Sunday, Oct 17, 2021
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द्वारका बावली, जो बुझाती थी लोहारहेडी गांव के लोगों की प्यास

  • Updated on 9/16/2021

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। द्वारका उपनगरी, नाम आते ही दिखने लगती हैं बहुमंजिला इमारतें, चैडी सडकें, दुधिया रौशनी, बडे-बडे मॉल्स और व्यस्त मार्केट्स। लेकिन इस व्यस्ततम जगह के बीच चुपचाप और खामोशी में लिपटी एक ओर भी जगह है, जो कभी इस पूरे इलाके में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती थी पर आज भागती-दौडती जिंदगी और आधुनिक लाइफस्टाइल ने इसके महत्व को कहीं ना कहीं खत्म कर दिया है। ये जगह है द्वारका के सेक्टर 12 के पॉकेट-1 स्थित ‘द्वारका की बावली’। हालांकि कभी-कभार यहां धूमते-फिरते कुछ युवा सेल्फी व फोटोग्राफी करने आते हैं।
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16वीं शताब्दी में लोदी वंश के सुल्तानों ने करवाया था बावली का निर्माण
बता दें कि यह बावली आयतकार अनगढ पत्थरों से निर्मित है। तीन मंजिला बने इस बावली में एक कुआं है। इतिहासकार बताते हैं कि इस बावली का निर्माण 16वीं शताब्दी की शुरूआत में लोदी वंश के सुल्तानों द्वारा किया गया था। जिससे लोहारहेडी गांव के निवासियों यानि पश्चिमी दिल्ली के लोग अपनी प्यास बुझाया करते थे। बाद में इसी लोहारहेडी का नाम पप्पनकलां गांव पड गया। जिस पर दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा साल 1980 में द्वारका उपनगरी बनाने की शुरूआत की गई। बात यदि बावली के सिापत्य शैली की करें तो इसे पठान काल की बताया जाता है। बावली की आंतरिक माप उत्तर से दक्षिण 52 और पूर्व से पश्चिम 16‐6 मीटर है। इसमें उत्तर दिशा की ओर से सीढियां हैं जोकि सतह पर स्थित अष्टकोणीय टैंक तक जाती है। 22 सीढियों वाली इस बावली की खूबसूरती दो मेहराबों से काफी बढ जाती है। जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि इसकी आंतरिक दीवारों और मेहराबों पर पलस्तर किया गया होगा। इस बावली की देख-रेख की जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग, दिल्ली सरकार की है।
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दिल्ली सरकार ने इंटेक से करवाया था संरक्षण
कुछ साल पहले दिल्ली सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ ऑर्कियोलॉजी द्वारा नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटेक) दिल्ली चेप्टर के अंतर्गत प्रोजेक्ट शुरू कर इस बावली का जीर्णोद्धार किया था। इस बावली का जिक्र 1919 में छपी मौलवी जफर हसन की किताब ‘दिल्ली के स्मारक’ में बावली का उल्लेख मिलता है। उन्होंने दिल्ली की बावलियों को लेकर इसमें बेहतरीन ऐतिहासिक तथ्य देते हुए उस दौरान इनकी संख्या 100 बताई थी। लेकिन आज गिनती की बावलियां ही प्रकाश में है बाकी वक्त के थपेडों व शहर बनाने की होड के चलते जमीनदोंज हो गईं हैं। हैरानी की बात यह है कि इस इलाके में इस तरह के अन्य कोई भी ऐतिहासिक महत्व की इमारत देखने को नहीं मिलती है।
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नाममात्र बचा लोहारहेडी गांव
ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण व दिल्ली के इतिहास से रूबरू करवाने वाली संस्था विरासत के अध्यक्ष लखेंद्र सिंह ने बताया कि लोहारहेडी गांव के अब कोई अवशेष बचे नहीं हैं, सिर्फ जफर हसन की किताब से ही पता चलता है कि यहां कभी लोहारहेडी नाम का गांव था। रही बात पप्पनकलां गांव की तो इसे डीडीए द्वारा नाम दिया गया था। यदि द्वारका की बावली का संरक्षण सही तरीके से किया जाए तो आज भी इलाके में जल समस्या से बहुत हद तक निजात पाई जा सकती है। 
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कुछ फिल्मों व ऐड कंपनियों की भी हुई है शूटिंग
अगल-बगल की सोसायटी में रहने वाले लोगों ने बताया कि कभी-कभार यहां कुछ ऐड कपंनी वाले या फिर शॉर्ट मूवी बनाने वाले शूटिंग करते दिख जाते हैं। लेकिन जिन युवाओं को इस बावली के बारे में जानकारी है वो यहां आकर फोटोग्राफी और सेल्फी लेते हैं।
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बावली, जहां साफ दिखती है बदहाली
द्वारका बावली के लिए दुःखद बात यह है कि इसके अगल-बगल काफी लंबीं-लंबीं झाडियां उग आईं हैं, जिनसे ये नहीं पता चल पाता कि यहां ऐतिहासिक स्मारक है। दूर से देखने पर ये एक बदहाल जगह की तरह दिखता है। हालांकि सुरक्षा के मद्देनजर यहां एक सिक्योरिटी गार्ड नाम के लिए बैठाया गया है। वहीं अगर आप इस बावली को गूगल मैप में खोजेंगे तो खोजना असंभव हो जाएगा। दिल्ली सरकार के पुरातत्व विभाग को चाहिए कि वो पूरी सजगता के साथ इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने का प्रयास करें।
 

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