Sunday, Mar 29, 2020
due to this, the cm of jharkhand had to face defeat

इस वजह से झारखंड के सीएम को करना पड़ा हार का सामना

  • Updated on 12/27/2019

रघुवर दास 1995 में पहली बार जमशेदपुर से विधायक चुने गए, तब से उन्होंने राजनीति के अखाड़े में कभी पटकनी नहीं खाई। वे लगातार पांचवी बार इस क्षेत्र से विधानसभा चुनाव जीतते आए हैं। मामला तब बिगड़ गया जब विधानसभा चुनाव 2019 के चुनाव में रघुवर दास को हार का मुंह देखना पड़ा। आखिर जनता ने ये बदलाव क्यूं चाहा? जिसे 5 बार राज्य की सत्ता का स्वामी बनया उसे अचानक सत्ता से बाहर का रास्ता क्यूं दिखा दिया? 

सत्तामोह में स्वयं को इतना लीन न कर लें की मतदान की कतार में खड़ा अंतिम व्यक्ति आपको पहचानने से ही मना कर दे। चुनाव आते-आते नेताओं का अचानक ह्रदय परिवर्तन होना और मतदाताओं से चुनाव के समय अपनापन जनता को हजम नहीं होता। नेता को पार्टी कार्यकर्ताओं से संवादहीनता का भी भारी नुकसान उठाना पड़ता है। रघुवर दास की हार का सबसे बड़ा कारण यही रहा। रघुवर दास ने राज्य में बेशक अच्छा काम किया, उन्होंने आदिवासी वर्ग के लिए भी खूब काम किया इसके लिए उन्हें केंद्र से समय-समय पर मदद भी मिलती रही। उसके बाद भी उनकी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा बल्कि दास खुद अपनी सीट न बचा सके। जनता ने मुख्यमंत्री को सिरे से नकार दिया। 

कार्यकर्ताओं के बीच सामंजस्य बिठाने में हुए नाकाम
उनकी हार के पीछे की वजह उनकी योजना नहीं बल्कि एक नेता और कार्यकर्ताओं के बीच के सामंजस्य का न होना है। यही सामंजस्य अहम भूमिका निभाता है, दास की पार्टी इस बंधन से मुक्त हो गई। उनका हाशिए पर खड़े अंतिम व्यक्ति से संपर्क टूट गया। जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। किसी भी सक्रिय नेता का पहला काम यहीं होता है कि वो पहले अपने क्षेत्र की जनता बाद में राज्य की जनता के बीच जाए। उन्हें सुने उनकी बात को ऊपर तक पहुंचाए। जनता किसी भी प्रतिनिधि को सिर्फ इसलिए नहीं चुनती कि वो उन तक लाभकारी योजनाओं को पहुंचाएगा, बल्कि इसलिए चुनती है कि वो उनकी आवाज बन सके।  

जनता के बीच न जाने का भुगतना पड़ा खामियाजा
बस जनता और नेता के बीच का यहीं संपर्क नहीं टूटना चाहिए। जब ये संपर्क या यूं कहें की ये डोर टूट जाती है, तो पतंग का कटना तय माना जाता है। टूटी हुई पतंग को ढूंढने में आज के टाइम में कोई अपना समय बर्बाद नहीं करता, बल्कि नई पतंग उड़ाना ज्यादा पसंद करते है। कुछ यही रघुवर दास के साथ भी हुआ जब उनका जनता से संपर्क टूट गया, तो जनता ने नया नेता तलाश लिया। जनता ने उन्हें नकार दिया जो 5 बार विधायक रह चुके हैं, बल्कि उसका चुनाव किया जो उसकी बात को गंभीरता से सुन सके और जो जनता जिस तक आसानी से अपनी बात पहुंचा सके।

केंद्र से मिली योजनाओं को बताने में हुए असफल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड को कई सौगातें दी। उन्होंने राज्य के लिए नये विधानसभा भवन का लोकार्पण और सचिवालय के नये भवन का शिलान्यास किया। उन्होंने प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना के तहत 250 करोड़ रुपए का सीधा लाभ किसानों तक पहुंचाया। व्यापारी और स्वरोजगारियों के लिए राष्ट्रीय पेंशन योजना का शुभारंभ किया। साहेबगंज मल्टी मॉडल टर्मिनल का उद्घाटन करके झारखंड को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ दिया।

उन्होंने तीन साल में 462 एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों की स्थापना से जुड़ी योजना की शुरुआत कर आदिवासी समाज के लिए शिक्षा के अनेक अवसर पैदा किए। ये वो दौर है जब नेता काम कम और प्रचार ज्यादा कर अपनी राजनीति को चमका लेते हैं। उस दौर में रघुवर दास जनता तक किया हुआ काम भी नहीं पहुंचा सके। जिसका खामियाजा न सिर्फ उन्हें अपनी सीट गवा कर चुकाना पड़ा, बल्कि पार्टी की छवि को भी काफी छती हुई। -सोहित शर्मा

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