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सुदर्शन टीवी मामले में कांग्रेस के दो नेताओं के परिवारों ने SC में दायर की याचिका

  • Updated on 9/24/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। एक टीवी कार्यक्रम में बहस में हिस्सा लेने के बाद दिल का दौरा पड़ने से जान गंवाने वाले कांग्रेस (Congress) के नेता राजीव त्यागी की पत्नी और पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा की पत्नी ने उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में लंबित सुदर्शन टीवी के मामले में हस्तक्षेप की अनुमति के लिए आवेदन दायर किए हैं। इन दोनों ने अपने आवेदन में कहा है कि कुछ न्यूज ऐंकरों और ‘नफरत फैलाने वाले भाषण देने वालों’’ को अभिव्यक्ति की आजादी का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। 

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दिवंगत राजीव त्यागी की पत्नी संगीता त्यागी और कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा की पत्नी कोटा नीलिमा ने अपने आवेदन में 4 प्रमुख ऐंकरों के चार प्राइम टाइम कार्यक्रमों का उल्लेख किया है और आरोप लगाया है कि इनके अधिकांश कार्यक्रम सांप्रदायिक किस्म के और सत्तारूढ़ दल के पक्ष वाले होते हैं। अपने आवेदनों पर जल्द सुनवाई का अनुरोध करते हुये इन आवेदकों ने देश में ‘इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की स्थिति’ की तुलना ‘नाजी की जर्मनी’ से की है। 

आवेदनों में जर्मनी के धर्मशास्त्री मार्टिन निमोलर और ल्यूथेरन पास्टर को उद्धृत किया है, ‘‘ पहले वे समाजवादियों के लिये आये और मैं नहीं बोला क्योंकि मैं समाजवादी नहीं था। फिर वे ट्रेड यूनियन वालों के लिये आये और मैं नहीं बोला क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन वाला नहीं था। फिर वे यहूदियों के लिये आये और मैं नहीं बोला क्योंकि मैं यहूदी नहीं था। फिर वे मेरे लिये आये और उस समय मेरे लिये बोलने वाला कोई नहीं था।’’ 

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सुदर्शन टीवी से संबंधित मामला इसके ‘बिन्दास बोल’ कार्यक्रम के प्रसारण पर प्रतिबंध के लिये है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि देश की नौकरशाही में मुसलमानों की कथित घुसपैठ हो रही है। शीर्ष अदालत ने पहले ही मुख्य याचिका पर सुनवाई करते हुये इसके ‘यूपीएससी जिहाद’ कार्यक्रम के प्रसारण पर रोक लगा दी है। याचिका में इस कार्यक्रम में नफरत फैलाने वाले भाषण सहित अनेक मुद्दे उठाये गये हैं। केन्द्र ने बुधवार को न्यायालय को सूचित किया कि पहली नजर में इस कार्यक्रम को कार्यक्रम संहिता का उल्लंघन करने वाला पाया गया है और उसने चैनल को कारण बताओ नोटिस दिया है। 

आवेदन में कहा गया है कि आवेदनकर्ता न्यायालय से अनुरोध करते हैं कि टीवी ऐंकरों और नफरत के भाषण के पैरोकारों को संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का संरक्षण नहीं दिया जाये। आवेदन में कहा गया है कि ऐसी टीवी बहस और टीवी ऐंकरों को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत इस तरह का संरक्षण न सिर्फ अनुच्छेद 19 के लिये बल्कि हमारे संवैधानिक ढांचे के लिये भी विनाशकारी होगा। 

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इसमें आगे कहा गया है कि न्यायालय के लिये यही उचित समय है कि वह अनुच्छेद 19 की आड़ में नफरत वाले भाषणों को हवा देने वाली इन टीवी बहस ओर टीवी ऐंकरों का न्यायिक संज्ञान ले और इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिये कानून बनने तक संविधान के तहत उचित निर्देश दे। आवेदकों का कहना है कि सुदर्शन टीवी का कार्यक्रम निस्संदेह ‘नफरत वाले भाषण’ की श्रेणी में आता है। आवेदकों ने टीवी पर होने वाली बहस में टीवी ऐंकरों द्वारा नफरत वाले भाषणों के मसले के संदर्भ में इस मामले में हस्तक्षेप की अनुमति का अनुरोध किया है। 

इस मामले की सुनवाई के दौरान गत बुधवार को सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय को सूचित किया था कि सुदर्शन टीवी को कार्यक्रम संहिता के उल्लंघन के आरोप में कारण बताओ नोटिस दिया गया है और उससे 28 सितंबर तक जवाब मांगा गया है। न्यायालय ने यह जानकारी मिलने के बाद इस मामले की सुनवाई पांच अक्टूबर के लिये स्थगित करते हुये कहा था कि सुदर्शन टीवी के मामले में सरकार की कार्रवाई उसके आदेश के दायरे में आयेगी।

 

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