Thursday, Feb 09, 2023
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सोशल मीडिया के जरिए दिल्ली आर्काइव बढ़ा रहा है लोगों का ज्ञान

  • Updated on 7/17/2022

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। वर्तमान जमाना सोशल मीडिया का है। हम किताबों के जरिए जो ज्ञान बच्चों को नहीं दे सकते हैं वो एक पल में सोशल मीडिया के माध्यम से बच्चे सीख व समझ रहे हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार के दिल्ली अर्काइव विभाग (दिल्ली अभिलेखागार) द्वारा ट्विटर के जरिए लोगों को दिल्ली के इतिहास से ही नहीं बल्कि प्रमुख दस्तावेजों, चित्रों व घटनाओं से जोडऩे का लगातार प्रयास किया जा रहा है। दिल्ली अर्काइव के पेज पर जाकर आप ब्रिटिशकाल के दौरान भू राजस्व नीति को ही नहीं बल्कि प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर आखिरी मुगल शासक पर चलाए गए केस के दस्तावेजों को भी देख सकते हैं। आइए हम आपको बताते हैं कि दिल्ली अर्काइव पर आपको क्या-क्या प्रमुख जानकारियां मिल सकती हैं।
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राष्ट्र चिह्न कब हुआ मान्य
हाल ही में सेंट्रल विस्ट्रा में बनाए गए राष्ट्र चिह्न अशोक स्तंभ के शेरों के दांतों को लेकर सोशल मीडिया पर काफी बवाल मचा लेकिन बहुत कम लोगों को ये मालूम होगा कि सत्यमेव जयते लिखकर राष्ट्र चिह्न का प्रयोग 30 मई 1949 को किया गया था। इसके लिए जब आदेश पारित किया गया तो ब्रिटिश राज में प्रयोग होने वाले क्राउन के सिंबल को हटाया गया था। 

द्वितीय विश्वयुद्ध में मौसम संबंधी गतिविधियां
साल 1939 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरूआत की गई थी, तो मौसम संबंधी गतिविधियों की आवश्यकता काफी बढ़ गई थी। विशेष रूप से विमानन सेवाओं के लिए ये काफी आवश्यक था। इस दौरान लोघी रोड़ पर जमीन का एक टुकड़ा अधिग्रहित कर ब्रिटिश साम्राज्य ने वहां पायलट बैलून स्टेशन व सतह वेधशालाएं और पूर्वानुमान कार्यालय स्थापित किए थे, जिसका मैप दिल्ली अर्काइव में देखा जा सकता है।
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जानवरों के वध व मांस वितरण पर कानून
हाल ही में बकरीद यानि ईद-उल-अजहा का त्योहार गया है। बता दें कि 1890 में ईद-उल-अजहा को लेकर लोगों के लिए एक कानून बनाया गया था। जिसमें शहर के भीतर जानवरों के वध और मांस के वितरण के लिए विशेष कानून की उद्घोषणा की गई थी। यही नहीं इन नियमों का सख्ती से पालन करना भी आवश्यक था। इससे जूड़े दस्तावेज आप दिल्ली अर्काइव पर देख सकते हैं।

बहादुरशाह की गिरफ्तारी का आदेश
मुगल बादशाह ने 1857 की क्रांति के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों का साथ दिया था। जिसके चलते अंतिम मुगल बहादुरशाह की गिरफ्तारी का आदेश दिया गया था, जिसे यहां देखा जा सकता है। इस आदेश में साथ ही शाही परिवार के सदस्यों का पता लगाने के लिए तलाशी दलों को भेजने का आदेश दिया गया है और कहा गया है कि जफर के दो बेटे भाग निकले हैं लेकिन मिर्जा बख्तावर शाह और मिर्जा मंडू को गिरफ्तार कर गोली मारकर हत्या कर दी गई है। 

अंग्रेजों ने जारी किया जयप्रकाश नारायण पर लुकआउट नोटिस
अंग्रेजी हुकूमत ने साल 1942 में हजारीबाग सेंट्रल जेल से भागने पर जय प्रकाश नारायण पर लुकआउट नोटिस जारी किया था। जय प्रकाश के अलावा इसमें सुरज नारायण सिंह, गुलाली सुनार उर्फ गुलाबचंद गुप्ता, जोगेंद्र शुक्ल का नाम भी शामिल है। इन्हें बिहार क्रिमिनल इंटेलिजेंस गजट में 27 नवंबर 1942 को फोटो सहित प्रकाशित किया गया था।
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अतिरिक्त जेल के लिए उपायुुक्त को पत्र
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भारत में आजादी की मांग काफी तेज हो गई थी, आजादी की लड़ाई की आग में घी का काम भारत छोड़ो आंदोलन ने किया। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों की गिरफ्तारियां हुईं। ऐसे में जेल में जगह कम पडऩे लगी तो अंग्रेजी हुकूमत के मुख्य आयुक्त ने उपायुक्त को 3 अगस्त 1942 में पत्र लिखकर अतिरिक्त जेल आवास की तैयारी करने के लिए कहा था ताकि आकस्मिक परिस्थितियों से निपटा जा सके।

जामा मस्जिद को दिया था जॉर्ज पंचम ने दान
ब्रिटिश के पहले सम्राट जॉर्ज पंचम थे, जिनका राज्याभिषेक दिल्ली में किया गया था। इस दौरान भव्य दिल्ली दरबार का आयोजन किया गया। बकायदा कोनोवोकेशन पार्क की स्थापना सहित नई दिल्ली शहर को इस खुशी में बनाया गया था। वो जब दिल्ली पहुंचे तो उन्होंने जामा मस्जिद की प्रबंध समिति को एक प्रस्ताव पारित किया था। जिसमें उन्होंने जामा मस्जिद में मंच बनाने के लिए 3000 रूपए के करीब राशि उपहार स्वरूप दी थी।


 

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