Congress survival will face radical changes

आमूलचूल परिवर्तन से ही बचेगा कांग्रेस का ‘अस्तित्व’

  • Updated on 8/28/2019

पार्टी अध्यक्ष (President) के तौर पर सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) की वापसी ने पार्टी में छोटे-बड़े सभी नेताओं के मुंह तो बंद कर दिए हैं लेकिन उनकी राह काफी मुश्किल है। उन्हें पार्टी की कमान संभाले एक पखवाड़े से अधिक समय हुआ है। ऐसा भी नहीं है कि सोनिया गांधी को इस बात की जानकारी न हो कि उनके सामने क्या-क्या समस्याएं और चुनौतियां (Challanges) हैं क्योंकि वह पहले भी लगभग दो दशक तक पार्टी (Party) अध्यक्ष रह चुकी हैं और उन्होंने पार्टी में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 1998 में जब उन्होंने पार्टी की कमान संभाली थी तो कांग्रेस (Congress) निचले पायदान पर थी और इसके नेता पार्टी को छोड़ कर जा रहे थे लेकिन वह इस प्रवृत्ति को रोकने में कामयाब रहीं। वह पार्टी को 2004 और 2009 में सत्ता में लेकर आईं। अब एक बार फिर सोनिया ने ऐसे समय में पार्टी का नेतृत्व संभाला है जब 2019 के लोकसभा चुनावों में हार के बाद इसके कार्यकत्र्ता काफी निरुत्साहित हैं और एक बार फिर इसके कार्यकत्र्ता  और नेता पार्टी छोड़ कर जा रहे हैं। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि यह 2019 है, 1998 नहीं। 

फिलहाल अस्थायी तौर पर गांधी परिवार (Gandhi Family) ने नेतृत्व का मसला हल कर लिया है। पहले कुछ लोग पार्टी अध्यक्ष के लिए गैर गांधी के तौर पर सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया  आदि के नाम भी सुझा रहे थे लेकिन सोनिया के सामने आने के बाद ये सारी आवाजें बंद हो गईं। सोनिया गांधी की वापसी से कुछ लोगों को राहत मिली क्योंकि इससे गैर गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने की संभावनाएं फिलहाल समाप्त हो गईं। 

पार्टी को एकजुट रखने की चुनौती
सोनिया के लिए दूसरी चुनौती पार्टी में हो रहे क्षरण तथा अनुशासनहीनता को रोकना होगा। 18 अगस्त को हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने अंतिम चेतावनी दी है कि यदि उन्हें पार्टी की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष न बनाया गया तो वह अन्य विकल्पों पर विचार करेंगे। उनकी बड़ी रैली उनकी शक्ति का प्रतीक थी। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने उनकी चेतावनी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन यदि इस समय हुड्डा पार्टी छोड़ते हैं तो इससे गलत संदेश जाएगा। 
गुटों में बंटी कांग्रेस पार्टी की संभावनाएं प्रदेश में पहले ही कमजोर हैं। यदि हुड्डा ऐसी स्थिति में पार्टी छोड़कर जाते हैं तो इससे चाहे उन्हें फायदा न हो लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी जीरो पर आ जाएगी। तीन राज्यों-महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में इस साल के आखिर में तथा दिल्ली में अगले वर्ष के शुरू में चुनाव होने हैं। इसके लिए अधिक समय नहीं बचा है। गोवा में कांग्रेस के 10 विधायक हाल ही में पार्टी छोड़ कर भाजपा में चले गए हैं। तेलंगाना में पार्टी के 18 में से 12 विधायक तेलंगाना राष्ट्र समिति में शामिल हो गए हैं। महाराष्ट्र में भी  दल बदल की स्थिति है। राज्यसभा में वरिष्ठ नेताओं संजय सिंह और भुवनेश्वर  कालीता ने अपनी सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा ज्वाइन कर ली है। कांग्रेस के लिए ये अच्छे संकेत नहीं हैं। 

परस्पर विरोधी विचार
तीसरा महत्वपूर्ण मसला कांग्रेस के विभिन्न नेताओं द्वारा विभिन्न मुद्दों पर उठ रही असहमति की आवाजों का है। महत्वपूर्ण मसलों जैसे कि तीन तलाक बिल, अनुच्छेद-370 का खात्मा तथा जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटने पर पार्टी की प्रतिक्रिया को लेकर कांग्रेस के नेताओं में  मतभेद  हैं। इसके अलावा जयराम रमेश, अभिषेक मनु सिंघवी तथा शशि थरूर जैसे लोगों का मानना है कि कांग्रेस को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गलत छवि पेश करने से बचना चाहिए। उनके इस सुझाव से ही पार्टी नेतृत्व  (राहुल गांधी) में ऊहापोह की स्थिति है क्योंकि वह प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमले करते रहे हैं। क्या ये लोग ऐसा मानते हैं कि पार्टी को अपनी रणनीति बदलने की जरूरत है अथवा कमजोर नेतृत्व ने उनका हौसला बढ़ा दिया है? 

चौथे, सोनिया गांधी को पार्टी का  एक मंथन सत्र बुलाना चाहिए जिसमें 2019 के चुनावों में हुई हार के कारण जानने के अलावा भाजपा का मुकाबला करने के लिए नई रणनीति पर विचार करना होगा। इस सत्र में पार्टी के नेताओं को अपने विचार व्यक्त करने की खुली आजादी देनी चाहिए। इसका फायदा यह होगा कि वे सार्वजनिक तौर पर पार्टी के खिलाफ न बोल कर  पार्टी के मंच पर ही अपनी बात रखेंगे।  जिन राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं यदि उनमें से एक में भी कांग्रेस जीत हासिल कर लेती है तो इससे पार्टी में एक नई जान आ जाएगी। हाल ही में आई.एन.एक्स. मीडिया मामले में पार्टी के वरिष्ठ नेता पी. चिदम्बरम की गिरफ्तारी से भी पार्टी को बहुत नुक्सान पहुंचा है। भाजपा यह दिखाना चाहती है कि कांग्रेस के नेता भ्रष्ट हैं।

पार्टी को चाहिए नया नारा
पांचवें, कांग्रेस को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वह किन सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करती है। अनेकता में एकता जैसे इंदिरा गांधी के समय  की धारणाएं अब पुरानी हो चुकी हैं। साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता  का नारा भी अब बेअसर हो चुका है। इन सब बातों से कांग्रेस की छवि एक मुस्लिम परस्त पार्टी के तौर पर बनी जो बहुसंख्यक समुदाय को नजरअंदाज करती है। इसलिए वोटर्स को आकॢषत करने के लिए उसे ‘आम आदमी’ से जुड़ा कोई नया नारा गढऩा होगा। वास्तव में कांग्रेस नेतृत्व को वोटर्स के समक्ष एक ‘नई कांग्रेस’ पेश करनी होगी जैसे कि यू.के. में लेबर पार्टी ने ‘नई लेबर’ पार्टी को प्रस्तुत किया। 

सभी बातों का निष्कर्ष यह है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद क्या कांग्रेस खुद में सुधार लाने के लिए तैयार है। क्या वह वापस मुड़ कर देखने और यह आत्मनिरीक्षण करने के लिए तैयार है कि गलती कहां हुई? यदि वह तैयार नहीं है तो उसे पुनर्जीवन की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए क्योंकि चीजें बदल चुकी हैं, मतदाता बदल चुके हैं, आकांक्षाएं बदल चुकी हैं तथा नेतृत्व बदल रहा है। हार को एक अवसर के तौर पर देखा जाना चाहिए और कांग्रेस को पार्टी की गुप्त सभा से बाहर निकलना चाहिए। 

कल्याणी शंकर
kalyani60@gmail.com  


 

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