Sunday, Feb 23, 2020
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संपादकीय: आर्थिक हालात : ‘चाल और नसीब’ अच्छा नहीं

  • Updated on 1/19/2020

नई दिल्ली/आलोक जोशी। परिस्थिति यहां तक पहुंच जाएगी, किसी ने सोचा भी नहीं था। ज्यादा दूर क्यों जाएं, अभी कुछ ही महीने पहले ऐसा लगता नहीं था कि भारत किसी गंभीर आर्थिक संकट में फंस सकता है लेकिन आज इस असलियत से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि संकट भी है और गंभीर भी। तमाम आशंकाओं को गलत बताने के बाद अब सरकार को मानना ही पड़ रहा है। और अब तो यह खबर पक्की है कि आर्थिक मोर्चे पर यह साल पिछले 11 सालों में सबसे खराब रहने वाला है। यानी पिछली दो सरकारों के कार्यकाल में ऐसा बुरा वक्त कभी नहीं आया। देश में सर्वे करने वाली सबसे बड़ी सरकारी एजैंसी एन.एस.एस.ओ. यानी राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन का कहना है कि इस साल देश की जी.डी.पी. ग्रोथ की रफ्तार 5 प्रतिशत रहने वाली है। और एक ही दिन बाद विश्व बैंक ने भी एकदम यही बात दोहरा दी।

इससे पहले जब भारत की अर्थव्यवस्था में ब्रेक लगा और उसकी स्पीड इससे कम हो गई थी, वह साल 2008-09 की बात है, जब जी.डी.पी. ग्रोथ गिरकर 3.1 प्रतिशत हो गई थी। लेकिन वह साल था पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी का। लीमन ब्रदर्स के बर्बाद होने और फ्रेडी फैनी घोटाले यानी सब प्राइम संकट की वजह से अमरीका और उसके बाद पूरी दुनिया को लगे तगड़े झटके का साल। उतना गिरने के बाद भी तब भारत की रफ्तार बाकी दुनिया से बेहतर थी और उस वक्त इस बात पर भारी संतोष जताया गया था कि दुनिया भर में महामारी की तरह फैले आर्थिक संकट से भारत लगभग अछूता रह गया क्योंकि रिजर्व बैंक के गवर्नर वाई.वी. रेड्डी ने तमाम दबाव के बावजूद वही फैसले किए थे जो उन्हें सही लग रहे थे। वक्त ने भी बहुत लंबा इंतजार नहीं किया उन्हें सही साबित करने में।
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लेकिन इस बार वक्त की चाल और नसीब का हाल भी कुछ अच्छा नहीं दिख रहा है। विश्व बैंक का अनुमान पहले यह था कि इस साल यानी 2019-20 में भारत की अर्थव्यवस्था 6 प्रतिशत की दर से बढ़त दर्ज करेगी लेकिन बैंकों के बाहर कर्ज देने वाली कम्पनियों यानी एन.बी.एफ.सी. का हाल देखकर उसने अपना अनुमान बदल कर अब पांच प्रतिशत कर दिया है। हाल का मतलब है इन फाइनांस कम्पनियों से निकलने वाले कर्ज का हाल। साफ है न तो बैंकों से कर्ज लेने वाले बढ़ रहे हैं और न ही एन.बी.एफ.सी. यानी नॉन-बैंकिंग कम्पनियों से।

इस पर कई बार बात हो चुकी है लेकिन बताना जरूरी है कि कर्ज न बढऩा उनके लिए तो अच्छी बात हो सकती है जो अपना जीवन कर्ज मुक्त रखना चाहते हैं लेकिन अर्थव्यवस्था में कर्ज का बढऩा अच्छा माना जाता है। यह इस बात का संकेत है कि व्यापारियों और उद्योगपतियों को भविष्य अच्छा दिख रहा है और वे ब्याज पर पैसा उठा कर भी व्यापार बढ़ाना चाहते हैं। यानी वे इतना जोखिम उठाने को तैयार हैं कि मूलधन के साथ ब्याज जोड़कर भी लौटाएंगे, तब भी उसके ऊपर मुनाफा कमाएंगे, घाटे का सौदा नहीं होगा। इसीलिए बैंकों को अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है और उनसे बंटने वाले कर्ज की मात्रा को तरक्की का पैमाना। यह पैमाना इस वक्त हाल अच्छे नहीं दिखा रहा है।
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अब आप पूछेंगे कि इसका इलाज क्या है। तो इलाज जो थे, वे बहुत लोग बहुत समय से सुझा रहे थे। मगर इस वक्त तो यही कहा जा सकता है कि बहुत देर हो चुकी है। यूं तो वे घर की मुर्गी दाल बराबर थे लेकिन अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद से देश में अभिजीत बनर्जी की बातें ध्यान से सुनी जाने लगी हैं। उनका कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था एक गंभीर मंदी की कगार पर पहुंच चुकी है। ऐसे में जरा-सी चूक भी महंगी पड़ सकती है लेकिन वह जो उपाय सुझा रहे हैं वह बहुत से अर्थशास्त्रियों को रास नहीं आएगा। खासकर उनको जो आर्थिक मोर्चे पर अनुशासन के पैरोकार हैं। 
अनुशासन का मतलब यह है कि सरकार अपनी चादर से ज्यादा पैर न पसारे। यानी जितनी कमाई हो उसी के हिसाब से खर्च भी किया जाए। यह किस्सा दरअसल भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से ज्यादा सुना जाता है। उससे पहले तो यही पढ़ा-सुना जाता था कि देश को तेजी से तरक्की करनी है तो घाटे की अर्थव्यवस्था ही काम आएगी। दोनों ही विचारों के अपने-अपने फायदे हैं और भारत ने वे फायदे देखे भी हैं। अब भी कोई यह नहीं कहता कि देश का बजट फायदे का बजट बन जाए लेकिन अनुशासन के समर्थक कहते हैं कि सरकारी घाटे का जो लक्ष्य तय किया गया है उसके भीतर ही गुजारा होना चाहिए। 

देश भर में होने वाले कुल लेन-देन की रकम, जिसे जी.डी.पी. कहते हैं, उसके लगभग सवातीन प्रतिशत से ज्यादा का घाटा नहीं होना चाहिए। सरकारने इस साल घाटे का लक्ष्य 3.3 से कम करके 3.2 प्रतिशत कर दिया था लेकिन अभी तक के हिसाब-किताब से साफ  है कि यह लक्ष्य कतई पूरा नहीं होने वाला है। अभिजीत बनर्जी का कहना है कि इस हाल में सरकार को इस लक्ष्य की चिंता करनी भी नहीं चाहिए। यह बहुत हिम्मत के साथ फैसले करने का समय है। सरकार को पूरा जोर इस बात पर लगाना चाहिए कि कैसे बाजार में मांग वापस आए और कैसे इकोनॉमी दोबारा रफ्तार पकड़े। इसके लिए उसे अर्थशास्त्र के नियमों और अनुशासन को तार-तार करना पड़े तब भी कोई बात नहीं। 
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तिमाही नतीजों का सिलसिला शुरू हो चुका है। इन्फोसिस ने शानदार नतीजे भी दिए और अगली तिमाही में अच्छे कारोबार की उम्मीद भी जताई है लेकिन जानकारों का अनुमान है कि कुल मिलाकर नतीजे अच्छे नहीं दिख पाएंगे, उन्हें लगता है कि कम्पनियां इस बार बिक्री और मुनाफे दोनों में गिरावट ही दिखाएंगी। हालांकि बाजार में ईरान का झटका लगने के बाद फिर जोरदार तेजी की लहर दिख रही है लेकिन यह बजट के पहले होने वाली सट्टेबाजी भी है, इसमें छोटे निवेशकों को बहुत सावधान रहना चाहिए और खासकर टी.वी. या व्हाट्सएप पर आने वाली खरीद की सलाहों से बचकर सिर्फ किसी भरोसेमंद निवेश सलाहकार की ही सुननी चाहिए। 

सलाह एकदम वाजिब है। नुस्खा काम भी कर सकता है लेकिन समस्या यह है कि इस वक्त देश में एक तरफ सी.ए.ए. और एन.आर.सी. की कॉकटेल का जबरदस्त विरोध और जवाब में समर्थन का आंदोलन चल रहा है तो दूसरी तरफ  जामिया और जे.एन.यू. के चक्कर में छात्रों का आंदोलन लगातार विकराल होता जा रहा है। यह एक ऐसी चीज है जो अगर फैल गई तो अच्छी-खासी चलती इकोनॉमी को पटरी से उतार सकती है और यहां तो हाल पहले ही बेहाल है। 
 

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