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कोरोना में ज्योतिष की भविष्यवाणी : कब तक बरतें कितनी सावधानी

  • Updated on 3/19/2020

नई दिल्ली/अमित बेरी। ज्योतिष के अनुसार सात्विक शक्तियां सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति कमजोर अवस्था में जब-जब धर्म की हानि होती है, प्रलय की स्थिति उत्पन्न होती है। ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से कोरोना वायरस जैसे संकट तब उत्पन्न होते हैं जब प्रकृति की सात्विक शक्तियां सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति कमजोर अवस्था में गोचर कर रहे होते हैं। 

वर्तमान में जो गोचर चल रहा है, उसके अनुसार 13 अप्रैल तक समय दुनिया के लिए ज्यादा सावधानी का है। उसके बाद सूर्य दो हफ्ते के लिए स्थिति में काफी सुधार करेंगे। सूर्य की आभा को भी उसका कोरोना कहा जाता है। इस कोरोना के चक्र की शुरुआत 26 दिसंम्बर के सूर्यग्रहण से होती है। जब सूर्य, चंद्र और बृहस्पति ये तीनों ग्रह बुध के साथ मूल नक्षत्र में राहु, केतु और शनि ग्रसित थे। मूल का अर्थ जड़ होता है। 

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इसे गंडातंका नक्षत्र कहा जाता है जो प्रलय दर्शाता है। इस पर देवी निरति का अधिपत्य है। निरति का संबंध धर्म के अभाव से है। इनका जन्म समुद्र मंथन में कालकूट विष से हुआ था। इन्हें अलक्ष्मी भी कहा जाता है। ये विध्वंस की देवी हैं और इनकी दिशा दक्षिण-पश्चिम है। भारत के भी दक्षिण-पश्चिमी राज्यों में इनका प्रकोप दिख रहा है। उक्त सूर्य ग्रहण के ठीक 14 दिन बाद चंद्रग्रहण भी पड़ा। ये सभी ग्रह फिर से राहु, केतु और शनि से पीड़ित हुए। 

जैसे ही 15 जनवरी को केतु अपने मूल नक्षत्र में पहुंचे कोरोना वायरस ने रंग पकडऩा शुरू कर दिया। यह वुहान से बाहर अन्य स्थानों पर भी फैलना शुरू हुआ। केतु 23 सितम्बर तक इसमें गोचर करेंगे और यह समय एहतियात वाला है। राहु-केतु दोनों को रुद्र ग्रह बोला जाता है। यह शब्द संस्कृत की धातु रुद् से उत्पन्न है जिसका अर्थ है रोना। राहु सूर्य और चंद्र को नुकसान पहुंचाता है तो केतु नक्षत्रों को। 

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इस पूरे समय में राहु प्रलय के नक्षत्र अद्रा में चल रहे हैं। 20 मई तक वह इसी नक्षत्र में रहेंगे। इस नक्षत्र पर शिव का तांडव रूप है। इसका संबंध तारकासुर के साथ है, जिसे ब्रह्मा से अमरत्व मिला था। शिव पुत्र ही उसका वध कर सकता था, इसलिए देवों के सेनापति कार्तिकेय का जन्म हुआ। इस तरह यह समय एक महापुरुष के आने का भी संकेत कर रहा है। रुद्र हमेशा समाधिलीन शांत माने जाते हैं मगर राहु का वहां से गुजरना उन्हें उद्दीप्त कर रहा है। 

इस रूप में उनकी शक्ति काली हैं। शिव जब रुद्र रूप धारण करते हैं तो प्रकृति में सब तरफ तांडव होता है। राशियों पर भी इसका अच्छा-बुरा प्रभाव दिखता है। आद्रा से गुजरकर राहु भाद्रपद की ऊर्जा को खराब करते हैं। यह अस्पताल के बेड और मरीज की शैया का प्रतीक है। गुरु का उत्तरअषाढ़ा नक्षत्र में गोचर करना भी भाद्रपद को परेशानी में डालता है। इससे मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। 

बचा रहे है सूर्य
सूर्य भी भाद्रपदा नक्षत्र से गुजर रहे हैं। वह इस सौरमंडल में ऊर्जा का स्रोत हैं। इसी वजह से बड़ी संख्या में मरीज ठीक भी हो रहे हैं। सूर्य की इस स्थिति की वजह से 28 व 29 मार्च को चिकित्सा के क्षेत्र में कुछ बड़ी उपलब्धियां हो सकती हैं। मगर 31 मार्च से 13 अप्रैल तक सूर्य रेवती नक्षत्र में होंगे। यह मोक्ष का नक्षत्र है। यहां सूर्य कमजोर होंगे और संकट बड़ा रूप ले सकता है। मगर 14 अप्रैल से 27 अप्रैल तक वह अपनी उच्च राशि मेष के नक्षत्र अश्विनी से गोचर करेंगे। इस समय में कोई बड़ी उपलब्धि मिल सकती है। 

कुछ ज्योतिषीय उपाय
- अश्विनी नक्षत्र मंत्र, गायत्री मंत्र, सूर्य मंत्र का पाठ करें
- हवन में कर्पूर, लौंग और गाय के गोबर से बने उपले इस्तेमाल करें इस अग्रि को घर के प्रत्येक स्थान में लेजाकर शुद्ध करें
- भगवान कार्तिकेय की पूजा अर्चना, रुद्राभिषेक करें
- कुलदेवता व स्थान देवता की पूजा करें
- लौंग खाएं और इसके तेल लगाएं
- अश्विनी कुमार से संबंधित पौधा कोचलु घर में लगाओ
- घर में आम और नीम का पौधा लगाओ, नीम की पत्तियों का सेवन कर सकते हैं

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