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कोरोना लॉकडाउन में मजदूर बेहाल, योगेंद्र यादव ने मौजूदा त्रासदी की इस चित्र से की तुलना

  • Updated on 3/28/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। भारत में कोरोना कहर के बीच जिस तरह बिना तैयारी के अचानक देशभर में लॉकडाउन किया गया, उससे गरीब, मजदूरों का बुरा हाल हो गया है। रोजी-रोटी के लिए दूसरे प्रदेशों में काम करने के लिए गए ये मजदूर बेबसी में फंस गए हैं। लॉकडाउन के चलते इनका बुरा हाल है। लॉकडाउन के बीच जेब और पेट खाली हो चला है। राहत की उम्मीद छोड़ बैठे ये मजदूर अपने अपने गांव जाने को मजबूर हो गए हैं। ऐसे में सोशल मीडिया पर मिश्र के चित्रकार मुस्तफा जैकब का एक चित्र वायरल हो रहा है। इसमें मजदूरों की दुर्दशा को बखूबी बयां किया गया है। 

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इस चित्र में मजदूर का परिवार एक ब्लैड की धार पर चलता नजर आ रहा है। ब्लैड लहुलुहान हो रहा है और आगे कांटों की राह है। इस चित्र को स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव ने अपने ट्वीट में शेयर किया है और इसे अपने प्रोफोइल फोटो में लगाने का मन बनाया है। इसके साथ ही वह लिखते हैं कि यह चित्र आज के भारत की तस्वीर को बयान करता है।

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बता दें कि मिश्र के चित्रकार मुस्तफा जैकब ने यह चित्र 2016 में बनाया था। लेकिन, जिस तरह से कोरोना लॉकडाउन के बीच मजदूर गरीब शहरों से गांव की ओर पालयन करने को मजबूर हैं, उस माहौल में यह चित्र बहुत सटीक बैठता है। महाराष्ट्र और दिल्ली से जिस तरह से लोग अपने गृह प्रदेश जाने को मजबूर हो रहे हैं, उससे सरकारें भी चिंतित हैं। लेकिन, हालात संभाले नहीं, संभल रहे हैं। 

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दिल्ली सीमा पर बेरोजगार मजदूरों का हुजूम उमड़ रहा है। उन्हें कोरोना संक्रमण का कोई भय नहीं है। उन्हें सिर्फ अपने पेट और परिवार की चिंता हो रही है। अफवाहों के बाजार में ये लोगों मीलों पैदल चलकर ही अपने घर जाने को मजबूर हैं। सरकारों पर इन लोगों को कोई भरोसा नहीं हो रहा है। इन्हें लगता है कि अपने गांव घर में वे ज्यादा सुरक्षित रहेंगे, वर्ना शहर में तो कोरोना से पहले उनकी मौत भूख से हो जाएगी। बता दें कि शहरों में ज्यादातर मजदूर लोग किराए पर रहते हैं और ऐसे में बेरोजगारी में पेट भरने के साथ बढ़ता किराया भी उनकी कमर तोड़ देगा। मकानमालिक को तो अपने किराए से मतलब होता है।

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