Monday, Jan 21, 2019

Interview 1: घोषणा पत्र में जो लक्ष्य दिए थे, उन पर सही गति और दिशा से आगे बढ़ रहे: अमरेंद्र सिंह

  • Updated on 11/15/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। पंजाब में कैप्टन अमरेंद्र सिंह के नेतृत्व में सरकार बने दो साल पूरा होने को आए हैं और इस दौरान पंजाब कई तरह के उतार-चढ़ाव से गुजरा। शुरूआत में आर्थिक फ्रंट पर मिली चुनौतियों से पार पाने में मुश्किल भी पेश आई मगर दृढ़ इच्छा शक्ति के बलबूते पंजाब को ऐसे दौर से बाहर निकालने में कामयाब रहे हैं। दो साल के अनुभव, राज्य के राजनीतिक और सामाजिक हालात आदि पर विस्तार से बातचीत की पंजाब केसरी से हरिश्चंद्र ने। पेश हैं बातचीत के कुछ प्रमुख अंश :-

आप अपनी 19 माह की सरकार की कारगुजारी से कितना संतुष्ट हैं?
इस बारे खुद कुछ नहीं कह सकता, ये तो लोग ही बताएंगे। जो लक्ष्य मैंने दिए थे चुनाव घोषणापत्र में, उनके मुताबिक सही गति और दिशा से आगे बढ़ रहे हैं। कई मामलों में हम उन्हें तय भी करके आगे निकल चुके हैं। अब पंजाब ने तय करना है कि हमारी कारगुजारी कैसी है।

अपनी सरकार बनने पर आपने राज्य के खाली खजाने की बात कही थी, अब हालात कैसे हैं, क्या कुछ सुधार हुआ है?
हमारे ऊपर जो कर्ज था, वह तो रहा ही है मगर राजस्व में बढ़ोतरी करने में सरकार सफल रही। जब सत्ता में आए थे तब सूबे का प्राथमिक घाटा 41,217 करोड़ रुपए था। हमने यह घाटा कम किया और अब हम 2995 करोड़ रुपए सरप्लस हैं। इसमें सभी का योगदान रहा, इंडस्ट्री का भी।

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सत्ता में आने से पहले नौ नुक्तों की बात कही थी, उनमें से कितने पूरे हुए और बाकी कब तक पूरे होंगे?
हम सभी पर पूरी शिद्दत के साथ जुटे हुए हैं। जैसे वित्तीय हालात हमें विरासत में मिले थे, उसमें सत्ता में आते ही सभी को पूरा कर देते, ये बहुत मुश्किल काम था। हमें जनता ने पांच साल दिए हैं और हम इस दौरान सभी को पूरा करेंगे और हमें प्राथमिकताएं देखनी हैं। हमने पहले कर्ज में डूबे किसानों को राहत देने पर काम शुरू किया कि कैसे स्थिति ठीक करें।

पंजाब में 70,000 किसान पांच एकड़ से कम जमीन वाले हैं। हमने यह नहीं कहा था कि सत्ता में आते ही पहले हफ्ते में ठीक कर देंगे, यह संभव भी नहीं था। इसके लिए पहले अर्थ-व्यवस्था को पुनर्जीवित करना पड़ेगा, राजस्व अर्जन करना पड़ेगा, उसमें से यह सब निकलेगा।

आपकी सरकार को दो साल होने को आए हैं मगर अभी से कर्मचारियों के विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं, टीचर्स धरने पर बैठे हैं।
प्रदेश के 42,000 कर्मचारी रैगुलर होना चाहते हैं, जिन्हें हमने तो नौकरी नहीं दी थी, पूर्व सरकार ने लगाया था। हम देख रहे हैं कि मौजूदा हालात में क्या कर सकते हैं। 8,000 टीचर जो धरने पर बैठे हैं, उन्हें कह चुके हैं कि रैगुलर बनना चाहते हो तो 15,000 रुपए वेतन से शुरू करें, जो बढ़ता रहेगा और पैंशन स्कीम के भी हकदार हो जाएंगे।

अन्यथा 42,000 रुपए लेते रहो। सभी विकल्प दिए हैं। संबंधित मंत्री बता रहे थे कि 900 अध्यापकों ने बात मान ली है और उनका पेपर वर्क भी पूरा कर लिया है। जब राजस्व ही नहीं तो सभी को रैगुलर कैसे करें।

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आपके पटियाला शहर में ही टीचर धरने पर बैठे हैं, क्या आपको उनसे मिलकर हल नहीं निकालना चाहिए?
वे जान-बूझकर मेरे शहर आए हैं और मेरे कारण ही आए हैं। यह भी सही है कि यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। हर मंत्री का काम है कि वह अपने विभाग को देखे। सोनी भी काबिल मंत्री हैं और वह मामले को हैंडल कर रहे हैं। कहीं जरूरत पड़ी तो मैं भी बात करूंगा मगर अभी विभाग को ही देखने दें।

किसानी कर्जे की बात कही मगर किसान अभी भी खुदकुशी कर रहे हैं?
70 फीसदी किसान पांच एकड़ से कम जमीन के मालिक हैं। उसके दो बेटे हो गए तो उसी जमीन पर ही गुजर-बशर नहीं कर सकता। इस कारण हाई-वैल्यू फसलों की ओर जा रहे हैं ताकि एक बेटा फसल की काश्त करे और दूसरा नौकरी कर परिवार पाले। हम जमीन तो दे नहीं सकते।

इजराइल दौरे दौरान वहां जल संरक्षण, कृषि, बागवानी और पशुपालन का काम देखा। वहां किसान के लिए दूध दूसरी फसल है। भूजल और नदियों का पानी खत्म हो रहा है। तब हम कहां जाएंगे? इजराइल के लोग बता रहे थे कि 90 प्रतिशत पानी रिसाइकिल होता है। 30 साल बाद उनके पास ताजा पानी का स्त्रोत नहीं होगा, समुद्र से पानी लेकर गुजारा करना होगा। अभी से उस पर काम शुरू कर दिया है। और, हम समझ ही नहीं रहे कि ऐसा संकट आने वाला है।

पानी की बात छिड़ी है तो एस.वाई.एल. का मसला आप कैसे निपटाएंगे?
इसे निपटाना हमारे नहीं, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के हाथ है। हमने केंद्र को समझाया कि पानी जांचने का अंतर्राष्ट्रीय कानून है जिसके मुताबिक 20 साल बाद यह जांचा जाता है कि कहां पर कितना पानी है। इंडो-पाक ट्रिटी के तहत अब 26 साल बाद भी तो पानी जांचा जा रहा है तो इसे हम अपने देश में क्यों नहीं लागू कर सकते।

जब इराडी कमीशन बैठा था तब पंजाब में 17 एम.ए.एफ. पानी कहा गया था, हमारी सूचना मुताबिक अब यह महज 13 एम.ए.एफ. है। तो जब यह फैसला करोगे कि किस राज्य को कितना पानी देना है तो पहले यह भी तो जांच हो कि राज्य के पास कितना पानी है। आप 17 एम.ए.एफ. को आधार बना कर अब पानी नहीं बांट सकते।

क्या बातचीत से यह मसला हल नहीं हो सकता?
कभी नहीं, यह पंजाब के साथ सरासर धक्का है। पंजाब की 105 एकड़ जमीन काश्त योग्य है जबकि हरियाणा की 80 एकड़। पुनर्गठन के समय वर्ष 1966 में तय हुआ था कि दोनों राज्यों के बीच हर चीज का 60:40 के अनुपात में बंटवारा होगा।

तब रावी, ब्यास और सतलुज का पानी दोनों राज्यों को 60:40 के अनुपात में दिया गया मगर ताजेवाला से आ रहा यमुना का पानी उस पूल में डाला ही नहीं। अब यमुना के साथ 1.7 एम.ए.एफ. पानी हरियाणा को और दे दिया। साथ ही शारदा लिंक कैनाल से भी हिसा देने का फैसला कर लिया। अब हमारे पास 13 एम.ए.एफ. पानी है और हरियाणा के पास हमसे करीब चार एम.ए.एफ. पानी ज्यादा है जबकि जमीन हमारे से कम है।

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नवजोत सिंह सिद्धू के करतारपुर कॉरीडोर खुलवाने संबंधी बयान से सहमत क्यों नहीं थे?
यह कॉरीडोर खोलना भारत-पाक सरकारों के बीच का मसला है, सिद्धू बयान दे सकते हैं, फैसला नहीं ले सकते। करतारपुर कॉरीडोर नहीं बल्कि सिद्धू की ओर से पाक सेना प्रमुख से गले मिलने पर असहमति दिखाई थी। सीमा पर रोजाना जवान शहीद हो रहे हैं और यह सब पाकिस्तान के सेना प्रमुख के आदेश पर हो रहा है। वैसे कम लोग जानते होंगे कि 1922 में रावी में बाढ़ आने पर करतारपुर साहिब का गुरुद्वारा ढह गया था तब मेरे दादा ने ही पुनर्निर्माण कराया था।

हाल में सेना प्रमुख की ओर से पंजाब में हालात बिगडने के अंदेशे संबंधी बयान को आप कैसे देखते हैं?
आर्मी चीफ ने जो कहा है उस पर टिप्पणी नहीं करूंगा। पाकिस्तान सीमा क्षेत्र को अशांत करने का प्रयास करता है। उसे सुरक्षा तभी लगती है जब भारतीय सीमा अशांत हो। उसकी शुरू से नीति रही है। मौसम बदलते ही कश्मीर के दर्रे बंद होने लगे तो पाकिस्तान अब पंजाब छेडऩे लगेगा। यहां 6,000 कश्मीरी छात्र पढ़ते हैं मगर यह मतलब नहीं कि सभी 6,000 आतंकवाद की ओर चल रहे हैं। हमें छह का पता चला, उन्हें पकड़ा। शायद आर्मी चीफ इसी आधार पर ऐसा कह रहे हों।

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