Monday, Jan 21, 2019

Interview 1: कमेटी की छवि को सुधारना है प्राथमिकता

  • Updated on 12/21/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। शिरोमणि अकाली दल और राजनीति में लंबे से जुड़े भाजपा के मंजिदर सिंह सिरसा ने नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी से खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को लेकर काफी विवाद हुआ, आखिर क्या चल रहा है? 
जो कुछ हुआ वह अच्छा नहीं हुआ। पिछले दिनों कमेटी अध्यक्ष मंजीत सिंह जीके के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते दिल्ली में हमारी छवि बहुत खराब हुई है। हालात यह हैं कि अब लोग सड़कों और गुरुद्वारों में कमेटी में हुए भ्रष्टाचार की चर्चा करने लगे हैं। हमें खराब हुई छवि को बदलना होगा, क्योंकि इससे बहुत नुकसान हुआ है। 

मामला क्या है, कैसे बिगड़े हालात ?
विपक्षी दलों ने कमेटी में तीन लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इसमें कमेटी अध्यक्ष मंजीत सिंह जीके, संयुक्त सचिव अमरजीत सिंह एवं निलंबित चल रहे महाप्रबंधक हरजीत सिंह सूबेदार हैं। सबसे पहले कमेटी सदस्य गुरमीत सिंह शंटी एवं शिरोमणि अकाली दल (दिल्ली) के अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए।

दो मामले आने पर कमेटी के जनरल मैनेजर हरजीत सिंह सूबेदार को 3 बार सस्पेंड किया गया, लेकिन बाद में उन्हें बहाल कर दिया गया। खास बात यह है कमेटी में जितने भी बड़े भ्रष्टाचार हुए वह सभी मेरी अनुपस्थिति में हुए। यही नहीं जनरल हाउस बुलाकर एक प्रस्ताव पास किया गया, जिसमें बड़े फैसले लेने के सभी अधिकार कमेटी अध्यक्ष को दिए गए। यहीं से खेल शुरू हुआ और हालात बिगड़ते चले गए। 

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जीके के साथ तो आपके अच्छे संबंध थे?
हम अच्छे दोस्त थे और आज भी हैं, लेकिन कुछ नीतियों एवं विचारों को लेकर दिक्कत है। अब कमेटी में अध्यक्ष के लिए दोबारा चुनाव होंगे और चीजों को ठीक किया जाएगा। फिलहाल कार्यवाहक के रूप में मेरी प्राथमिकता है कि खराब हुई छवि को सुधारा जाए। पहली बार ऐसा हुआ है कि कमेटी में भ्रष्टाचार का मामला एंटी करप्शन को जांच के लिए दिया गया है। 

अब क्या हाल है, अकाली दल का कितना दखल है? 
भ्रष्टाचार को लेकर मामला इतना बढ़ गया कि शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल को हस्तक्षेप करना पड़ा। उनके आदेश पर दिल्ली की प्रदेश इकाई को भंग किया गया और दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के पदाधिकारियों से इस्तीफा लिया गया।

इसके बाद कमेटी अध्यक्ष मंजीत सिंह जीके का कार्यभार वरिष्ठ उपाध्यक्ष को दे दिया गया। लेकिन, जीके रोजमर्रा के कामों में दखल दे रहे हैं, जिसका विरोध हो रहा है। जबकि, उन्होंने खुद कहा था कि आरोपमुक्त होने तक वह अध्यक्ष पद पर नहीं बैठेंगे। बाकी लोगों के इस्तीफे के बाद भी काम करने के लिए कहा गया है।

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आखिर कमेटी के हालात बिगड़े कैसे, ऐसी नौबत क्यों आई?
कमेटी की व्यवस्था है कि अध्यक्ष और महासचिव सभी बड़े आर्थिक मसलों पर दस्तखत करते हैं। चेक पर भी दोनों के हस्ताक्षर होते हैं। अगर अध्यक्ष नहीं है तो वरिष्ठ उपाध्यक्ष और महासचिव नहीं है तो संयुक्त सचिव के दस्तखत होते हैं।

मैं काफी दिनों तक अपना कार्यभार संयुक्त सचिव को देकर दिल्ली से बाहर था। इसी दौरान कई गड़बडिय़ां हुईं और मामला पुलिस और अदालत तक पहुंच गया। 

कमेटी को कैसे बचाएंगे, क्या बदलाव लाएंगे? 
कमेटी में व्यापक रूप से बदलाव के लिए काम शुरू कर दिए हैं। इसके लिए कई लोगों को पद से हटाना भी पड़ा है। खर्चों में कटौती करने के लिए बड़े बदलाव किए हैं। इसका फर्क दिख रहा है। टेंट, कैटरिंग, आदि खरीद-फरोख्त व्यवस्था में 50 फीसदी तक कमी आ गई है।

नतीजा यह रहा कि इस महीने 2 करोड़ की एफडी करवा दी है। राजस्व दोगुना होने की स्थिति आ गई है। दान देने वालों का पूरा रिकार्ड दर्ज हो रहा है और उन्हें पर्चियां दी जा रही हैं। कमेटी की गाडिय़ां बेकार इधर-उधर दौड़ रही थीं, उन पर रोक लगा दी गई है। 

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कमेटी अध्यक्ष के लिए आप की दावेदारी है क्या? 
ऐसा हमने कतई नहीं सोचा है। कमेटी में बहुत सारे वरिष्ठ लीडर हैं, जो वर्षों से कमेटी की सेवा कर रहे हैं। इसपर उनका हक बनता है। हम तो कमेटी में सुधार और खराब हुई छवि को वापस लौटाना चाहते हैं, जिसके लिए झंडा बुलंद किए हैं। हमें गुरु की गोलक की रक्षा करनी है, इसलिए उसी मिशन पर लगे हैं। 

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