Sunday, Jun 16, 2019

डा. अम्बेडकर की तीन ‘भविष्यवाणियां’

  • Updated on 4/19/2019

डा. भीम राव अम्बेदकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले प्रमुख लोगों में से एक थे। वह महात्मा गांधी से 22 वर्ष छोटे थे और उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को एक दलित परिवार में हुआ। उन्होंने कोलम्बिया यूनिवॢसटी, यू.एस.ए. तथा लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से इकोनोमिक्स में डाक्टरेट की 2 डिग्रियां हासिल कीं।

उन्होंने ग्रे’ज इन से कानून का अध्ययन किया और बैरिस्टर बने। उस समय वह इंगलैंड में रह रहे संभवत: सबसे अधिक शिक्षित भारतीय थे। वह ड्राङ्क्षफ्टग कमेटी के चेयरमैन थे और उन्हें भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पियों में से एक माना जाता है। यह दुनिया का बेहतरीन संविधान है। भारत ने शुरू से ही वयस्क मताधिकार को अपना लिया था जिसे आधुनिक समय में अन्य किसी भी देश ने नहीं अपनाया है। 

अमीर और गरीब, शिक्षित अथवा अशिक्षित सभी के लिए एक व्यक्ति-एक मत का सिद्धांत। बहुत से लोगों का मानना था कि एक गरीब देश जिसमें अधिकतर लोग अनपढ़ थे में यह विचार उचित नहीं था। उनका मानना था कि  इन अज्ञानी मतदाताओं को बेईमान लोग मूर्ख बना सकते हैं और इसके परिणामस्वरूप कुछ गलत लोग संसद के लिए चुने जा सकते हैं।

उस समय अम्बेदकर ने पैगम्बरी भविष्यवाणी करते हुए तीन चेतावनियां दी थीं। ये चेतावनियां थीं (ए) व्यक्तिवाद अथवा ‘भक्ति’ की परम्परा; (बी) गैर कानूनी चलन का जारी रहना जो ब्रिटिश राज के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में काफी प्रभावी साबित हुआ था; (सी) और राजनीतिक समानता के बीच सामाजिक और आॢथक असमानता का बढऩा। 

पहला आम चुनाव 
चुनाव आयोग भी भारतीय गणतंत्र से एक दिन पहले अस्तित्व में आया था। चुनाव आयोग को देश के नागरिकों को लोकतंत्र और चुनावों के लिए शिक्षित करना पड़ा। लोकसभा और प्रांतीय विधानसभाओं के लिए पहला आम चुनाव अक्तूबर 1951 तथा फरवरी 1952 के बीच हुआ। भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन के अनुसार, उस समय यह लोकतंत्र के इतिहास में सबसे बड़ा प्रयोग था।

17.6 करोड़ मतदाता थे जिनमें से 10.7 करोड़ (61 प्रतिशत) ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। कांग्रेस पार्टी ने 489 सीटों में से 364 सीटों पर जीत हासिल की।  

हालांकि कांग्रेस को केवल 45 प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन उसने तीन-चौथाई सीटें हासिल कर लीं। इसी प्रकार विधानसभाओं में भी कांग्रेस को जबरदस्त जीत हासिल हुई। कांग्रेस पार्टी की यह बड़ी जीत जवाहर लाल नेहरू की व्यक्तिगत प्रसिद्धि के कारण हुई थी। आज इसे नेहरू लहर का नाम दिया गया होता। 

स्वयं नेहरू को भी इस बात को लेकर संदेह था कि क्या चुनावी उन्माद भारत में  केवल तानाशाह या बहरे राजनेता तो पैदा नहीं करेगा। भारतीय गणतंत्र के 70 वर्षों में  ये शुरूआती संदेह झूठे साबित हुए हैं। 

जब चुनाव हार गए अम्बेदकर
पहले संसदीय चुनाव में हमने एक विसंगति भरी बात भी देखी जो स्वयं डा. अम्बेदकर की हार थी। वह बाम्बे नार्थ सैंट्रल लोकसभा क्षेत्र से शैड्यूल्ड कास्ट फैडरेशन पार्टी (जिसे बाद में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया का नाम दिया गया) से खड़े थे।

उन्हें चार कोणीय मुकाबले का सामना करना पड़ा जिसमें कांग्रेस उम्मीदवार नारायण सदोबा काजरोलकर 15,000 वोटों से जीते थे और अम्बेदकर चौथे नम्बर पर रहे। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह एक अजीब घटना थी कि भारत मां का एक होनहार सपूत जो काफी पढ़ा-लिखा, विद्वान और निडर नेता था तथा दलितों का मसीहा था, वह चुनाव नहीं जीत पाया। 

वास्तव में डा. अम्बेदकर एक बार दोबारा चुनाव हारे   जब वह 1954 में एक उपचुनाव में भंडारा  से खड़े हुए थे। दिसम्बर 1956 में उनकी मौत हो गई। वह राज्यसभा के सदस्य जरूर रहे। 

अम्बेदकर ने 1927 से ही दलितों को  विधानसभा में प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी थी लेकिन बाद में महात्मा गांधी के कहने पर उन्हें उनकी बात माननी पड़ी।

गांधी ने कहा था कि दलितों को हिन्दुओं में ही प्रतिनिधित्व मिलेगा न कि मुसलमानों और सिखों की तरह अलग प्रतिनिधित्व। इसके परिणामस्वरूप 1932 का मशहूर पूना पैक्ट सामने आया और उस समय अम्बेदकर ने लिखा था कि वह हिन्दू भारत में सबसे ज्यादा घृणित व्यक्ति हैं।

उन्होंने मनु स्मृति को जलाने वाले कार्यक्रम का नेतृत्व किया था जो जातिगत भेदभाव और छुआछूत को सही ठहराती है। यह उल्लेखनीय बात है कि  जिस व्यक्ति ने मनु स्मृति को जलाया था उसे भारतीय संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन बनाया गया। इसलिए अम्बेदकर के कभी भी संसदीय चुनाव नहीं जीतने के बावजूद देश उनकी योग्यता, बुद्धिमता और नेतृत्व से वंचित नहीं रहा। यही भारतीय लोकतंत्र की विशेषता है।                                 ---अजीत रानाडे

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