Monday, Nov 28, 2022
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congress president election: eyes will be on one more step of gehlot...

कांग्रेस अध्यक्ष चुनावः नजर तो गहलोत के एक और कदम पर होगी...

  • Updated on 9/30/2022

नई दिल्ली/ विजय विद्रोही। अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं लड़ेंगे। अब सवाल है कि क्या गहलोत को कहा गया कि वह अध्यक्ष का चुनाव नहीं लड़ें, क्योंकि आलाकमान उनसे खफा है। ( विधायक दल की बैठक में विधायकों ने नहीं आने और सामूहिक इस्तीफा देने के विवाद पर) क्या गहलोत फिलहाल के लिए मुख्यमंत्री हैं और आने वाले दिनों में उन्हें हटाया भी जा सकता है? क्या तब सचिन पायलट का नंबर लग सकता है? क्या गहलोत की सियासी साख गिरी है? क्या उनका जादू जो कभी सर चढ़कर बोलता था अब उतर गया है? यह कुछ ऐसा सवाल हैं जिनके जवाब आने वाले हफ्तों में सामने आ सकते हैं?

बंद कमरे में सोनिया गांधी और अशोक गहलोत के बीच क्या बात हुई, इसका पता या तो दोनों को है या फिर मुकुल वासनिक और वेणु गोपाल को? हमें यह नहीं पता कि माफीनामे को सोनिया गांधी ने स्वीकार कर लिया या फिर नाराज सोनिया गांधी ने ही गहलोत से कहा कि अध्यक्ष का पर्चा भरने की कोई जरूरत नहीं है? क्या गहलोत की इतनी हिम्मत रही कि वे  सोनिया गांधी के सामने कह सकें कि अध्यक्ष का पर्चा तभी दाखिल करेंगे जब कि उनके समर्थक 102 विधायकों में से ही किसी को मुख्यमंत्री बनाया जाए और सचिन पायलट को तो किसी भी कीमत पर मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाए? क्या सोनिया गांधी ने इस शर्त को मानने से साफ इनकार कर दिया?

सोनिया से मिलने के बाद मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के सवाल के जवाब में अशोक गहलोत ने कहा कि इसका फैसला तो खुद सोनिया गांधी ही करेंगी। आखिर ऐसा क्यों कहा? क्या उनका मुख्यमंत्री पद भी छीना जा रहा है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की स्थिति में कहा जा रहा था कि एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत के चलते उन्हें मुख्यमंत्री पद छोडऩा पड़ेगा। अब चूंकि अध्यक्ष का चुनाव लड़ ही नहीं रहे हैं तो एक व्यक्ति एक पद वाली बात उन पर लागू नहीं होती लिहाजा उनके मुख्यमंत्री बने रहने या नहीं रहने का सवाल उठना ही नहीं चाहिए था। लेकिन चूंकि सवाल उठ रहा है, इसलिए आशंका जाहिर की जा रही है कि क्या नया अध्यक्ष बनने के बाद या फिर गुजरात, हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव पूरे होने तक गहलोत को राहत मिल गई है।

सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस आलाकमान इस कदर नाराज है कि गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटा सकता है या हटाना चाहिए? गहलोत का सियासी कद बहुत बड़ा है। राजस्थान में चुनाव एक साल बाद होने हैं और आलाकमान गहलोत को हाशिए पर डालने या कैप्टन अमरेन्द्र सिंह बनाने की जोखिम नहीं उठा सकता। वैसे भी गहलोत ने 9 अगस्त को ही आलाकमान को स्पष्ट कर दिया था कि जो राज्य का चुनाव जितवाने की क्षमता रखता हो उसे मुख्यमंत्री पद सौंपा जाए। आगे कहा जा सकता है कि अगर गहलोत ने विधायकों को बैठक की बहिष्कार करने के लिए उकसाया तो आलाकमान ने भी पर्चा भरने से पहले ही बैठक बुलाने का फैसला कर कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी की। पर्यवेक्षक के रूप में गये प्रदेश प्रभारी अजय माकन की भूमिका भी संदिग्ध रही। गहलोत सोनिया से मिलने गये तो माकन के बारे में कुछ जानकारियां ले कर गये कि कैसे उन्होंने वन लाइनर प्रस्ताव को लेकर भ्रम फैलाया।

सोनिया गांधी समझती हैं कि गहलोत को हटाया गया तो गुजरात चुनावों पर असर पड़ेगा। आखिर गहलोत फंड मैनेजर हैं। उन्हें गुजरात की जिम्मेदारी दी गयी है। पांच साल पहले उन्होंने कांग्रेस को लगभग जितवा दिया था। अब अगर इस बार गुजरात में गहलोत कांग्रेस को जितवा नहीं पाते हैं या पांच साल पहले की उपलब्धि को दोहरा नहीं पाते हैं तो उन पर गाज गिराई जा सकती है।  

उधर, सचिन पायलट खेमे की नजर से देखा जाए तो अगला मुख्यमंत्री चुनने की बारी आई तो सचिन आगे रहेंगे क्योंकि विधायक भी समझ जाएंगे कि सोनिया गांधी गहलोत से नाराज है और ऐसे में गहलोत का साथ देना आलाकमान की नाराजगी मोल लेना है। कुल मिलाकर गहलोत का अध्यक्ष का चुनाव नहीं लड़ना कांग्रेस के लिए घाटे का ही सौदा है। गहलोत चौबीस घंटे राजनीति करते हैं। शतरंज के खिलाड़ी जैसे प्रतियोगी की अगली पांच सात चालों का अनुमान लगाकर अपनी चालें चलते हैं ठीक उसी तरह गहलोत भी सियासी दुश्मनों की अगली सात चालों को भांप कर चाले चलते हैं। ठंडी करके खाते हैं।   लेकिन आने वाले दिनों में उनकी राजनीति क्या रंग दिखाएगी, देखना होगा।

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