Thursday, Aug 18, 2022
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Dalit Chief Minister in Punjab and Challenges of Congress

पंजाब का प्रयोग और कांग्रेस की चुनौतियां

  • Updated on 9/20/2021

नई दिल्ली/शेषमणि शुक्ल। पंजाब में दलित मुख्यमंत्री देने से कांग्रेस के पक्ष में जितनी बातें जाती दिखती हैं, उससे कहीं ज्यादा उसके सामने चुनौतियां भी नजर आ रही हैं। पार्टी का दलित प्रेम कहीं बाकी जातियों का समीकरण न बिगाड़ दे, इसे लेकर पार्टी के भीतर भी चर्चा शुरू हो गई है। पंजाब के प्रयोग की सफलता-असफलता का आंकलन अगले साल होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणामों पर निर्भर करेगा।

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पंजाब में दलित समुदाय से आने वाले चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाना, कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक कहा जा रहा है। भाजपा हो या बसपा, अकाली हो या फिर आम आदमी पार्टी, सभी में कांग्रेस के इस पैतरे से बेचैनी साफ दिख रही है। लेकिन यह प्रयोग कहीं कांग्रेस के लिए ही भस्मासुर न बन जाए, इस बात की चर्चा भी तेज होती जा रही है। पंजाब में जाति-पात बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं दिखता, लेकिन सामाजिक तानाबाना, वैसे ही है, जैसे बाकी राज्यों में है। यहां भी दलितों की सामाजिक स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसे देश के बाकी हिस्सों में। इसलिए कांग्रेस का दलित प्रेम उसके सामने प्रभावशाली जातियों को संभालने की बड़ी चुनौती बन कर उभरती दिख रही है।

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जट सिख समुदाय से आने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटा कर दलित सिख चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया जाना निश्चित रूप से जट सिखों को बहुत पसंद नहीं आया होगा। विरोधी दल भी भले ही दलित मुख्यमंत्री पर सीधे निशाना साधने से बचें, लेकिन जट सिखों की भावना भडक़ाने का कोई कसर तो छोडऩे से रहे। ऐसे में कांग्रेस बाकी जातियों के साथ कैसे संतुलन बनाएगी, यह देखना होगा। चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने से पंजाब के सारे दलित कांग्रेस के पक्ष में आ जाएंगे, इसकी कोई गारंटी भी नहीं। लेकिन बाकी सिख वोट बंट जाएगा, यह निश्चित है। 

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2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पर मुस्लिम परस्त होने के आरोप लगे थे, जिसके चलते कांग्रेस से न केवल केंद्र की सत्ता खिसकी, बल्कि लोकसभा में सीटें भी घट कर 50 से कम हो गईं। चुनाव बाद पार्टी में हुए आंतरिक मंथन में यह बात साफ कही गई कि अधिसंख्य हिंदू छिटक गया। अब बाकी जातियों से संतुलन न बनाया गया तो दलित प्रेम कहीं कांग्रेस को भारी न पड़ जाए। यह चुनौती केवल पंजाब, यूपी, उत्तराखंड ही नहीं, देश के बाकी राज्यों में भी कांग्रेस के सामने है। 

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कांग्रेस अगर राजनीतिक रूप से भुना सकी तो पंजाब का उसका प्रयोग सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड पर पड़ सकता है। दोनों राज्यों में जाति आधारित राजनीति होती है। ठीक से काम और टिकट वितरण हुआ तो इन दोनों राज्यों की अधिकांश दलित जातियां कांग्रेस के पक्ष में जा सकती हैं। लेकिन जाति आधारित बसपा जैसे दल के उदय के बाद से दोनों राज्यों में बाकी जातियों का दलितों के साथ सामाजिक तानाबाना बिगड़ा पड़ा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का दलितों के साथ छत्तीस का आंकड़ा है तो पूर्वी यूपी में दलितों से उच्च जातियों का कोई तालमेल ही नहीं है। मुस्लिम समुदाय भी दलितों से एक दूरी बना कर रखता है। ऐसे हालात में दूसरी जातियों के छिटकने से उत्तराखंड में सत्ता में वापसी और यूपी में अपनी स्थिति मजबूत करने की कांग्रेस की लालसा धूल में मिल सकती है।
 

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