Friday, Jun 18, 2021
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चौथे दौर में भी नहीं बनी बात, किसानों से सरकार की फिर होगी बात

  • Updated on 12/3/2020

नई दिल्ली/नवोदय टाइम्स/शेषमणि शुक्ल। नए कृषि कानूनों की मुखालफत कर रहे किसानों ने सरकार के साथ वार्ता के दौरान ऑफर किया गया न खाना खाया और ही चाय पी। उन्होंने सरकार को अपना रुख जता दिया कि वे क्या चाहते हैं। फिर भी सरकार यही कोशिश करती दिखी कि किसान तीनों कानूनों के प्रति अपना नजरिया बदलें। दोपहर 12 बजे से शुरू हुई वार्ता 7.30 घंटे तक चली। लेकिन इस दौर में भी बात, बात ही रही। कोई समाधान नहीं निकला। अब 5 दिसम्बर को फिर दोनों पक्ष बैठेंगे। दोपहर करीब 12 बजे विज्ञान भवन में शुरू हुई यह बैठक देर शाम तक चली। करीब 3 बजे टी ब्रेक हुआ। 

अपनी मांग पर अड़े किसानों ने नहीं खाया सरकार का खाना
लेकिन किसानों ने सरकार की ओर से पेशकश किया गया न खाना खाया और न ही चाय पी। बल्कि गुरुद्वारा बंगला साहब से आया खाना खाया और चाय पी। किसानों के इस रुख से मंत्रियों के माथे पर बल पड़ गया। बैठक में सरकार की ओर केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, रेल मंत्री पीयूष गोयल और वाणिज्य राज्यमंत्री सोम प्रकाश शामिल थे तो किसानों की ओर से करीब 40 यूनियनों के प्रतिनिधि थे।

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रात करीब 7.30 बजे बैठक खत्म हुई तो बाहर निकलते हुए कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने पत्रकारों को बताया कि किसानों की ओर से जो मांगें और आपत्तियां दी गईं, उन पर बिंदुवार वार्ता हुई। कई बिंदुओं पर सहमति बनी है। सरकार सकारात्मकता से उन पर विचार करने को तैयार है। बातचीत सौहाद्र्रपूर्ण माहौल में हुई। उन्होंने कहा कि किसानों की मंशानुसार मंडियों के बाहर ट्रेडर्स के रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था की जाएगी। आंदोलन खत्म करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि किसानों से इस पर अभी कोई बात नहीं हुई।

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किसान एमएसपी पर कानून चाहते हैं। उन्होंने फिर जोर दिया कि नए कानूनों पर किसानों को पूरी कानूनी सुरक्षा दी गई है। तोमर ने किसानों की जायज चिंता बताते हुए कहा कि एमएसपी है और एमएसपी रहेगा। सरकार ने इसमें कोई बदलाव नहीं किया, बल्कि और मजबूत करने का काम किया जाएगा। उन्होंने कहा कि विवाद की स्थिति में सिविल कोर्ट जाने की किसानों की मांग पर भी सरकार विचार करेगी। उन्होंने कहा कि अब अगले दौर की बैठक 5 दिसम्बर को 2 बजे से होगी, जिसमें बाकी मसलों पर चर्चा होगी।

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वहीं, बैठक के बाद नारेबाजी करते हुए सभा स्थल से बाहर आए किसान नेताओं ने कहा कि वार्ता में गतिरोध बना हुआ है। भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख राकेश टिकैत ने बताया कि सरकार सिर्फ संशोधन की बात कर रही है, जबकि हमारी मांग है कि पहले तीनों कानून वापस लिए जाएं। उन्होंने कहा कि अभी कई बिंदुओं पर बात होनी बाकी है, जिस पर शनिवार को फिर से दोनों पक्ष बैठेंगे। इसके पहले बैठक की शुरूआत में किसानों ने सरकार की मंशा अनुसार तीनों कानूनों पर अपनी आपत्तियां, सुझाव और मांगें लिखित में दी।

फिर बिंदुवार उस पर चर्चा शुरू हुई। इनमें से छह मांगें प्रमुख थीं, जिसे उन्होंने 2 दिसम्बर की वार्ता में भी रखी थी। उनकी सबसे प्रमुख मांग तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने और एमएसपी पर खरीद की गारंटी देने वाला कानून लाने और आंदोलनकारी किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने की थी। सूत्रों की मानें तो बैठक में सरकार किसी भी कानून को वापस लेने के पक्ष में नहीं दिखी।

वह लगातार किसानों को इन कानूनों की खूबियां बताते हुए समझाने और मनाने का प्रयास करती रही। खासकर एमएसपी में सरकार किसी भी तरह के बदलाव के मूड में नजर नहीं दिखी। हालांकि एपीएमसी एक्ट को थोड़ा सशक्त बनाने पर जरूर सरकार ने सहमति जताई। लेकिन कोई फैसला नहीं हुआ। लेकिन किसान अपनी मांग पर अड़े रहे। सूत्रों का कहना है कि बातचीत के दौरान माहौल कभी गरम, कभी नरम होता रहा। इस दौरान रेल मंत्री पीयूष गोयल केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बीच-बीच में फोन पर बात कर वार्ता का ब्योरा देते दिखे।  


किसानों ने रखी ये प्रमुख मांगें--
1-तीनों केंद्रीय कृषि कानून सरकार तत्काल वापस हों।
2-एमएसपी पर खरीद की गारंटी देने वाला कानून बने।
3-एमएसपी निर्धारण में स्वामीनाथन कमेटी फार्मला लागू हो।
4-पराली जलाने पर मुकदमा दर्ज करने का कानून रद्द हो।
5-खेती के लिए डीजल आधी कीमत पर मिले।
6-किसान नेताओं, एक्टिविस्टों पर दर्ज हुए मुकदमे वापस हों।

सरकार ने रखी यह बात-
1-सरकार हर बिंदु पर विचार के बाद जरूरत अनुसार संशोधन को तैयार।
2-एमएसपी है, एमएसपी रहेगी। जरूरत अनुसार और सशक्त किया जाएगा।
3-एपीएमसी एक्ट को और मजबूत करने के लिए सरकार हर प्रावधान लाएगी।
4-मंडियों के बाहर ट्रेडर्स के रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था बनाई जाएगी।
5-विवाद की स्थिति में सिविल कोर्ट जाने की मांग पर सरकार का सकारात्मक रुख।
6-एपीएमसी मंडियों और निजी मंडियों के लिये समान अवसर सुनिश्चित करने पर विचार होगा।

जजपा भी किसानों के पक्ष में उतरी 
हरियाणा में भाजपा की सहयोगी जननायक जनता पार्टी (जजपा) ने बृहस्पतिवार को कहा कि केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ ‘दिल्ली चलो’ मार्च में शामिल होने वाले किसानों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लिए जाने चाहिए। केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे कई किसानों के खिलाफ अंबाला, रोहतक, पानीपत और कैथल में दंगा करने, गैरकानूनी ढंग से एकत्र होने, सरकारी कर्मचारियों के काम में बांधा पहुंचाने, सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने तथा आपदा मोचन कानून की विभिन्न धाराओं का उल्लंघन करने के आरोप में मामले दर्ज किए गए हैं।  

जजपा नेता दिग्विजय चौटाला ने कहा कि ये मामले वापस लिए जाने की जरूरत है ताकि हालात खराब नहीं हों तथा किसानों एवं सरकार के बीच किसी तरह का अविश्वास नहीं पैदा हो। उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘‘हम मुख्यमंत्री एवं राज्य के गृह मंत्री से बातचीत करेंगे और उनसे कहेंगे कि किसानों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लिए जाएं ताकि हालात नहीं बिगड़ें और किसी तरह का अविश्वास नहीं पैदा हो।’’ 

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चौटाला ने यह भी कहा, ‘‘ इस मुद्दे पर हमारी पार्टी का रुख साफ है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना किसानों का संवैधानिक अधिकार है।’’ उल्लेखनीय है कि किसान आंदोलन के मुद्दे को लेकर जजपा को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। विपक्ष का कहना है कि जजपा को भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार से अलग हो जाना चहिए। 

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