Monday, Jan 21, 2019

भाजपा को अब नीतीश की और भी अधिक जरूरत

  • Updated on 12/18/2018

भाजपा के पास झारखंड में सुदेश महतो की ए.जे.एस.यू. पार्टी तथा बिहार में राम विलास पासवान की लोजपा  जैसे छोटे सांझीदार हो सकते हैं लेकिन यदि आप हिंदी पट्टी के प्रमुख राज्यों  उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखंड तथा छत्तीसगढ़ पर नजर डालें तो भाजपा के साथ अब केवल नीतीश कुमार एकमात्र बड़े सहयोगी बचे हैं।

इसके साथ ही लोकसभा चुनावों की ओर जाते हुए बिहार के मुख्यमंत्री एकमात्र ऐसे व्यक्ति हो सकते हैं जो बिहार में घिरी हुई भाजपा के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। 

जैसे-जैसे विधानसभा चुनावों के परिणाम आने लगे तथा मंगलवार को जश्र के तौर पर पटना स्थित राजद तथा कांग्रेस कार्यालयों में पटाखे चलने लगे, जद (यू) कार्यालय चुप लेकिन आश्वस्त नजर आया कि उनके सहयोगी की निराशा उन पर असर नहीं डालेगी। एक भाजपा नेता ने स्वीकार किया कि चुनाव परिणामों ने साबित किया है कि हमें बिहार में अन्य के मुकाबले नीतीश कुमार की और अधिक जरूरत है। 

खराब समय में मिली हार
एक जद (यू) नेता महसूस करते हैं कि ङ्क्षहदी पट्टी में पराजय ऐसे खराब समय में नहीं आनी चाहिए थी जबकि लोकसभा चुनाव अब से लगभग 4 महीनों बाद होने हैं। ऐसा दिखाई देता है कि भाजपा की हार उसी पद्धति का अनुसरण कर रही है जो एक के बाद एक लोकसभा उपचुनावों में पराजयों के उपरांत पड़ोसी उत्तर प्रदेश में उभरी थी।

मगर उत्तर प्रदेश के विपरीत, जब  समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी की सांझी शक्ति ने इस वर्ष लोकसभा उपचुनावों में भाजपा को रौंद दिया था, उसकी तीन हिंदी भाषी राज्यों में पराजय ऐसे समय में हुई है जब उसके खिलाफ कोई गठबंधन नहीं था। तीनों राज्यों में कांग्रेस बनाम भाजपा थी और कांग्रेस ने सत्ता  हथिया ली। 

एक जद (यू) नेता ने कहा कि अभी भी प्रधानमंत्री मोदी देश में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हो सकते हैं लेकिन एक स्पष्ट संकेत है कि तथाकथित मोदी लहर हर कहीं उतार पर है। इससे भगवा पार्टी के लिए बिहार में अपना किला बचाने के लिए नीतीश कुमार एकमात्र विकल्प बच जाते हैं, जो एक ऐसा राज्य है जहां से 40 लोकसभा सांसद चुने जाते हैं। 

भाजपा-नीतीश की सांझी ताकत
उपेन्द्र कुशवाहा के पहले ही गठबंधन से बाहर होने के साथ बिहार में राजग के वर्तमान में  जद (यू) के 2 सहित 30 लोकसभा सदस्य हैं। अतीत के परिणामों पर नजर डालें तो एक मजबूत अवधारणा है कि भाजपा तथा नीतीश कुमार की सांझी ताकत विरोधियों से निपटने के लिए बहुत है।

जहां इस तर्क से पूरी तरह से इंकार नहीं किया जा सकता, वहीं पटना में महागठबंधन के नेताओं को आशा है कि यदि भाजपा का भाग्य गोता लगाता है तो बिहार में राजनीतिक तराजू उनके पक्ष में झुक सकता है। 

अब जो स्थिति है, बिहार की दो महत्वपूर्ण क्षेत्रीय ताकतों जद (यू) तथा राजद के निष्ठावान वोट बैंक हैं। दूसरी ओर कांग्रेस तथा भाजपा का कुछ समर्थन आधार, मध्यम वर्ग तथा उच्च जातियां, बदलाव के लिए जाना जाता है। यहां तक कि एक मामूली-सा बदलाव भी बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। 

जब जुलाई 2017 में नीतीश राजग में शामिल हुए थे, जद (यू) में इस बात को लेकर संदेह था कि उनकी पार्टी कहीं भगवा दल के हाथों में तो नहीं खेलेगी। एक वर्ष से भी अधिक समय से राजनीतिक विशेषज्ञ कहीं अधिक विनम्र नीतीश कुमार की ओर से संकेतों का इंतजार कर रहे हैं।  

तिनके का सहारा
अक्तूबर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने जाहिरा तौर पर उदारता का मुखौटा पहन लिया जब उन्होंने घोषणा की कि दोनों पाॢटयां बिहार में बराबर सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ेंगी। लेकिन अब, जब भाजपा तीन ङ्क्षहदी भाषी राज्यों में धूल फांक रही है, नीतीश कुमार एक बार फिर एकमात्र तिनका बन गए हैं, जिसे भाजपा अपना प्रिय जीवन बचाने के लिए थामेगी। 

जद (यू) के विश्वास को भी बल मिला है जिसने 2014 के लोकसभा चुनावों में मात्र 2 सीटें प्राप्त की थीं, जो अब तक का इसका सबसे खराब प्रदर्शन था। एक वरिष्ठ जद (यू) नेता ने पटना में बताया कि वे उस स्थिति से सुधार कर सकते हैं। अत्यंत धु्रवीकरण वाले 2014 के आम चुनावों मं जद (यू) ने 17 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जब वह एक ऐसे समय में अकेली लड़ी थी जब राजनीतिक परिदृश्य राजग तथा लालू-कांग्रेस गठबंधन के बीच बंटा दिखाई देता था। 

जाहिरा तौर पर जद (यू) आशावान दिखाई देती है कि बिहार में उसकी मजबूत चुनावी पकड़ तथा उस पर नीतीश कुमार की अच्छी साख बिहार में अभी भी राजग को बचा सकती है। भाजपा को भी नीतीश पर उतना ही भरोसा होना चाहिए।    

                                                                                                                                          ---ए. श्रीवास्तव

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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