Sunday, Apr 18, 2021
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Farmers Protest: किसानों-सरकार के बीच 10वें दौर की बातचीत खत्म, अगली तारीख तय

  • Updated on 1/20/2021

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। केंद्र सरकार (Central Government) के नए कृषि कानूनों (Farm Laws) के खिलाफ किसानों का आंदोलन 56वें दिन भी हुई। कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग पर अड़े आंदोलनरत किसानों के साथ सरकार की 10वें दौर की वार्ता दिल्ली के विज्ञान भवन में खत्म हो गई है। बातचीत बेनतीजा रही है, लेकिन सरकार ने कृषि कानूनों को एक साल तक निलंबित करने का प्रस्ताव किया है, लेकिन किसानों ने इस पर विचार करने के लिए समय मांगा है। अगली बैठक 22 जनवरी को होगी। 

बता दें कि यह बैठक 19 जनवरी को होनी थी, लेकिन कुछ कारणों से इसे एक दिन के लिए मुल्तवी कर दिया गया था। बता दें कि 10वें दौर की बातचीत से पहले दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग बयान दिए गए, जिसके बाद इस बैठक में तनातनी का माहौल बन सकता है। 

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सुप्रीम कमेटी की किसानों से बातचीत कल
कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट से बनी कमेटी की किसानों के साथ बातचीत 21 जनवरी सुबह 11 बजे होगी। कमेटी के सदस्यों ने कहा कि वे किसी के पक्ष या सरकार के पक्ष में नहीं हैं, न ही किसानों से बातचीत में अपनी निजी राय हावी होने देंगे। यहां पूसा परिसर में मंगलवार को हुई कमेटी की पहली बैठक के बाद शेतकारी संगठन के प्रमुख अनिल घनवट ने मीडिया से बातचीत में कहा कि समिति 21 जनवरी को किसानों और अन्य हितधारकों से पहले चरण की वार्ता करेगी।

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बातचीत में अपनी निजी राय हावी नहीं होने देंगे- कमेटी
उन्होंने कहा कि समिति की सबसे बड़ी चुनौती प्रदर्शनकारी किसानों को बातचीत के लिए तैयार करने की होगी। हम इसका यथासंभव प्रयास करेंगे। घनवट ने कहा कि समिति केंद्र और राज्य सरकारों के अलावा किसानों और सभी अन्य हितधारकों की कृषि कानूनों पर राय जानना चाहती है। घनवट के मुताबिक कमेटी उन सभी से राय लेगी जो इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं अथवा समर्थन कर रहे हैं। इसके अलावा सरकार से कहेंगे वह भी अपना पक्ष कमेटी के समक्ष रखे। घनवट ने बताया कि कमेटी जल्द ही एक वेबसाइट भी तैयार करने की कोशिश कर रही है, ताकि जो लोग कमेटी के समक्ष आकर अपनी बात कहने की स्थिति में नहीं हैं, वे वेबसाइट पर अपनी राय रख सकें।

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उन्होंने कहा कि समिति के सदस्य सुप्रीम कोर्ट में जमा करने के लिए रिपोर्ट तैयार करने के दौरान कृषि कानूनों पर अपनी निजी राय अलग से रखेंगे। मान के स्थान पर किसी अन्य को समिति में शामिल करने के सवाल पर घनवट ने कहा कि इसका गठन सुप्रीम कोर्ट ने किया है और वही तय करेगी कि किसे नियुक्त करना है। उन्होंने कहा कि समिति के समक्ष आने को अनिच्छुक उन प्रदर्शनकारी किसानों से हम कहना चाहते हैं कि न तो हम किसी के पक्ष में हैं और न ही सरकार की ओर से हैं। हम सभी सुप्रीम कोर्ट की ओर से हैं। प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों और विपक्ष द्वारा सदस्यों के सरकार के समर्थक होने के आरोपों पर घनवट ने कहा कि आप हमारे पास बातचीत के लिए आइए, हम आपकी सुनेंगे और आपकी राय को अदालत के सामने रखेंगे। हम सभी से बातचीत करने का अनुरोध करते हैं।

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करीब 54 दिनों से कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान दिल्ली की सीमाओं को घेरे बैठे हैं। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हैं, जिसकी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने 11 जनवरी को तीनों कानूनों के अमल पर रोक लगाने के साथ गतिरोध दूर करने को चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति में अनिल घनवट के अलावा कृषि विशेषज्ञ प्रमोद जोशी, अशोक गुलाटी और भूपिंदर सिंह मान को शामिल किया था। एक सदस्य भूपिंदर सिंह मान ने खुद को समिति से अलग कर लिया है। कमेटी के तीन सदस्यों ने हीअपन पहली बैठक की।

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सदस्य सिर्फ राय दे सकते है: कोर्ट
कृषि कानूनों पर बनी कमेटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है कि कमेटी के सदस्य जज नहीं हैं, वे केवल अपनी राय दे सकते हैं। फैसला तो जज ही लेंगे। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी कमेटी के सदस्यों पर उठ रहे सवाल और एक सदस्य भूपिंदर सिंह मान के खुद को कमेटी से अलग कर लेने पर की। एक मामले की सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश एसए बोबड़े ने कहा कि एक व्यक्ति सिर्फ इसलिए समिति का सदस्य होने योग्य नहीं है क्योंकि उसने कृषि कानूनों के पक्ष में पूर्व में अपने विचार रखे थे, यह तर्क उचित नहीं है। व्यक्ति के विचार बदल भी सकते हैं।

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किसानों से 10वें दौर की वार्ता आज
आंदोलनरत किसानों के साथ सरकार की 10वें दौर की वार्ता बुधवार दोपहर 2 बजे विज्ञान भवन में होगी। वैसे यह बैठक 19 को होनी थी, किन्हीं कारणों से इसे एक दिन के लिए इसेमुल्तवी कर दिया गया था। इससे पहले किसानों और सरकार के बीच 9वें दौर की वार्ता 15 जनवरी को हुई, जो बेनतीजा रही थी। किसान तीनों कानूनों को रद्द करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी सुरक्षा देने की अपनी मांग पर अड़े हुए हैं और सरकार कह रही है कि अब केवल संशोधन के विकल्पों पर ही बातचीत आगे बढ़ सकेगी। सरकार  कानूनों को वापस लेने या रद्द करने को तैयार नहीं।

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