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कोरोना की वजह से दुनियाभर में बढ़े मानसिक मरीज, पढ़ें स्पेशल रिपोर्ट

  • Updated on 3/26/2020

नई दिल्ली/प्रियंका। कोरोना की वजह से पूरे देश में लॉकडाउन जारी है। इस बीच लोग अपने घरों में रहने को मजबूर हैं। कोरोना के फैलने का जितना डर लोगों को बाहर जाने पर लग रहा है उतना ही मानसिक डर लोगों को अब घर में रहते हुए सताने लगा है।

दरअसल, लॉकडाउन के बाद लोगों पर आर्थिक मंदी ने तनाव बन कर हमला किया है। अब लोगों को अपनी रोजीरोटी की जुगाड़ के साथ-साथ कोरोना के डर से भी लड़ना है। वहीँ दूसरी तरफ पहले से मानसिक रूप से बीमार लोग इस महामारी के चलते और टेंशन में आ गए हैं।

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भारत में मानसिक रोगी
एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 15 करोड़ मानसिक रोगी हैं जिन्हें दवाओं की जरूरत हैं,  लेकिन सिर्फ 3 करोड़ को ही मेडिकल सुविधा मिल पाती है। वहीँ, इस बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पहले ही कह चुका था कि 2020 तक लगभग 20% भारतीय लोग मानसिक बीमारियों का शिकार होंगे। वहीँ इन रोगियों पर भारत में लगभग 9 हजार मनोचिकित्सक हैं। यानी 1 लाख लोगों पर सिर्फ एक डॉक्टर, मतलब हमारे यहां हजारों मनोचिकित्सकों की कमी है।

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डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट मेंटल हेल्थ इन इमरजेंसीज़ के अनुसार,  इमरजेंसी के शिकार सभी लोग मनोवैज्ञानिक/मानसिक तनाव झेलते हैं, जिसमें से ज्यादातर लोग कुछ समय बाद उससे बाहर निकल आते हैं। बता दें, ये रिपोट कोरोना वायरस के प्रकोप से पहले जारी की गई थी। लेकिन इसका संदर्भ आज के हालातों में समझा जा सकता है।

वहीँ, इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि लगातार दस सालों में इस तरह के तनाव झेलने वाले हर 11 में से एक व्यक्ति को मानसिक विकार (Mental Disorder) हो जाता है। इतना ही नहीं, हर पांच में से एक को डिप्रेशन, एन्जाइटी या सिजोफ्रेनिया होता है और इनमें भी औरतें पुरुषों के मुकाबले  अवसाद/डिप्रेशन की ज्यादा शिकार होती हैं।

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कोरोना के बाद बढ़े मानसिक रोगी
कोरोना वायरस के भारत में आने के बाद कई राज्यों से मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ी है हालांकि इस बारे में अभी कोई रिपोर्ट जारी नहीं की गई हैं। दरअसल, होम आइसोलेशनया क्वॉरन्टीन और घरों में बंद होने के चलते लोगों पर नकारात्मक असर हुआ है।  

न सिर्फ भारत में बल्कि चीन के वुहान में इस तरह के मामले ज्यादा सामने आए। क्योंकि वहां कोरोना का कहर अधिक था और इस दौरान अस्पतालों में मेडिकल स्टाफ और सुरक्षात्मक उपायों की कमी झेलते लोगों में ये तनाव घर कर गया।

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ऐसे बढ़ा मेंटल प्रेशर
वहीँ, कोरोना को लेकर सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों और गलत जानकारी की वजह से भी लोग मानसिक रूप से प्रेशर में आए और उन्हें डिप्रेशन की समस्या हुई। सिर्फ इतना ही नहीं, इस बीच मीडिया ने जो सही जानकारी भी लोगों तक पहुंचाई, उसने भी लोगों की मेंटल हेल्थ को बिगाड़ा है। हालात ऐसे भी बने कि लोग पेरानॉइड होने लगे और उनमें नेगेटिव क्यूरिऑसिटी बढ़ी।

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शारीरिक दूरी बनाए सामाजिक दूरी नहीं
इस बारे में एन्जाइटी एंड डिप्रेशन एसोसिएशन ऑफ अमेरिका से जुड़े विशेषज्ञ का कहना है कि लॉकडाउन के बारे में गलत जानकारी देकर लोगों को डराया गया है। लोग एक दूसरे से मिलने से डर रहे हैं जबकि इसका यह मतलब हरगिज नहीं है कि आप अपने आपको एकदम अकेला कर लें। आपको बस इतना करना होता है कि लोगों से आपको शारीरिक दूरी बनाए रखनी है ना की  सामाजिक दूरी। यानी लोगों से फिजिकल रूप से न मिले लेकिन उनके संपर्क में रहें।

इसके लिए सरकार द्वारा ये समझाया जाना चाहिये था कि लोग घरों में रह कर सोशल एक्टिव रहना है, फोन का इस्तेमाल करना है, वीडियो कालिंग आदि से सोशल रह कर फिजिकल डिस्टेंस बनाए रखना है।

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