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Eid al-Adha 2020: जानें कैसे शुरू हुई कुर्बानी देने की परंपरा

  • Updated on 8/1/2020

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। मुस्लिम धर्म में बकरीद प्रमुख त्योहारों में एक है जो मीठी ईद के करीब 2 महीने बाद मनाई जाती है। बकरीद को ईद-उल-अजहा के नाम से भी जाना जाता है। मुसलमानों का यह प्रमुख त्यौहार इस बार ज्यादातर देशों में 31 जुलाई को मनाया जाएगा। दरअसल ईद की तारीख चांद का दीदार करने के बाद तय होती है। ऐसे में वहीं भारत में बकरीद एक अगस्त को मनाए जाने की उम्मीद है। मुसलमान यह त्यौहार कुर्बानी के तौर पर मनाते हैं जिसमें लोग नमाज अदा करने के बाद बकरे की कुर्बानी देते हैं।

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ऐसे शुरू हुई थी बकरे की कुर्बानी
इस्लामिक धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पैगंबर हजरत इब्राहिम से ही कुर्बानी देने की परंपरा की शुरुआत हुई थी। माना जाता है कि इब्राहिम अली सलाम की कोई औलाद नहीं थी और उन्हें कई मिन्नतों के बाद पुत्र की प्राप्ति हुई पुत्र का नाम उन्होंने इस्माइल रखा। इब्राहिम अपने बेटे इस्माइल से बेहद प्यार करते थे वहीं एक रात अल्लाह ने इब्राहिम के सपने में आकर उनसे उनकी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी मांगी।

इब्राहिम ने अल्लाह के आदेश के अनुसार अपने सभी प्यारे जानवरों की कुर्बानी एक-एक कर दे दी लेकिन बाद में एक बार फिर अल्लाह इब्राहिम के सपने में आए और फिर से उससे सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी मांगी।

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सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी
इब्राहिम अपने बेटे इस्माइल से बेहद प्यार करता था लेकिन अल्लाह के आदेश के अनुसार वह अपने बेटे की कुर्बानी देने को भी तैयार हो गए, लेकिन इब्राहिम ने कुर्बानी देते समय अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली और जब कुर्बानी देने के बाद इब्राहिम ने अपनी आंखों की पट्टी खोली तो उन्होंने देखा कि उनका बेटा तो जीवित है यह देखकर वे बेहद खुश हुआ हुए।

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इब्राहिम की कुर्बानी को याद कर मनाया जाता है बकरीद
इस घटना को देखते हुए यह माना जाता है कि अल्लाह ने इब्राहिम की निष्ठा देख उसके बेटे की जगह कुर्बानी को बकरे से बदल दिया था। तब से ही बकरीद पर बकरे की कुर्बानी देने की परंपरा चली आ रही है। यही कारण है कि मुसलमान बकरीद के दिन इब्राहिम द्वारा दी गई कुर्बानी को याद करते हुए बकरों की कुर्बानी देते हैं।

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