Sunday, Jan 23, 2022
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children will know the village environment and huts in delhi

बच्चे जानेंगे दिल्ली में गांव का परिवेश और झोपडिय़ां

  • Updated on 12/3/2021

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। शहर में रहने वाले वो बच्चे जिनकी जड़ गांव में नहीं होती वो गांव की संस्कृति और वहां के रहन-सहन को देखने के लिए काफी आतुर होते हैं। उन्हें गांव के लोगों के कच्चे मकान व झोपडिय़ां काफी लुभाती हैं और वहां के ग्राम देवता से लेकर त्यौहार, रीति-रिवाज को जानना काफी रूचिकर लगता है। यदि आप भी शहरी जीवन में इतना व्यस्त हो चुके हैं कि बच्चों को लेकर गांव नहीं जा पाते तो एक बार आपको नेशनल क्राफ्ट म्यूजियम जरूर जाना चाहिए। यहां आपको कई राज्यों की झोपडिय़ां, बैलगाडिय़ां, वैवाहिक संस्कार की झलक देखने को मिलेगी।

तकरीबन 6 एकड़ में फैला है विलेज कॉम्पलेक्स
बता दें कि अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड द्वारा राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय और हस्तकला अकादमी (नेशनल क्राफ्ट म्यूजियम) की स्थापना साल 1956 में की गई थी। यहां भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा परंपराओं का भंडार देखने को मिलेगा। इस संग्रहालय के निर्माण का उद्देश्य केवल संरक्षण के लिए नृवंशविज्ञान संबंधी कलाकृतियों को रखना नहीं था बल्कि शिल्प के नमूनों का एक संग्रह बनाना था जो शिल्प के पुनरूद्धार, प्रजनन और विकास के लिए जानकारी प्रस्तुत कर सके। करीब 8 एकड़ के परिसर में फैले शिल्प संग्रहालय में तीन मुख्य खंड शामिल हैं। स्थायी और अस्थायी प्रदर्शनी, दृश्य स्टोर, ग्राम परिसर और शिल्प प्रदर्शन क्षेत्र। जिसमें से ग्राम परिसर और शिल्प प्रदर्शन क्षेत्र में आप गांवों की झोपडिय़ों, उनकी कलाकृतियों व प्रमुख त्योहारों को देख पाएंगे। यह विलेज कॉम्पलेक्स तकरीबन 6 एकड़ में फैला हुआ है। इसे प्रसिद्ध वास्तुकार राम शर्मा और मूर्तिकार शंखो चौधरी द्वारा 1972 में एशिया व्यापार मेले के लिए डिजाइन किया गया था और बाद में ग्राम परिसर को राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय और हस्तकला अकादमी में शामिल किया गया। जिसमें भारत के विभिन्न हिस्सों से 14 संरचनाएं शामिल हैं। ग्राम परिसर का सुखद वातावरण ग्रामीण भारत के कई पारंपरिक झोपडिय़ों और घरों को दर्शाता है जो अकसर ईंटों, मिट्टी, घास के भूसे-भूसी, बेंत और बांस की डंडियों से बने होते हैं और विभिन्न जातीय समूहों-समुदायों व धार्मिक पंथों के प्रतीक हैं।

नागा हट, नागालैंड : नागा हट ज्यादातर नागालैंड की राजधानी कोहिमा में रहने वाली अंगामी नागा जनजाति से संबंधित है और अन्य 16 आधिकारिक रूप सम मान्यता प्राप्त नागा जनजातियों के बाहर असम, मणिपुर, अरूणाचल प्रदेश और बर्मा में रहते हैं। इनकी झोपड़ी में थोड़ी धनुषाकार छत होती है और दीवारें ज्यादातर बांस से बनी होती है।


रजवार हट, छत्तीसगढ़ : रजवार छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण कलात्मक समुदायों में से एक है। इनका मुख्य पेशा कृषि है। उनकी अर्थव्यवस्था में धान मुख्य फसल के रूप में उगाया जाता है। रजवार सोमवार से अपना घर बनाना शुरू करते हैं। मोटी मिट्टी की दीवार होती है। घर की छत के लिए जंगली पक्षियों और जानवरों के विभिन्न आकृतियों के साथ मैन्युअल रूप से तैयार बेक्ड टाइलों का उपयोग किया जाता है। खिड़कियों के हिस्से को ठीक करने के लिए जाली के काम को कलाकृतियों के साथ प्रस्तुत किया गया है।

गोंड प्रांगण, मध्यप्रदेश : गोंड मध्य प्रदेश की एक महत्वपूर्ण और सबसे बड़ी जनजाति है जो मध्य प्रदेश के बैतूल, होशंगाबाद, छिंदवाड़ा, बालाघाट, शहडोल, मंडला, सागर और दमोह जिलों के क्षेत्रों में निवास करती है। गोंड जनजातियों की अपनी दृश्य कलाएं हैं जैसे गोंड पेंटिंग। गोंड घरों के बीच में एक आंगन होता है, जो एक गलियारे या पारछी से घिरा होता है और कुरई या कमरे उनके बगल में होते हैं, रसोई, देबलया और पैठा बंगला भी बनाया जाता है। गोंड घरों की दीवारों को मिट्टी और रंगों से महिलाओं द्वारा सजाया जाता है।

गदबा कुटीर, उडीसा : उडीसा के जगदलपुर के दक्षिण पूर्व में बहुत कम संख्या में पाई जाने वाली जनजातियों में से एक है गदबा। इनकी बोली गदबी अन्य जनजाजियां ना तो बोल पाती है और समझ सकती है। ये अत्यंत पिछड़ी हुई जनजाति है, जिनका प्रमुख कार्य शिकार करना, कंदमूल एकत्र करना है। इनकी झोपडियां लकड़ी की होती हैं जिस पर बारीक नक्काशी होती है और कुटीर की दीवारों पर रंगीन चित्र होते हैं और खुला बरामदा बैठक के काम आता है।

गुजरात का विवाह स्तंभ व बन्नी कुटिर : गुजरात में शादी के मौकों पर एक प्रकार का स्तंभ स्थापित किया जाता है जिसे विवाह स्तंभ कहा जाता है। खासकर भरवाड़ा समुदाय में यहां आपको यह स्तंभ देखने को मिलेगा। इसके अलावा गुजरात की बन्नी कुटीर है। जिसे कच्ची ईंटों व स्थानीय पौधों से छप्पर डालकर गोल बनाया जाता है। इस कुटीर में रहने वाले लोग रेगिस्तान की गर्म हवाओं से इन्हीं के द्वारा बच पाते हैं।

कुल्लू कुटीर, हिमाचल प्रदेश : हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र स्थित मंडी इलाके में बनाई जाने वाली कुटीर को कुल्लू कुटीर कहा जाता है। कुटीर की दीवारें चट्टानी पत्थरों से बनी होती हैं। दोमंजिला इस कुटीर पर लकड़ी के दरवाजे व ऊपरी मंजिल की बालकनी में लकड़ी का प्रयोग अधिक किया जाता है जिसपर बेहद सुंदर नक्काशी की जाती हे और इस कुटीर की छत स्लेट पत्थरों से बनी होती है।

देवनारायण का देवरा, राजस्थान : यहां आपको राजस्थान में प्रचलित देवनारायण का देवरा का चित्र देखने को मिलेगा। इस चित्र में राजस्थान के लोक देवता देवनारायण जिन्हें विष्णु भगवान का स्वरूप माना जाता है, उनसे जुड़ी कहानियां दृश्य चित्रित दिखाई देंगी। यह चित्र राजस्थान के भीलवाड़ा में खासतौर पर बनाए जाते हैं। यहां  यह चित्र भीलवाड़ा के ही कलाकार श्रीलाल जोशी द्वारा चित्रित किया गया है।

गडुलिया बैलगाड़ी, राजस्थान : राजस्थान के गडुलिया लोहार कभी भी एक जगह नहीं रूकते यही वजह है कि इनकी बैलगाड़ी ही इनका घर बन जाती है। यहां गडुलिया बैलगाड़ी को प्रदर्शित किया गया है। कीकर की लकड़ी से बनी इस गाड़ी पर पीतल की घंटियों एवं टुकड़ों से बेहद सुंदर सज्जा की गई है। ये इन लोहारों का चलता-फीरता घर है। इसके अलावा यहां कोल्हू भी बनाया गया है। जिससे मूंगफली व सरसों का तेल निकाला जाता था।

आयनार देवस्थान, मृणशिल्प तमिलनाडु : शिव एवं विष्णु का मिश्रित रूप माने जाने वाले तमिलनाडु के लोक देवता आयनार हैं इनके इस देवस्थान में वो अपनी दो पत्नियों, अनुचरों एवं चढ़ौती के रूप में अर्पित मानव एंव पशु आकृतियों सहित प्रदर्शित किए गए हैं। यह मूर्तियां वेलार समुदाय के कुम्हारों द्वारा बनाई गई हैं जो कि आकार में काफी बढ़ी व बेहद खूबसूरत हैं। खासकर टेराकोटा के विशाल घोड़े लोगों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
 

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