Wednesday, Nov 13, 2019
chine criticize indian government exit from rcep

RCEP से किनारा करने पर चीन ने भारतीय राजनीति पर उठाए सवाल

  • Updated on 11/8/2019

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। RCEP (रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप) से भारत (India) के किनारा करने के बाद से चीन बौखलाया हुआ है। दरअसल, भारत के विशाल घरेलु बाजार से चीन (China) कई उम्मीदें लगाए था, लेकिन भारत के इनकार के बाद से चीन के व्यापार की सभी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। भारत के इनकार के बाद से चीन की मीडिया भारतीय राजनीति पर ही सवाल उठाने लगी है। चीन की सरकारी मीडिया का कहना है कि भारत सरकार ने राजनीतिक दबाव के चलते इस मेगाट्रेड डील में शामिल होने से इनकार किया है। 

चीन के सरकारी अखबार ग्लोबर टाइम्स के अनुसार इस मेगाट्रेड डील के लिए भारत को चीन ने सितंबर के महीने में ही विचार विमर्श के लिए आमंत्रित किया था। इसमें लिखा है कि भले ही भारत ने RCEP से किनारा कर लिया हो लेकिन भारत के कॉमर्स एंड इंडस्‍ट्री मिनिस्‍टर पीयूष गोयल ने इस बात के संकेत दिए हैं कि अब भी इसमें शामिल होने के लिए भारत चीन से बात कर सकता है। 

'विपक्ष के विरोध के चलते भारत ने RCEP से किया किनारा'
ग्लोबल टाइम्स के अनुसार भारतीय विपक्ष और किसनों एवं व्यापारियों के विरोध के दबाव के चलते भारत सरकार ने इस समझौते में शामिल होने से इनकार किया है। बता दें कि काफी समय पहले से ही भारत में RCEP को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था। ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि भारत में RCEP एक राजनीतिक मुद्दा बन चुका था, जिसके चलते इससे जुड़ने की इच्छा होने के बाद भी भारत सरकार ने इससे जुड़ने से इनकार कर दिया और इससे होने वाले लाभ को भी नजरअंदाज कर दिया। 

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'फ्री ट्रेड डील के चलते आर्थिक घाटे का शिकार हुआ भारत'
अखबार ने लिखा है कि भारत विदेशों से कई फ्री ट्रेड डील के चलते आर्थिक घाटे का शिकार हुआ है। ये भी एक कारण है कि भारत ने RCEP जैसी मेगा ट्रेड डील का हिस्सा बनने से इनकार किया, जबकि भारत को इस डील से वैश्विक स्तर पर एक इंडस्ट्रियल चेन बनाने में सहायता मिलती। भारत के विशाल घरेलु बाजार को भी इससे बड़ा फायदा मिलता और आर्थिक सुधारों के लिए भी ये डील कारगर साबित होती। लेकिन भारत राजनितिक दबाव के चलते इस लाभ से वंचित रह गया।  

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चीन में विकास को लेकर बन जाती है राष्ट्रीय सहमति
भारत और चीन की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था की तुलना करते हुए अखबार ने लिखा है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसके चलते किसी भी मुद्दे के राजनीतिक होने के बाद इस पर सहमति नहीं बन पाती। इसके उलट चीन में देश के विकास पर राष्टीय सहमति बन जाती है। अखबार में ये भी लिखा है कि चीन की विकास नीतियों पर सवाल उठाने वाले पश्चिमी देश यहां पर होने वाले विकास और सुधारों की कल्पना भी नहीं कर सकते। 

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'राजनीति में फंस कर रह गए भारतीय प्रधानमंत्री'
भारतीय प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपित की तुलना भी अखबार के इस लेख में की गई है। इसमें लिखा है कि चीन के राष्ट्रपति ने कहा कि वो देश के विकास के लिए किसी भी कीमत पर समझौता नहीं कर सकते और उन्होंने ये करके भी दिखाया। वहीं भारतीय प्रधानमंत्री राजनीति में फंस कर देश के विकास के लिए कदम नहीं उठा सके। अखबार में  लिखा है कि भारत प्रदूषण की चपेट में है। जनता त्रस्त है और सराकर से सवाल कर रही है, लेकिन राजनीति को तव्वजो देने वाली सरकार देशवासियों के लिए कुछ नहीं कर पा रही है। भारत को चीन से सीखने की जरूरत है।    

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