Monday, Mar 01, 2021
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बिहार की नई सरकार के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियां, करने होंगे आर्थिक मोर्चे पर विशेष प्रयास

  • Updated on 11/12/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) की जीत के बाद राज्य में एक बार फिर एनडीए (NDA) की सरकार बनने जा रही है। लेकिन इस बार एनडीए को बिहार में अधिक मेहनत करनी होगी। चुनाव के दौरान जनता से विकास का वादा करने वाली बीजेपी और जदयू को अब जमीनी स्तर पर उन काम भी करना होगा। 

पिछले पांच सालों के आंकड़ों को देखें तो बिहार में आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती, रोजगार की कमी, साक्षरता जैसी कई चुनौतियां का सरकार को सामना करना पड़ा था। अब फिर से यही समस्याएं नई सरकार के सामने हैं। इस बार एनडीए को इन सभी मोर्चों पर सफलता पाने के लिए अपना पूरा दम-खम दिखाकर राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में पिछड़ेपन से उबारना होगा। 

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प्रति व्यक्ति आय
बिहार में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का मात्र एक तिहाई है और यह भी राज्य में आर्थिक गतिविधियों की कमी को बताती है। बीते साल में, बिहार की प्रति व्यक्ति आय 31,287 रुपये थी। यह आय राष्ट्रीय औसत 94,954 की करीब 33 फीसदी थी। 

ये आंकड़े बताते हैं कि राज्य में आर्थिक गतिविधियां काफी सुस्त रहीं और राज्य की इसी आर्थिक निष्क्रियता से कई दूसरे क्षेत्रों पर इसका बड़ा असर देखने को मिला। बिहार में सबसे अधिक पिछड़पन साक्षरता के क्षेत्र में देखा गया। राज्य की साक्षरता दर 70.9 फीसदी है, जो कि देश में तीसरी सबसे कम है।

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बैंक भी हुए लाचार 
बिहार में 2018-19 में वाणिज्यिक बैंकों ने 3,53,279 करोड़ रुपये जमा किए थे लेकिन इनमें से केवल 1,20,287 करोड़ का कर्ज बैंकों द्वारा बांटा जा सका। राज्य का कुल ऋण जमा अनुपात महज 34 फीसदी बना जो अखिल भारतीय औसत 78.2 फीसदी था। 

जबकि तमिलनाडु और महाराष्ट्र में ऋण जमा अनुपात 109.7 फीसदी और 106.5 फीसदी रहा था। इन आंकड़ों से पता चलता है कि बैंकों ने तमिलनाडु और महाराष्ट्र में बिहार से कुल जमा से अधिक राशि उधार पर दी। बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, बैंकों का ये स्टेटस बताता है कि बैंक बिहार में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए अपने संसाधनों का भी पूरा उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।

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महिलाओं की साक्षरता 
बिहार में साक्षरता दर 70.9 फीसदी है। यह देश में तीसरा सबसे कम प्रतिशत है। जबकि महिलाओं में, यह दर 60.5 फीसदी है। जिसका मतलब है बिहार की पांच में से दो महिलाएं पढ़-लिख नहीं सकतीं। यह आंकड़े बिहार में सबसे कम महिला श्रम शक्ति भागीदारी को दिखाता है। जबकि महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में 6.4 फीसदी और 3.9 फीसदी है।

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