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Exclusive Interview: 'गोल्ड' का मतलब सिर्फ हॉकी नहीं, ये उससे भी बढ़कर

  • Updated on 8/13/2018
  • Author : chandan jaiswal

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। बॉलीवुड के सबसे चर्चित और डिमांडिंग स्टार अक्षय कुमार जिस फिल्म को छू लेते हैं वही फिल्म ‘गोल्ड’ हो जाती है। जी हां, अक्षय की फिल्म ‘गोल्ड’ का हर कोई बेसब्री से इंतजार कर रहा है। 15 अगस्त को रिलीज हो रही इस फिल्म को लेकर अक्षय भी खासे उत्साहित हैं। सच्ची घटना पर आधारित इस फिल्म के जरिए वह दुनिया को बताना चाहते हैं कि आजादी के बाद भारत ने हॉकी में कैसा अपना पहला ओलम्पिक गोल्ड जीता था। इस फिल्म में आपको अक्षय का  बंगाली लुक नजर आएगा।

म्यूजिक में भी जैज का तड़का लगाया गया है। फिल्म जिस दौर की है उस दौर में जैज म्यूजिक काफी चलन में था। टीवी की नागिन के नाम से मशहूर अभिनेत्री मौनी रॉय अक्षय की पत्नी के रोल में हैं। मौनी इस फिल्म से बड़े पर्दे पर अपनी पारी शुरू कर रही हैं। वहीं, इसमें अमित साध, सनी कौशल, कुणाल कपूर भी अहम किरदार निभाते हुए दिखेंगे। फिल्म प्रमोशन के लिए दिल्ली पहुंचे अक्षय कुमार, मौनी रॉय के साथ निर्देशक रीमा कागती और  निर्माता रितेश सिधवानी ने पंजाब केसरी/ नवोदय टाइम्स/जग बाणी/हिन्द समाचार से खास बातचीत की। पेश है मुख्य अंश:

इस तरह फिर होगा आजाद भारत के पहले गोल्ड का जश्न, भारत के हिस्से चमकेंगे सोने की तरह!

दिल छू लेने वाली कहानी :अक्षय कुमार
मैं अपने देश के इतिहास के बारे में काफी कुछ जानता हूं लेकिन हमें पहला गोल्ड आजादी के एक साल बाद 1948 मिला था, ये मैं नहीं जानता था। ये बात मुझे तब पता चली जब रीमा जी ने मुझे इस फिल्म की कहानी सुनाई। मुझे बहुत हैरानी हुई कि हमें अपने इतिहास की इतनी बड़ी बातें भी नहीं पता। उसके बाद मैंने गुगल पर सर्च किया तो वहां भी सिर्फ एक या दो आर्टिकल थे।

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ये फिल्म देश को पहला गोल्ड दिलवाने की एक टीम की चाहत और संघर्ष की कहानी है। जिसे पूरा होने में 12 सालों का वक्त लगा। 1936 में देखा गया गोल्ड का सपना 1948 में जाकर पूरा होता है। भारत ने 12 अगस्त 1948 में ओलंपिक में एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपना पहला स्वर्ण पदक जीता था। मैं बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे ये फिल्म करने का मौका मिला।

12 अगस्त बने स्पोटर्स डे
अक्षय ने बताया कि इस साल 12 अगस्त को हमें गोल्ड मेडल मिले 70 साल पूरे हो गए इसके लिए हमने रविवार को देश के कई शहरों में सेलिब्रेट भी किया। मेरा मानना है कि जैसे योगा डे होता है वैसे ही हमें 12 अगस्त को स्पोट्र्स डे  मनाना चाहिए। 

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‘गोल्ड का मतलब सिर्फ पदक नहीं’
अक्षय कहते हैं कि यह फिल्म सिर्फ हॉकी के ऊपर ही नहीं है बल्कि इसमें ‘गोल्ड’ का मतलब दिखाया गया है। इसमें दिखाया गया है कि एक मेडल लेने में कितना कुछ जाता है। गोल्ड मेडल सिर्फ एक पदक नहीं होता उसे पाने में सालों लगते हैं। आपका जुनून और खून-पसीना लगता है और इसके लिए पूरा देश एकजुट हो जाता है।  

हर तरह की फिल्म करने की चाहत

Navodayatimesअक्षय ने ये भी कहा कि मैं सिर्फ बायोपिक और सोशल मैसेज देने वाली फिल्में ही नहीं करना चाहता बल्कि हर तरह की फिल्में करना चाहता हूं। अभी मेरी ‘हेराफेरी’, ‘हाउसफुल-4’ और हॉरर कॉमेडी कई अलग-अलग तरह की फिल्में आ रही हैं। हां ये जरूर है कि अगर इस तरह की कोई अच्छी स्क्रिप्ट सामने आ जाती है, तो मन करता है कि पहले सब छोड़कर ऐसी फिल्म ही करूं। 

जिंदगी का हर सूरज उगता देखा
अपनी सेहत और जिंदगी के बारे में अक्षय बताते हैं कि मेरी जिंदगी में ऐसा कोई दिन नहीं हुआ कि मैंने उगता सूरज न देखा हो। सबसे ज्यादा ताकत हमें उगता हुआ सूरज देखते हुए आती है। मैं तो यही कहूंगा कि ये आदत हम सभी को अपनानी चाहिए। मुझे लगता है कि मेरा जो अनुशासन है वही लोगों को आकॢषत करता है। मैं एक ऐसा इंसान हूं, जो अपने दिल से बोलता हूं। 

प्राउड फील कर रही हूं: मौनी रॉय
मौनी ने बताया कि ये मेरी पहली फिल्म है और मैं काफी नर्वस थी, लेकिन दो दिन पहले ही मैंने ये फिल्म देखी और तब से मैं बहुत खुश हूं। दरअसल, अब मुझे इस फिल्म से प्यार हो गया है और मैं बहुत प्राउड फील कर रही हूं। 

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फिल्म और सीरियल में ज्यादा फर्क नहीं
फिल्म और टीवी की दुनिया पर बात करते हुए मौनी कहती हैं कि दोनों जगह काम करने में ज्यादा अंतर नहीं होता। हां.. फिल्मों में काम करने से ज्यादा मुश्किल टीवी सीरियल में काम करना होता है। जबकि फिल्मों में अपने गानें होते हैं और फिल्में दो-ढाई घंटे में ही खत्म हो जाती है। वहीं टीवी सीरियल में काफी समय लगता है। सबसे बड़ी बात ये है कि टीवी और फिल्मों की स्क्रिप्टिंग काफी अलग-अलग होती है।  

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एक्साइटेड हूं और नर्वस भी: रीमा कागती
रीमा बताती हैं कि इस फिल्म की कहानी मेरे दिमाग में काफी सालों से थी लेकिन अब जब ये सपना पूरा होने को है, तो मैं काफी एक्साइटेड हूं और थोड़ी नर्वस भी। उम्मीद करती हूं कि ये फिल्म सबको बहुत पसंद आएगी। फिल्म में सभी ने बहुत अच्छा काम किया है। 

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काफी चैलेंजिंग रही फिल्म
रीमा बताती हैं कि जब हम सनी (सूर्योदय) का सेट तैयार करते थे, तो क्लाउडी मौसम (सुहाना मौसम) हो जाता था और जब क्लाउडी सेट लगाते थे, तो सनी हो जाता था। इस वजह से फिल्म शूट करना बहुत चैलेंजिंग रहा और वैसे भी भारत का मौसम दुनियाभर में मशहूर है।

सात-आठ साल पहले आया था आइडिया: रितेश सिधवानी
रितेश बताते हैं कि जब रीमा ने उनसे कहा कि वो भारत को पहली बार मिले गोल्ड मेडल पर फिल्म बनाना चाहती है और ये सात-आठ साल से उनके दिमाग में चल रहा है। मैंने कहा कि ठीक है चलो इस पर काम करते हैं, तो उन्होंने कहा मुझे स्क्रिप्ट लिखने में छह से आठ महीने लगेंगे। वैसे नॉर्मल फिल्म दो- तीन महीने में बन जाती है, लेकिन जब आप एक पीरियड फिल्म बनाते हैं तो उसके लिए बहुत रिसर्च करना पड़ता है, क्योंकि जब आप कोई ऐसी फिल्म बना रहे हो जो साल 1936 और 1948 तक का है, तो उसमें बहुत मेहनत लगती है। हम इस फिल्म में किसी तरह की कोई कमी नहीं छोडऩा चाहते थे इसलिए फिल्म की पूरी टीम जैसे प्रोडक्शन, डिजाइनर, मेकअप आर्टिस्ट, हेयर स्टाइलिस्ट और कॉस्ट्यूम डिजाइनर सब साथ में बैठकर बातचीत करते थे। 

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