो जाता है। व्रतधारी महिला सिर्फ मां, बहन, बीवी, बहू, भाभी या अन्य रिश्तों से ऊपर उठकर उस समय मां छठ का स्वरूप बन जाती है। महिला का व्रत पूरा होने पर परिवार का प्रत्येक सदस्य उसका पैर छूकर आशीर्वाद जरूर लेता है।

ऊंचकुलीन भी फैलाते हैं झोली, मांगते है छठ मईया का प्रसाद और आशीर्वाद
यह त्योहार जाति के बंधनों को तोड देता है यही इसे महापर्व में भी तब्दील कर देता है, यह भी इसकी खासियत है जो इसे महान बना देती है। इस व्रत में जाति की लकीर पूरी तरह मिट जाती है। गांव में छुआ-छूत मानने वाले ब्राहमण, राजपूतों व बनियों की महिलाओं के साथ ही निम्न जाति की समझे जाने वाली महिलाएं भी घाट पर बैठकर छठ मईया के गीत गाती हैं। सही मायने में यह असली नारी सशक्तिकरण है। वहीं गांव के अमीर से अमीर व्यक्ति इस दौरान निम्न जाति की व्रतधारी महिला के पांव छूकर टीका लगवाता है और झोली में प्रसाद मांगकर खाता है। छठ मईया के घाट पर आते ही जातिप्रथा लगभग खत्म हो जाती है। उस समय छठ का स्वरूप मानी जाने वाली व्रतधारी महिला उसके सिर पर हाथ रखकर मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद सच्चे मन से देती है। यही है इस पर्व की सबसे बडी सुंदरता। घर की महिला द्वारा व्रत रखे जाने पर पूरा परिवार भी इस दौरान एकत्र ही नहीं होता बल्कि पूजा में प्रसाद बनाने से लेकर बहंगी घाट तक पहुंचाने के लिए श्रमदान करता है। 
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छुट्टी लेकर लोग पहुंचते हैं गांव
प्रत्यक्ष देवता सूर्यदेव की अराधना का पर्व छठ देश ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को लांघकर विदेशों में भी मनाया जाने लगा है। सबसे सकारात्मक बात यह है कि खूबसूरती व प्रकृति से जुडाव रखने वाले इस सनातनी पर्व में युवा वर्ग की भी भागीदारी हमेशा देखने को मिलती है। बच्चे अपनी पढाई व कामकाजी अपने काम से छुट्टी लेकर गांव की छठपूजा में पूरे उत्साह के साथ शामिल होते हैं। यही वजह है कि बिहार व पूर्वी यूपी की ओर जाने वाली ट्रेनें, बसें व फ्लाइट कई महीनों पहले ही बुक हो जाती हैं।

पवित्रता व स्वच्छता का त्योहार है छठ
छठ महापर्व, अन्य त्योहारों के मुकाबले काफी अलग होता है। छठ पर्व में पवित्रता और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। कहते हैं कि छठ मईया जितनी जल्दी प्रसन्न होती हैं, उतनी ही जल्दी कुपित भी हो जाती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार छठव्रत का फल त्वरित गति से प्राप्त होता है यानि गलती पर सजा का तुरंत प्रावधान होता है। इसीलिए व्रतधारी महिलाएं विशेष रूप से साफ-सफाई का ध्यान रखती हैं। कहा जाता है कि छठ का प्रसाद भी काफी सफाई से इस दौरान बनाया जाना चाहिए। जब तक छठ मईया को भोग ना लग जाए तब तक इस प्रसाद को छूने की भी मनाही होती है। यही नहीं व्रत का प्रारंभ ही नहाय खाय के साथ होता है  ताकि व्रतधारी का शरीर ही नहीं बल्कि आत्मा का भी पूरी तरह से शुद्धिकरण हो जाए। इस दौरान व्रतधारी महिलाएं बिल्कुल सात्विक भोजन करती हैं। जिसमें नहाय खाय के दिन चने की दाल, लौकी की सब्जी, चावल खाए जाते हैं जबकि खरना के दिन गुड वाले चावल व रोटी खाई जाती है। वो भी पूरे दिन में सिर्फ एक समय।
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नहाय खाय के साथ शुरू होगा सूर्य की उपासना का ‘छठ पर्व’
बता दें कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस त्योहार की शुरूआत दो दिन पहले चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से हो जाती है। यह छठ पूजा का पहला दिन होता है, जिस दिन व्रतधारी सुबह नहाकर लौकी, चने की दाल और चावल देशी घी से बनाकर खाते हैं। 

छठ गीतों के साथ करती हैं महिलाएं खरना
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को व्रतधारियों द्वारा खरना रखा जाता है। इस दिन को विशेष रूप से शुद्धिकरण के लिए जाना जाता है। निर्जल व्रत और रात में गुड की खीर, पुडी व फल खाकर व्रतधारियों अगले दिन खुद को निर्जल व्रत के लिए तैयार करते हैं।

डूबते सूर्य के साथ प्रत्यूषा को देते हैं छठव्रतधारी अघ्र्य
छठ महापर्व के तीसरे दिन यानि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को डूबते सूर्य व प्रत्यूषा को अघ्र्य देकर व्रतधारी छठ मईया को याद करते हैं। व्रतधारी शाम 4 बजे से ही कमर तक पानी में खडे हो जाते हैं और हाथ में धूपबत्ती लेकर सूर्य की उपासना करते हैं और जैसे ही सूर्यदेव अस्त होते हैं, आसमान में लालिमा बिखर जाती है तब छठ मईया के लिए घर में बना प्रसाद व फल को सूप या बांस की टोकरी द्वारा अर्घ्य दिया जाता है। जिसके बाद व्रतधारी अपने-अपने घर जाकर कोसी भरते हैं और रातभर पूजा स्थान पर बने छठ मईया के स्थान पर अखंड ज्योति जलाई जाती है और घर के लोग धूप से हवन करते हैं। 
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जाने क्यों देते हैं डूबते सूर्यदेव को अघ्र्य
शास्त्रों के अनुसार शाम के समय भगवान सूर्य व उनकी पत्नी प्रत्यूषा (सूर्य की आखिरी किरण प्रत्यूषा) एक साथ रहते हैं जिसके चलते शाम को ढलते सूर्य को अघ्र्य देने पर प्रत्यूषा का आशीष भी प्राप्त होता है। जहां डूबते सूर्य की उपासना व अघ्र्य देने से जीवन में तेज रहता है और यश, धन व अन्य सुख संपदाएं प्राप्त होती है वहीं कई मुसीबतों से छुटकारा मिलता है और सेहत भी ठीक रहती है।

उगते सूर्य के साथ ऊषा को देते हैं अघ्र्य
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को उगते सूर्य के साथ ऊषा को अघ्र्य दिया जाता है। उगते हुए सूर्य को अघ्र्य देना बहुत शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन सूर्यदेव अपनी पत्नी देवी ऊषा (सूर्य की प्रथम किरण) के साथ विचरण करते हैं, जिसे वरूण वेला में अघ्र्य दिया जाता है। छठ पूजा के अंतिम दिन सूर्यदेव को अर्घ्य देने से दोहरा फल प्राप्त होता है। इससे सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होकर व्यक्ति के जीवन में संपन्नता आती है।

महिलाएं व्रत पूर्ण होने पर लगाती हैं एक-दूसरे को सिंदूर
व्रतधारी स्त्रियां छठ व्रत के संपूर्ण होने पर एक-दूसरे को नाक से सिंदूर लगाकर खुशी जाहिर कर सदा सौभाग्यवती रहने का आशीर्वाद देती हैं। वहीं पुरूषों को मां छठ का आशीर्वाद स्वरूप सिंदूर का टीका लगाया जाता है। इसके बाद लोग एक-दूसरे को प्रसाद वितरित कर छठ पूजा के संपन्न होने पर सूर्यदेव का धन्यवाद करते हैं।

छठ व्रत का है वैज्ञानिक आधार भी
बता दें कि उगते हुए सूर्य को जल चढाने के लिए तांबे के लोटे का उपयोग किया जाता है ताकि गिरते जल की धारा में सूर्यदेव के दर्शन कर सकें। इसके पीछे एक वैज्ञानिक तर्क भी है कि ऐसा करने से आंखों की ज्योति बढती है। वहीं पुराणों के अनुसार ऐसा करने से संतान संबंधी समस्याएं दूर होती है, अपयश के योग भंग होते हैं, पिता-पुत्र के बीच संबंध सही बनते हैं व जिनमें भी आत्मविश्वास की कमी होती है वो सूर्य को अंतिम अघ्र्य देने से बढ जाता है।
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क्या है छठ मईया का प्रसाद
छठ मईया को मौसमी फल गन्ना, नींबू, शरीफा, सेब, केला, संतरा, अमरूद चढाए जाने के साथ ही नारियल, हल्दी, सुथनी, शकरकंदी, पान, सुपारी, कपूर, चंदन, मिठाई, ठेकुआ, पुआ, चावल के बने गुड वाले लड्डू भी चढाए जाते हैं। सूर्य को अघ्र्य बांस या पीतल के बने सूप या टोकरी से दिया जाता है। व्रतधारी कमर तक नदी या पोखरे में उतरकर अघ्र्य देते हुए उपासना करते हैं और विश्व के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

जाने क्या है छठ का पौराणिक महत्व
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राजा प्रियव्रत निःसंतान थे। महर्षि कश्यप ने राजा से पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करने को कहा, महर्षि की आज्ञा अनुसार राजा ने यज्ञ करवाया और उनकी पत्नी महारानी मालिनी को यज्ञ के पश्चात पुत्र को जन्म दिया। दुर्भाग्य से वह शिशु मरा हुआ पैदा हुआ, जिससे राजा और प्रजा बहुत दुःखी थे। तभी आकाश से एक विमान उतरा जिसमें माता षष्ठी विराजमान थीं, राजा ने उनसे प्रार्थना की अपने पुत्र को बचाने की। तब ब्रह्मा की मानस पुत्री षष्ठी देवी ने कहा कि में विश्व के बच्चों की रक्षा और निःसंतान दंपतियों को संतान प्राप्ति का वरदान देती हूं। देवी षष्ठी ने जैसे ही मृत शिशु को हाथ लगाकर आशीष दिया तो वो जीवित हो गया। राजा प्रसन्न हुआ और देवी षष्ठी की आराधना प्रारंभ कर दी। जिसके बाद ये व्रत प्रारंभ हो गया।
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द्रौपदी ने राजपाट वापस प्राप्त करने के लिए रखा था छठ व्रत
महाभारत में वर्णित है कि पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने अपने परिवार के लंबी उम्र व राजपाट वापस प्राप्त करने के लिए सूर्यदेव की आराधना करते हुए छठ का व्रत रखा था। उस समय पांडव अपना पूरा राजपाट जुए में हार गए थे लेकिन सूर्य देव की भक्त द्रौपदी के व्रत रखने से सूर्यदेव ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए सारी मनोकामनाएं पूरी की।

छठ गीतों के सुर लगते हैं सुहावन
छठ के गीतों में मशहूर गायिका शारदा सिन्हा, मालिनी अवस्थी, कल्पना, देवी, अनुराधा पौडवाल, मनोज तिवारी सहित कई भोजपूरी गायकों के गीत सुनने में बहुत अच्छे लगते  हैं लेकिन घाट पर महिलाएं जब एकत्र होकर छठ मईया के गीत गाती हैं तो माहौल काफी सुहावन बन जाता है। उसमें भी ‘कांची-कांची बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय’/‘केरवा जै फरेला गवद से, ओही पर सुग्गा मंडराय’/‘केरवा के पात पर उगेलें सुरूज देव झांके-झुंके’/‘कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय’ व ‘पहिले-पहिले छठी हम कईनी छठी मईया व्रत तौहार’ जैसे गीत बहुत सुरीले लगते हैं। इन गीतों की शुरूआत कार्तिक मास से ही प्रारंभ हो जाती है। 

 

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