Saturday, Mar 23, 2019

पुलवामा आतंकी हमले के बाद बदल गए ‘चुनावी मुद्दे’ 

  • Updated on 3/6/2019

पुलवामा में 14 फरवरी को हुए आतंकवादी हमले तथा उसके बाद भारत की बदले की कार्रवाई के पश्चात रातों-रात चुनावी मुद्दे बदल गए। अब यह स्पष्ट है कि राफेल घोटाला, नौकरियां, ग्रामीण संकट जैसे पहले वाले मुद्दे आतंकी कथानक की पृष्ठभूमि में चले गए हैं, जो वर्तमान में सत्ताधारी भाजपा तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लाभ पहुंचा रहा है।

युद्ध जैसी स्थिति से निपटने के लिए आम तौर पर सत्ताधारी पार्टी को लाभ पहुंचता है क्योंकि देश में आवेश का माहौल होता है। उन्हें एक मजबूत नीति की जरूरत होती है। ऐसा 1971 में बंगलादेश के युद्ध में हुआ था जब इंदिरा गांधी को हर ओर से प्रशंसा मिली थी।

विद्रोह के लिए योजना बनाने हेतु अप्रैल से दिसम्बर 1971 तक का समय लगा। इसे इतना अधिक गोपनीय रखा गया कि इसकी सुगंध अमरीकी विदेश मंत्री किसिंजर को भी नहीं लगी थी जब जुलाई 1971 में वह इंदिरा गांधी से मिले थे।

अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन इतने परेशान थे कि उन्होंने इंदिरा गांधी को ‘एक डायन तथा एक कुतिया’ तक कह डाला था।
अटल बिहारी वाजपेयी को भी कारगिल युद्ध के दौरान सारे देश का समर्थन मिला था और उनकी पार्टी भाजपा ने 1999 में लोकसभा चुनाव जीते थे हालांकि वह अपनी सीटों की संख्या नहीं बढ़ा पाए थे।

भाजपा ने कारगिल युद्ध में विजय का खूब जोर-शोर से प्रचार किया हालांकि यह सर्वविदित है कि युद्ध की समाप्ति अमरीकी राष्ट्रपति बिल किं्लटन के दखल के बाद हुई थी, जो परमाणु शक्तियों के बीच पूर्ण युद्ध को टालना चाहते थे।

अब दावा करने की बारी मोदी की
अब विजय का दावा करने की बारी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की है, यद्यपि यह स्पष्ट है कि दोनों देशों ने अमरीका तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों के दबाव के बाद पीछे हटने का फैसला किया, जो युद्ध को रोकना चाहती थीं।

भाजपा का मानना है कि बालाकोट हवाई हमले के बाद मोदी की वापसी के अवसर कहीं अधिक बेहतर हुए हैं क्योंकि वह देश को प्रभावपूर्ण संकेत भेजने में सफल हुए हैं कि वह एक मजबूत नेता हैं।

पुलवामा से पूर्व मोदी राजनीतिक रूप से असुरक्षित स्थिति में थे, विशेष कर दिसम्बर में हिन्दी पट्टी के तीन महत्वपूर्ण राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश में पराजय के पश्चात। नौकरियों तथा कृषि संकट को लेकर किए गए बड़े-बड़े वायदों को पूरा न करने के कारण लोगों का धीरे-धीरे मोदी सरकार से मोहभंग हो रहा था। उन्हें जरूरत थी सत्ता विरोधी लहर से निपटने की।

हालांकि पुलवामा के बाद ये सब कुछ बदल गया। पहले भाजपा अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने बारे सोच रही थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.), जो मतदाताओं को लुभाने के लिए ‘मंदिर तथा गाय’ के विमर्श को भुनाना चाहता था, ने अब अपना ध्यान आतंकवाद को प्राथमिकता देने पर केन्द्रित कर लिया है।

22 फरवरी को संघ की एक आंतरिक बैठक में आतंकवाद से निपटने के लिए एक स्थिर सरकार की जरूरत पर ध्यान केन्द्रित करने हेतु प्रचार अभियान को नया रूप दिया गया।

राष्ट्रवाद को भड़काने का प्रयास
दूसरे, हमले के बाद भाजपा राष्ट्रवाद को भड़काने तथा पाकिस्तान के खिलाफ देश में गुस्से का इस्तेमाल करने का प्रयास कर रही है। बालाकोट हवाई हमलों के साथ मोदी ने चुनावों के लिए अपना राजनीतिक आलेख पक्का कर लिया है।

उन्होंने 2002 में गुजरात में अपने प्रचार अभियान में भी मतदाताओं का सफलतापूर्वक ध्रुवीकरण करने के लिए ‘मियां मुशर्रफ’ कथानक का इस्तेमाल किया था। पार्टी शक्तिशाली प्रधानमंत्री की उपलब्धियों तथा उनकी मजबूत नीतियों का प्रचार कर रही है।

तीसरे, यद्यपि कांग्रेस सहित विपक्ष ने पुलवामा हमले के शीघ्र बाद सरकार का समर्थन किया था, कुछ ही दिनों में उन्होंने मोदी की आलोचना शुरू कर दी। अब चुनावों के लिए पुलवामा मुद्दे का राजनीतिकरण करने के लिए भाजपा तथा विपक्ष के बीच एक-दूसरे पर आरोप लगाने की होड़ मची है। गत सप्ताह एक बैठक के बाद 21 विपक्षी दलों ने एक वक्तव्य जारी किया था कि ‘राष्ट्रीय सुरक्षा को संकीर्ण राजनीतिक चिंताओं से आगे रखना होगा।’

विपक्ष की रणनीति
भाजपा के सुरक्षा कथानक द्वारा विपक्ष का विकट उखाड़ दिया गया है और इसका सामना करने के लिए अब इसने अपना खुद का कथानक तैयार करने की योजना बनाई है। कांग्रेस के भीतरी लोगों का दावा है कि विपक्ष के पास दागने के लिए अधिक असला है, जिसमें से अधिकतर खुद भाजपा ने तैयार किया है।

पहला कदम हवाई हमले के दावों बारे संदेह उठाना है। कांग्रेस का कथानक मोदी के दावों को टुकड़े-टुकड़े करना तथा सुरक्षा एजैंसियों की असफलता पर प्रश्र उठाना है जैसा कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने स्वीकार किया है। मोदी की सुरक्षा रणनीति को लेकर पहले ही कई आवाजें उठनी शुरू हो गई हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पुलवामा आतंकी हमले के समय को लेकर प्रश्र उठाते हुए पूछा है कि क्या सरकार युद्ध करना चाहती है, जब लोकसभा चुनाव सिर पर हैं। अन्य विपक्षी नेता भी इस राग में शामिल हो गए हैं।

विपक्ष का मानना है कि मोदी के लिए अगले दो महीनों के लिए बनने वाले इस आवेग के आगे टिक पाना कठिन होगा और विपक्ष के पास उन पर प्रहार करने के लिए पर्याप्त समय होगा। इसलिए राफेल जैसे अन्य मुद्दे कभी न कभी सामने आ सकते हैं।

मगर यह एक चुनौती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के कथानक को इतनी जल्दी कैसे बदला जाए तथा स्थानीय व घरेलू मुद्दों और मोदी सरकार की असफलताओं को वापस सामने लाया जाए। बिन्दू यह है कि भाजपा के राष्ट्रीय सुरक्षा के कथानक पर प्रश्र उठाना जोखिमपूर्ण होगा।

इसे नौकरियों जैसे अन्य मुद्दों की प्राथमिकता बहाल करने के लिए अन्य रास्ते तलाशने होंगे। इसका कथानक काम करता है यह तो मतपेटियां खुलने के बाद ही पता चलेगा लेकिन विपक्ष के सामने भाजपा की मेल-मिलाप की रणनीति का सामना करने की चुनौती है।                                                                                                           ---कल्याणी शंकर

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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