Saturday, Mar 23, 2019

Interview 1:पुरुषों का मन बदलने से बचीं ‘कोख में बेटियां’

  • Updated on 2/24/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। बेटियों को बचाने एवं महिलाओं की रक्षा और सुरक्षा को लेकर लगातार आवाज बुलंद करने वाली केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका संजय गांधी ने 5 साल में बेटियों को बचाने और महिलाओं के उत्थान के लिए अनेकों काम किए हैं। उन्होंने अपने लोकसभा क्षेत्र पीलीभीत (यू.पी.) की सम्स्याओं के साथ-साथ देशभर की महिलाओं से जुड़े मसलों को बड़े ही बेबाकी से अमलीजामा पहनाया है। नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी  के विशेष संवाददाता सुनील पाण्डेय ने उनसे हर मुद्दे पर खास बातचीत की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश...

एन.आर.आई. दूल्हों पर शिकंजा कसने को लेकर क्या कार्रवाई हुई? 

 जी हां, एन.आर.आई. दूल्हों को लेकर भी मंत्रालय ने बड़ी कोशिश की है। खासकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली की लड़कियां एन.आर.आई. दूल्हों से परेशान हैं। 3 साल पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ मिलकर एक कमेटी बनाई। इसके बाद विदेश मंत्रालय ने एक पोर्टल ईजाद किया, जिसमें महिलाएं सीधे शिकायत कर सकती हैं। इसमें कानून में बदलाव की जरूरत है। इसके लिए लोकसभा में बिल पास करवा लिया, लेकिन राज्यसभा में रुक गया। हालांकि, फौरी दबाव एवं शिकंजा कसने के लिए कुछ आदेश जरूर जारी किए गए। इसके तहत शादी का रजिस्ट्रेशन एक महीने के भीतर करवाने को जरूरी किया गया, ताकि उनका रिकार्ड विभाग के पास रहे। जिन महिलाओं की शिकायत आ रही है उनके दूल्हों की जांच कर पासपोर्ट जब्त करने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। 

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान बड़ा कार्यक्रम है, कहां तक सफलता मिली? 

सही बात है, यह सरकार का बहुत बड़ा प्रोग्राम रहा है जिसे केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया है। सरकार बनने के बाद मंत्रालय ने विशेष तौर पर अभियान छेड़ा और लोगों के मन में बदलाव लाने निकल पड़े। इसके लिए बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय जन जागरूकता अभियान शुरू किया। जिलाधिकारियों के नेतृत्व में देश भर में 405 चयनित बी.बी.बी.पी. जिलों में बड़े पैमाने पर इससे संबंधित अभिनव गतिविधियां चलाई गईं। साथ ही अभियान में राज्यों एवं जिलों के स्तर पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय को जोड़ा गया। सरकार ने बहु-क्षेत्रीय कार्रवाई की और 235 जिलों में अलर्ट मीडिया और प्रतिपालन अभियान, प्री-कंसैप्शन एंड प्री नेटल डायग्नॉस्टिक टैक्नीक्स अधिनियम को प्रभावी रूप से लागू किया और लड़कियों को शिक्षित बनाया।


बेटियां जन्म लेने से पहले ही कोख में मार दी जाती हैं, इस मामले में सरकार ने क्या किया? 

यह सच है कि देश के कुछ शहरों में एक वर्ग ऐसा था, जो कोख में बेटियों को मार देता था। वे 2 बच्चे तो चाहते थे, लेकिन दोनों बेटियां ही हों, ऐसा कतई पसंद नहीं था। यह दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी यू.पी. में कुछ ज्यादा ही फैला था। इसके चलते लिंगानुपात बिगड़ गया था। हरियाणा के कई शहरों में तो 1,000 लड़कों के मुकाबले 800 लड़कियों का आंकड़ा पहुंच गया था लेकिन, सरकार बनते ही इस समस्या को जड़ से खत्म करने की हमने ठानी और एक नए बदलाव की कोशिश शुरू कर दी। सरकार ने एन.जी.ओ., सरपंच, सामाजिक संस्थाओं को जोड़कर बड़ा काम किया। इसके लिए सैल्फी विद डॉटर्स, दादी का जोड़ा, अवार्ड समारोह जैसे अनगिनत कार्यक्रम किए गए। 4 साल की कड़ी मेहनत के बाद अब जाकर बड़ी सफलता मिली और लड़कियों को बचाने के लिए पुरुषों के मन को बदला जा सका है। नतीजतन, लिंग अनुपात में भी व्यापक सुधार हुआ है। हरियाणा के कई जिलों में बराबर संख्या पहुंच गई है। 

महिला कल्याण के लिए वन स्टॉप सैंटर खोला, क्या रिजल्ट रहा? 

 हिंसक अपराधों की शिकार कई महिलाओं को यह पता नहीं होता है कि उन्हें मदद के लिए कहां जाना है। उनके लिए, पूरे देश में वन स्टॉप सैंटर (ओ.एस.सी.) स्थापित किए गए हैं। वन स्टॉप सैंटर योजना की शुरूआत मार्च 2015 में हुई थी, जिसमें हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए पुलिस, चिकित्सा, कानूनी, मनोवैज्ञानिक सहायता और अस्थायी आश्रय सहित सेवाओं की एक एकीकृत सुविधा मुहैया करवाई गई है। यह योजना निर्भया फंड के माध्यम से वित्त पोषित होती है। इसके अच्छे रिजल्ट मिलने के साथ ही सरकार ने देश के सभी जिलों में चरणबद्ध तरीके से ओ.एस.सी. स्थापित करना शुरू किया है। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने पहले ही देश के सभी 718 जिलों में वन स्टॉप सैंटर स्थापित करने के लिए राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों को मंजूरी दे रखी है। अब तक 400 ओ.एस.सी. कार्यरत हो चुके हैं। इन केंद्रों पर 5 लाख से अधिक महिलाओं को सहायता मिल चुकी है। इस सैंटर में 1 डाक्टर, 1 वकील, 1 पुलिस, 1 मनोवैज्ञानिक को जोड़ा गया है।

महिलाओं के लिए महिला हैल्पलाइन शुरू की, कितने लोग जुड़े?  

महिलाओं की सुरक्षा के लिए मंत्रालय ने महिला हैल्पलाइन शुरू की। इस योजना की शुरूआत 1 अप्रैल 2015 से की गई। इसका उद्देश्य हिंसा से पीड़ित महिलाओं को 24 घंटे आपातकालीन और गैर-आपातकालीन सेवा प्रदान करना है। इसमें एक समान नंबर (181) के द्वारा देश भर में महिलाओं से संबंधित सरकारी योजनाओं के कार्यक्रमों के बारे में जानकारी शामिल की गई। अब तक 32 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में महिला हैल्पलाइन की शुरूआत की जा चुकी है। हैल्पलाइन शुरू होने के बाद महिलाओं के 20.23 लाख से अधिक शिकायतों का निपटारा किया गया है। यह योजना भी निर्भया फंड के माध्यम से संचालित हो रही है। 

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