Sunday, Nov 27, 2022
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Exclusive interview : ‘दासदेव’ में दिखेगा पारो, देव और चंद्रमुखी का मॉडर्न रंग

  • Updated on 4/26/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। प्रसिद्ध बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के कालजयी उपन्यास ‘देवदास’ के जितने रूप फिल्मों पर आए हैं, उतने शायद ही किसी और साहित्यिक रचना के आए होंगे। हिंदी सिनेमा में देवदास को अलग-अलग वक्त और अंदाज में पर्दे पर उतारा जा चुका है।

अब देवदास को नए कलेवर में पेश करने जा रहे हैं मशहूर निर्देशक सुधीर मिश्रा। फिल्म का टाइटल ‘दासदेव’ रखा गया है, जिसमें बॉलीवुड के बेहद प्रतिभाशाली कलाकार सौरभ शुक्ला के साथ अभिनेत्री ऋचा चड्ढा, अदिति राव हैदरी और राहुल भट्ट दिखेंगे। फिल्म प्रमोशन के लिए दिल्ली पहुंची स्टार कास्ट ने पंजाब केसरी/नवोदय टाइम्स से खास बातचीत की।

‘देवदास’ और ‘दासदेव’ में अंतर : ऋचा चड्ढा

‘दासदेव’ को डायरेक्टर सुधीर मिश्रा ने एक नया ही रंग दे दिया है। यह फिल्म दास से देव बनने की कहानी है, जिसमें एक लव स्टोरी भी है, देव और पारो के बीच मतभेद भी हैं, दोनों के बीच आई पॉलिटिकल राइवलरी भी है और साथ ही दोनों के बीच बदले की जंग भी है।

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इस फिल्म में आपको यूपी की राजनीति भी देखने को मिलेगी।इसके साथ ही इसमें आपको विलियम सेक्सपियर के ‘हेमलेट’ के कुछ अंश भी देखने को मिलेंगे।

पारो का किरदार चुनौतीपूर्ण

इस फिल्म में मैं पारो का किरदार निभा रही हूं। जहां तक चुनौतियों का सवाल है तो अक्सर विशेष रूप से बनाई गई फिल्म या फिर चुनी गई कहानियों में चुनौतियां आती ही हैं, लेकिन एक कुशल डायरेक्टर उसे आपके अनुकूल ढाल देता है। पहले भी फिल्मों में पारो के किरदार बड़े स्टार्स द्वारा निभाया जा चुका हैं, लेकिन इस फिल्म में ये किरदार थोड़ा हटकर होगा, क्योंकि ये एक अलग तरह की फिल्म है, जिसका मकसद भी बिल्कुल अलग है। दासदेव में आपको एक मॉर्डन पारो देखने को मिलेगी जो साड़ी पहनकर देव के पीछे भागती नहीं, बल्कि स्कूटी और बाइक चलाती है। ये पारो अपने हक और सम्मान के लिए लड़ती भी है।

बदल रहा है हिंदी सिनेमा: सौरभ शुक्ला

80 के आखिर और 90 के शुरुआती दौर में एक ही तरह का सिनेमा बन रहा था। शेखर कपूर, राम गोपाल वर्मा और सुधीर मिश्रा जैसे कुछ नाम थे जो सिनेमा को नया रूप देने का काम कर रहे थे। 90 के दशक में ऐसी पांच-छह फिल्में ही निकल कर आईं, लेकिन साल 2000 के बाद धीरे-धीरे चीजें बदलनी शुरू हुई।

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आज रियलिस्टक सिनेमा का मार्केट बड़ा हो चुका है। नई कहानियां कहीं जा रहीं हैं, फिल्मों में एक्सपेरिमेंट हो रहे हैं। कुछ साल पहले कैरेक्टर आर्टिस्ट का काम हीरो को सपोर्ट करना था, लेकिन आज वही कैरेक्टर आर्टिस्ट हीरो भी बन चुका है। हिंदी सिनेमा अब बदल रहा है और बहुत अच्छा समय चल रहा है। 

गेम ऑफ पावर की फिल्म : सुधीर मिश्रा

‘दासदेव’ को राजनीतिक ड्रामा समझने की भूल न करें, क्योंकि इस रोमांटिक फिल्म में राजनीति महज एक द्वंद्व के रूप में है। यह फिल्म गेम ऑफ पावर की है, जिसके पीछे कहानी का हर किरदार भाग रहा है। लव स्टोरी के पहलू से देखें तो यह कहानी देवदास से काफी अलग है। इसमें देव के जाने पर पारो रोती नहीं, बल्कि उससे बदला लेती है। इस फिल्म में चंद्रमुखी की जगह चांदनी ने ले ली है जिसका किरदार अदिति बखूबी निभा रही हैं।

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 इस फिल्म की खास बात यह है कि इसको एक नया रंग देने के बाद भी देव-पारो-चंद्रमुखी के बीच का प्रेम वैसा ही है। देवदास के मुकाबले ये फिल्म काफी पॉजिटिव भी है।

राजनीति से प्रेरित 

1975-76 के समय जब कॉलेज में पहुंचा था तब महज 16 साल का था। वैसे तो परिवार से दादाजी राजनीति में थे, लेकिन मुझे कभी राजनीति में आने नहीं दिया। मैंने हमेशा साधारण जीवन जिया है।  चूंकि राजनीति को करीब से जानता हूं इसलिए इस फिल्म को लेकर कल्पना करने में आसानी रही । सत्ता के बारे में फिल्म बहुत कुछ आज की है। थोड़ा पुराने जमाने को भी दिखाया गया है लेकिन फिल्म का पैटर्न पूरा पॉलिटिकल स्ट्रक्चर है।

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