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कश्मीर का हर दूसरा युवा ‘अवसाद’ का शिकार

  • Updated on 8/13/2019

भारत (India) के संविधान (Constitution) का अनुच्छेद 370 (Article 370) अब कश्मीर (Kashmir) पर लागू नहीं होगा और साथ ही घाटी (कश्मीर) और जम्मू (Jammu) को मिलाकर एक केंद्र-शासित प्रदेश बनेगा जिसकी अपनी विधायिका तो होगी लेकिन जिसमें पुलिस जैसे अन्य कार्य केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में होंगे, कुछ दिल्ली की तर्ज पर। लेकिन यह सब अभी सिर्फ  कागजों पर हुआ है। जो कश्मीर की स्थिति से वाकिफ हैं वे यह भी जानते हैं कि जब तक इसे कश्मीर की आवाम के दिलों पर नहीं उकेरा जाएगा तब तक अपेक्षित उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो पाएगी और दिलों पर उकेरने का काम हफ्ते, महीने या साल में नहीं होता। जख्म गहरा है लिहाजा समय लंबा लगेगा। 

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने उद्बोधन में एक बड़ा ही स्पष्ट संदेश कश्मीर के लोगों को दिया है और वह संदेश यह है कि ‘‘तुम हाथों से पत्थर और बंदूक छोड़ो, हम तुम्हें अप्वाइंटमैंट लैटर देंगे या विकास के नए आयाम पर ले जाएंगे।’’ मोदी सरकार का सफर आसान न होगा। पहले भरोसा दिलाना होगा और वह भी तब, जब हल्का-सा भी दबाव हटाना आतंकियों को उपद्रव का मौका देना होगा और न देने से आम जन का भरोसा जाता रहेगा। शायद पाकिस्तान से युद्ध लडऩा इस स्थिति से निपटने से आसान होगा। किसान अपनी उपज मंडी ले जाने के लिए जिस गाड़ी का इस्तेमाल कर रहा है उसके नीचे क्या हथियार रखा है यह देखना जरूरी है लेकिन ऐसा करने से किसान क्या खुले हाथों से बन्दूक थामे सैनिकों को खुशी से देखेगा? मोदी सरकार के लिए कुआं और खाई के बीच से निकलने की स्थिति है।

कश्मीर के युवाओं पर अध्ययन
दुनिया की एक बेहद मकबूल संस्था ‘डॉक्टर्स विदाऊट बॉर्डर्स’  ने सन् 2015 में अक्तूबर से दिसम्बर तक कश्मीर के 5428 युवकों पर एक अध्ययन में पाया कि यहां लगभग हर दूसरा युवक मानसिक विकार (मैंटल डिसऑर्डर) का शिकार है, 19 प्रतिशत (हर पांचवां) गंभीर आघातोत्तर मानसिक दबाव संबंधी डिसऑर्डर (पोस्ट-ट्रोमा स्ट्रैस डिसऑर्डर- पी.टी.एस.डी.)  का रोगी है। वयस्कों में अवसाद की स्थिति 41 प्रतिशत है 
जबकि उसी साल के भारत के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार देश में इस तरह की मानसिक अस्वस्थता के मामले मात्र 8.9 प्रतिशत हैं। अगर प्रति व्यक्ति आय भी अच्छी है, बेरोजगारी भी राष्ट्रीय औसत से कम है, जीवन प्रत्याशा भी बेहतर है, शारीरिक  स्वास्थ्य भी अच्छा है तो क्या वजह है कि कश्मीर का युवा मानसिक अवसाद में है?

केंद्र सरकार के इस फैसले की खिलाफत करने वाले विश्लेषकों ने विकास के कुछ आंकड़े देकर पिछले तीन दिनों में बताना चाहा है कि विकास के तमाम पैमानों पर जम्मू और कश्मीर राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। उनका पूरा विश£ेेषण अताॢकक है। प्रति व्यक्ति आय का बढऩा या घटना किसी क्षेत्र के विकास का मात्र एक छोटा पैमाना होता है और वह भी इस बात पर निर्भर करता है कि सरकारी योजनाओं में कितना पैसा आया और उसका इस्तेमाल कैसे हुआ। अगर साक्षरता दर कम है (इस राज्य की साक्षरता दर 67.2 प्रतिशत है जबकि राष्ट्रीय औसत 75 प्रतिशत है) तो वह असली परिचायक होता है सरकारों के शिक्षा के प्रति प्रयासों का। यानी कश्मीर बिहार की साक्षरता दर के आस-पास है। साथ ही कश्मीर राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जी.एस. डी.पी.) के 5.5 प्रतिशत की विकास दर के साथ सबसे निचले पायदान के 3 राज्यों के साथ खड़ा है। 

अगर बाल मृत्यु दर 23 प्रति 1000 के साथ यह राज्य 33 के राष्ट्रीय औसत से बेहतर है तो उसके पीछे बेहतर जलवायु/ पर्यावरण, खानपान में मांसाहार और तमाम सामाजिक-सांस्कृतिक कारक होते हैं। अगर यह बताया जा रहा है कि यहां बेरोजगारी राष्ट्रीय औसत से कुछ कम है तो वह सिर्फ  इसलिए कि युवा अंडरइम्प्लॉयमैंट के कारण कुछ दिनों के लिए शिकारा पर काम कर लेता है और वह काम भी सरकार के खाते में नियोजन के रूप में दर्ज हो जाता है।

विकास की परिभाषा बदलनी होगी
अगर आजादी के 70 साल में अनुच्छेद 370 के तहत लगभग पूरी स्वायत्तता रहते हुए इन युवकों ने जिंदगी में केवल ङ्क्षहसा देखी है, आतंकियों की गोली या पुलिस की गोली की तड़-तड़, बम धमाकों की धड़ाम या फौजी बूटों की सन्नाटा तोड़ती खट-खट ही सुनी है या आतंकियों का घर में घुसकर खाना भी खाना और युवा लड़कियों पर  बुरी नजर रखना ही जीवन समझा है तो विकास की परिभाषा बदलनी होगी। 

‘डॉक्टर्स विदाऊट बॉर्डर्स’ की रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि मानसिक बीमारी का मुख्य कारण इन 70 सालों में भी दहशत भरे माहौल में मानवीय संवेदना या मानसिक जख्मों के प्रति किसी द्वारा फाहा रखने की कोशिश करना नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से  उन जख्मों पर नमक ही छिड़कना है और इन जख्मों को और गहरा करने के लिए पड़ोस में पाकिस्तान ने इन तमाम दशकों में अपना सुकून और विकास भूल कर घाटी में उपद्रव कराना ही अपने जीवन का मकसद मान रखा है।

इस राज्य को केंद्र सरकार जितनी मदद देता है, अगर वह नीचे तक पहुंचती और घाटी के सुदूर इलाकों में जाती तो शायद कश्मीर फिर से स्वर्ग बन जाता। अगर देश के अन्य भागों में केंद्रीय मदद प्रति व्यक्ति 1 रुपया है तो जम्मू एवं कश्मीर में यह 3 रुपए होती है। इस राज्य के कुल राजस्व का 80 प्रतिशत केंद्रीय मदद के रूप में मिलता है। अगर कभी घाटी के सुदूर ग्रामीण इलाकों में जाकर देखें तो न तो वहां बिजली है, न ही सड़क, मीलों चलने तक शायद ही कोई स्कूल दिखाई दे लेकिन बच्चा नर्सरी भले न जाए, हथियारों के नाम उसे पूरी तरह मालूम हैं।

जख्मों पर मरहम
किसी कानून (या संविधान के अनुच्छेद) की सार्थकता या अनुपादेयता इस बात से सिद्ध होती है कि उसके रहने से लाभ क्या रहे, नुक्सान क्या रहे और उसके न रहने से लाभ और नुक्सान क्या हैं? हमने कश्मीर को 70 साल तक एक अलग दर्जा दे कर देख लिया, गुमराह युवकों के हाथ में ए.के.-47 और पत्थर के अलावा कुछ नहीं दिखाई दिया और धीरे-धीरे इनमें से कुछ पाकिस्तानी साजिश के तहत फिदायीन बनने की ओर भी बढ़ते जा रहे हैं। क्या अब वह वक्त नहीं है जब उन्हें रोजगार के अवसर, किसानों को नए बीज, उन्नत खेती, सड़कें, भेड़ की ऊन के लिए नई मार्कीट, बच्चों के लिए स्कूल देकर देखा जाए और इसी के साथ उनके जख्मों पर मरहम लगाने के लिए उन्हें भारत की मुख्य धारा में शामिल किया जाए?

एन.के. सिंह
singh.nk1994@yahoo.com

 

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