dhirubhai ambani death anniversary

पुण्यतिथि विशेष : चाय पकौड़े बेचने वाला कैसे बना 75 हजार करोड़ का मालिक

  • Updated on 7/6/2019

नई दिल्ली/प्रियंका अग्रवाल। बड़े सपने देखिये क्योंकि बड़े सपने देखने वालों के सपने ही पूरे हुआ करते हैं। यह कहना है देश के एक ऐसे बिजनेसमैन का जिसने अपने विजन और मेहनत के दम पर रिलायंस इंडस्ट्रीज की नींव डाली। धंधे को सूंघ लेने का हुनर धीरूभाई में बचपन से ही था। उनका असली नाम धीरजलाल हीरालाल अंबानी है लेकिन उन्हें धीरू भाई के नाम से पुकारा जाता है।

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युवाओं के लिए हीरो से कम नहीं थे अंबानी

धीरूभाई अंबानी (Dhirubhai Ambani) के विश्वास और लोगों को जोड़कर रखने की उनकी काबिलियत का पता तब चला जब उन्होंने जूनागढ़ के नवाब के आदेश का विरोध किया। जूनागढ़ के नवाब ने अपनी रियासत में रैलियों पर पाबंदी लगा दी थी। धीरूभाई ने न सिर्फ इस पाबंदी का विरोध किया बल्कि तिरंगा फहराकर देश की आजादी का जश्न भी मनाया। उस वक्त धीरूभाई ने अपना पहला भाषण दिया। युवाओं के लिए धीरूभाई किसी हीरो से कम नहीं थे।

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आर्थिक परेशानियों के कारण छोड़ी पढ़ाई

धीरजलाल हीरालाल अंबानी उर्फ धीरू भाई का जन्म 28 दिसम्बर, 1932 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के छोटे से गांव चोरवाड़ में हुआ था। उनके पिता का नाम हीरालाल अंबानी और माता का नाम जमनाबेन था। धीरूभाई अंबानी के पिता एक शिक्षक थे। धीरूभाई के चार भाई-बहन थे। धीरूभाई का शुरूआती जीवन कष्टमय था। इतना बड़ा परिवार होने के कारण आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता था। पिता की गिरती सेहत और कमजोर माली हालत के कारण धीरूभाई को बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। स्कूल टीचर के बेटे होने के बावजूद धीरूभाई का दिमाग पढ़ाई में कम और धंधे में ज्यादा लगता था। 16 साल के धीरूभाई को समाजवाद और राजनीति काफी आकर्षित करती थी।

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पकौड़े बेचकर घर चलाया

धीरूभाई ने पढ़ाई छोड़ने के बाद फल और नाश्ता बेचने का काम शुरू किया। बाद में किशोर उम्र में उन्होंने गांव के पास एक धार्मिक स्थल पर तेल बेचकर पकौड़े की एक दुकान जमाई। इस दुकान से होने वाली कमाई से धीरूभाई अपने घर खर्च में हाथ बंटाते थे। धीरू भाई अंबानी ने इस काम को भी कुछ समय बाद बंद कर दिया। बिजनेस से मिली पहली दो असफलताओं के बाद धीरूभाई के पिता ने उन्हें नौकरी करने की सलाह दी।

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300 रुपये के लिए पेट्रोल पंप किया काम

धीरू भाई अंबानी के बड़े रमणीक भाई यमन में नौकरी किया करते थे। उनकी मदद से अपने सपनों को हकीकत बनाने के लिए उन्हें भी यमन जाने का मौका मिला। उन्होंने 300 रुपये प्रति माह के वेतन पर पेट्रोल पंप पर काम किया। महज दो वर्ष में ही अपनी योग्यता की वजह से प्रबंधक के पद तक पहुंच गए। इस नौकरी के दौरान भी धीरू भाई का मन इसमें कम और व्यापार में करने के मौकों की तरफ ज्यादा रहा। धीरू भाई ने उस हरेक संभावना पर इस समय में विचार किया कि किस तरह वे सफल बिजनेस मैन बन सकते हैं।

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बिजनेस को समझने के लिए पीते थे 1 रुपये की चाय 

एक घटना व्यापार के प्रति जुनून को बयां करती है- धीरूभाई अंबानी जब एक कंपनी में काम कर रहे थे तब वहां काम करने वाला कर्मियों को चाय महज 25 पैसे में मिलती थी, लेकिन धीरू भाई पास के एक बड़े होटल में चाय पीने जाते थे, जहां चाय के लिये 1 रुपया चुकाना पड़ता था। उनसे जब इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उसे बड़े होटल में बड़े-बड़े व्यापारी आते हैं और बिजनेस के बारे में बातें करते हैं। उन्हें ही सुनने जाता हूं ताकि व्यापार की बारीकियों को समझ सकूं। इस बात से पता चलता है कि धीरूभाई अंबानी को बिजनेस का कितना जूनून था।

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धीरूभाई ने ट्रेडिंग, इंपोर्ट-एक्सपोर्ट, होलसेल बिजनेस, मार्केटिंग, सेल्स और डिस्ट्रीब्यूशन की हर बारीकियां सीखीं। बाद में उन्होंने यहां अलग-अलग देशों के लोगों से करेंसी ट्रेडिंग भी सीखी। अपने हुनर को निखारते निखारते उन्हें यह समझ आ गया था कि ट्रेडिंग में उनकी खास दिलचस्पी है। 1954 में कोकिला बेन से विवाह करने के बाद उनके जीवन में एक नया मोड़ आया।

उनकी कंपनी ने उन्हें एडेन में शुरू होने वाली शेल ऑयल रिफाइनरी कंपनी में काम करने के लिए एडेन भेजा। यहां से ही धीरूभाई ने अपनी रिफाइनरी कंपनी का सपना देखना शुरू कर दिया था। 50 के दशक के बाद वह एडेन से देश वापस लौट आए।

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ऐसे बने टेक्सटाइल किंग

धीरूभाई को जब यह अहसास हुआ कि सिर्फ मसालों के कारोबार से बात नहीं बनेगी तो उन्होंने धागों के कारोबार में उतरने का फैसला किया। साल 1966 में अंबानी ने गुजरात के नरौदा में पहली टेक्सटाइल कंपनी शुरू की। ये उनके जीवन का सबसे मुश्किल काम था। संभवत: सिर्फ 14 महीनों में 10,000 टन पॉलिएस्टर यार्न संयंत्र स्थापित करने में विश्व रिकॉर्ड बनाया। ये मिल उनके लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। जिसके बाद उन्होंने इसे बड़े टैक्सटाइल एम्पायर के रूप में तब्दील किया और अपना खुद का ब्रांड 'विमल' लॉन्च किया। उन्हें दूसरे मिल मालिकों का विरोध झेलना पड़ा। इन मुश्किलों का धीरूभाई और उनकी टीम पर कोई असर नहीं पड़ा। उनकी टीम बिचौलियों को छोड़कर खुद रिटेलर्स को विमल के कपड़े बेचने लगी। इस बिजनेस की कामयाबी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई रिटेलर्स ने सिर्फ विमल के कपड़े ही बेचना शुरू कर दिया।

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70 करोड़ से 70 हजार करोड़ का सफर

धीरूभाई अंबानी की मेहनत और कामयाबी का असर रिलायंस इंडस्ट्रीज पर साफ नजर आया। अपने विजन के दम पर ही अंबानी रिलायंस इंडस्ट्री को इस मुकाम तक ले जा सके। 1970 के दशक तक कंपनी का कुल टर्नओवर 70 करोड़ हो गया। साल 2002 तक कंपनी का टर्नओवर 75,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। कंपनी की इस जबरदस्त ग्रोथ ने ही इसे दुनिया की 500 कंपनियों में स्थान हासिल कराया। रिलायंस ऐसा करने वाली पहली भारतीय निजी कंपनी है। साल 2006 में फोर्ब्स ने दुनिया के सबसे रईस लोगों की सूची में धीरूभाई को 138 स्थान दिया था। इस समय उनकी संपत्ति 2.9 बिलियन डॉलर थी। उसी साल 6 जुलाई को धीरूभाई अंबानी का निधन हो गया था।

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निजी जीवन

धीरूभाई अंबानी का विवाह कोकिलाबेन (Kokilaben) के साथ हुआ था और उनको दो बेटे हैं मुकेश अंबानी  (Mukesh Ambani) और अनिल अंबानी  (Anil Ambani) और दो बेटियाँ हैं नीना कोठारी और दीप्ति सल्गाओकर।

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अपने बच्चों को भी दी कामयाबी की सीख

कामयाबी कभी आसानी से नहीं मिलती। और जब बात देश का सबसे अमीर आदमी बनने की हो तो आपको इससे भी एक कदम आगे जाना होता है। धीरूभाई अंबानी (Dhirubhai Ambani) का यही मंत्र था। एक पिता के रूप में धीरूभाई ने यही सीख अपने बेटे मुकेश अंबानी को भी दी। इसी सीख के दम पर आज मुकेश अंबानी  देश के सबसे अमीर शख्‍स के रूप में जाने जाते हैं। मुकेश अंबानी के मुताबिक, अपने पिता से सीखी बातों के चलते ही वह आज कामयाबी के इस मुकाम पर पहुंचे हैं।

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जब लोगों ने धीरूभाई का एरोगेंस कहा

धीरूभाई अंबानी ने एक प्रेस कांफ्रेंस में मुस्कुराते हुए कहा था कि हमारे देश में लोग कहते हैं कि रिलायंस देश के उद्योगों का वो बुलबुला है जिसमें फूटकर छा जाने की कूवत है। मैं कहता हूं कि मैं वो बुलबुला हूं जो फूट चुका है। इस पर कई लोगों ने धीरूभाई का एरोगेंस कहा था। आलोचकों ने कहा कि ये ज्यादा दिन नहीं चलने वाला। वहीं, शक्की लोगों ने कहा कि बस ये बर्बाद होने वाला है। लेकिन आज रिलायंस देश का सबसे बड़ा उद्योग घराना है। इस देश के उद्योग के लिए अंबानी का नाम एक होप का नाम है।

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इंदिरा के करीबी थे अंबानी 

1980 में लोकसभा चुनाव के बाद धीरूभाई ने एक पार्टी रखी थी। इस पार्टी में इंदिरा गांधी भी आई थी। इस दौरान अंबानी और इंदिरा गांधी की एक तस्वीर भी सामने आई थी। तस्वीर में दोनों साथ में खाना खा रहे थे। कहा जाता है कि उस समय धीरूभाई अंबानी इंदिरा गांधी के काफी करीब थे, लेकिन एक बार अंबानी ने ये भी कहा था कि उन्हें इंदिरा गांधी और आर के धवन से नजदीकी होने का कभी फायदा नहीं मिला।

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मोदी-अंबानी की दोस्ती पर होती है आलोचना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता संभालने के बाद उद्योगपति अनिल अंबानी के प्रति लगाव पर विपक्ष ने हमेशा ही निशाना साधते रहे हैं। कई बार तो मोदी सरकार को रिलायंस या अंबानी की सरकार कहा जाता है। वहीं, प्रधानमंत्री मोदी की मुकेश अंबानी और नीता अंबानी से नजदीकियों को लेकर विपक्ष तंज कसता रहता है। 

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