भाजपा-अकाली गठबंधन में दरार, सियासत तेज

  • Updated on 1/30/2019

नई दिल्ली/(सुनील पाण्डेय)। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल एवं भारतीय जनता पार्टी के बीच अब सबकुछ ठीक नहीं है। वर्षों से चल रहे गठबंधन के बीच कड़वाहट बढ़ गई है। अकाली दल के राष्ट्रीय महासचिव एवं दिल्ली के विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा के द्वारा कल रात को किए गए ट्वीट के बाद सियासी महाभारत शुरू हो गया है। इसी को लेकर अकाली और भाजपा के रिश्तों में दरार खड़ी हो गई है। 

तख्त श्री हजूर साहिब व तख्त श्री पटना साहिब में महाराष्ट्र व बिहार सरकार द्वारा कमेटी सदस्यों की संख्या गुपचुप तरीके से बढ़ाने की हुई तैयारी से भड़के सिरसा ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को इस मामले में दखलंदाजी देने की पेशकश कर डाली है। साथ ही दोनों पार्टियों के बीच दरार बढ़ने का हवाला दिया था। इसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री आरपी सिंह ने सीधे अकाली दल पर पलटवार किया। साथ ही मीडिया के समक्ष साफ कहा कि आप गठंबधन तोड़ने की धमकी भी देते हो और केंद्र में भी रहते हो।

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उन्होंने कहा कि  तख्तों में भाजपा का कोई हस्तक्षेप नहीं है। लिहाजा, कोई भी शिकायत एवं आरोप तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि हर सिख अकाली नहीं है। ऐसा नहीं कि अकाली दल ही प्रधान बनेगा। बहुत लोग हैं, जो सिखी को मानते हैं। कोई भी हो सकता है। आरपी सिंह ने कहा कि गठबंधन तोडऩा है तो पहले सुखबीर बादल से बात करें, हरसिमरत कौर से बात करें। 

इसके अलावा हरसिमरत सरकार में बैठी हैं वहां मुददा उठा सकती हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार में भी रहें और गठबंधन तोडऩे की धमकी भी देते रहें। दूसरी ओर राष्ट्रीय सिख संगत के महासचिव अवतार सिंह शास्त्री ने मीडिया को जारी किए बयान में अकाली दल को खरी खरी सुनाई। साथ ही अकाली नेताओं से पूछा है कि गुरुद्वारों पर कब्जा करने का क्या उन्हें ठेका ले रखा है? अकाली दल के नेताओं ने डेरा सिरसा प्रमुख को माफी दिलवा कर शिरोमणि कमेटी पर अपने राजनीतिक कब्जे को साबित किया था।

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पंथ के खिलाफ काम करने वाले अकाली दल का सिखों पर क्या एकाधिकार है? एक तरफ सिरसा भाजपा कोटे से विधायक हैं और दूसरी ओर उसी पार्टी के खिलाफ वह बोलते हैं। वहीं शास्त्री ने बातचीत में यह भी दावा किया कि गठबंधन तो 25 अक्टूबर 2018 को ही टूट गया था, जब गुरू गोविंद सिंह के 350वें प्रकाश पर्व के मौके पर दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में राष्ट्रीय सिख संगत ने कार्यक्रम आयोजित किया था। तब अकाली नेताओं ने श्री अकालतख्त साहिब का हवाला देकर हमारे कार्यक्रम का बहिष्कार किया था। 

अकाली दल उसी दिन यह साबित कर दिया था कि वह हमारे गठबंधन के मित्र नहीं हैं।  हालांकि, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल हमेंशा कहते रहे हैं कि अकाली दल भाजपा का गठबंधन दो पार्टियों का गठबंधन नहीं बल्कि नाखून और मांस का रिश्ता है। लेकिन, दो दिनों से हो रही बयानबाजी से ऐसा लगने लगा है कि अब सबकुछ ठीक नहीं है। 

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पहले सिरसा खुद इस्तीफा देकर दिखाएं : सरना 
वहीं दूसरी ओर शिरोमणि अकाली दल दिल्ली के अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना ने सिरसा को नसीहत देते हुए कहा कि अब तुम गठबंधन तोड़ने की बात कर रहे हो तो तोड़ कर ही दिखाओ। सरना ने कहा कि अकाली दल की हालत खराब हो चुकी है इसलिए वह सिखों को बेवकूफ बनाने के लिए यह नाटक रचे हैं। उन्होंने सिरसा को ही कहा कि गठबंधन तोड़ना है तो पहले खुद इस्तीफा देकर दिखाएं, जो भाजपा कोटे से दिल्ली में विधायक हैं। 

अकालियों को डर, बड़े सिख नेता थाम सकते हैं भाजपा का दामन
दरअसल अकाली दल के वरिष्ठ नेता सुखदेव सिंह ढींढसा व 1984 सिख दंगा मामलों में पीड़ितों के वकील रहे हरविंदर सिंह फुल्का को पिछले दिनों भारत सरकार द्वारा पदम पुरस्कारों की सूची में शामिल करने के बाद अकाली दल को भय सता रहा है। अकाली दल को डर है कि कहीं भाजपा पंजाब में श्री गुरूग्रंथ साहिब की बेअदबी व अन्य मामलों में सिखों के बढ़ते रोष के कारण इन बड़े सिख चेहरों को लेकर आगामी लोकसभा चुनावों में उतरने की तैयारी तो नहीं कर चुकी है। 

फुल्का द्वारा आम आदमी पार्टी छोड़ते वक्त इस बात का ऐलान करना कि शिरोमणि कमेटी को बादल परिवार के कब्जे से मुक्त कराने की वह लड़ाई लड़ेंगे, यह ईशारा देने के लिए काफी है कि फुल्का कांग्रेस व अकाली दल की बजाय अगला चुनाव भाजपा के टिकट पर लुधियाना से लड़ सकते हैं।

वहीं ढींढसा ने भी यह साफ कर दिया है कि मौजूदा हालात में अकाली दल की नकारात्मक नीतियों के कारण उनके परिवार का कोई भी सदस्य संगरूर लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ेगा। जिसकारण यह संकेत मिल रहे हैं कि इन दो बड़ूे सिख नेताओं के साथ ही कई और चेहरे भी भाजपा का दामन थाम सकते हैं। इसलिए राष्ट्रीय सिख संगत के बयान के बाद यह बात साफ हो गई है कि गठबंधन की औपचारिक घोषणा होना ही बाकी रह गई है।

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