डॉक्टरों की बड़ी कामयाबी, मृतक के अंगदान से पहली बार हुआ बच्ची का जन्म

  • Updated on 12/6/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। बिना गर्भाशय के मां बनने के सपने का वास्तविक रूप सामने आया है। चिकित्सीय इतिहास में पहली बार एक मृत अंगदाता से प्राप्त गर्भाशय का प्रत्यारोपण किए जाने के बाद एक महिला ने स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया है। शोधकर्ताओं ने बुधवार को यह जानकारी दी। यह गर्भाशय की समस्या की वजह से बच्चे को जन्म देने में अक्षम महिलाओं के लिए नई उम्मीद बनकर आया है।

‘लांसेट’ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार यह सफल ऑपरेशन सितंबर 2016 में ब्राजील के साओ पाउलो में किया गया। यह दर्शाता है कि प्रत्यारोपण व्यावहारिक हैं और गर्भाशय की समस्या की वजह से बच्चे को जन्म देने में अक्षम हजारों महिलाओं की मदद कर सकता है। मेडिकल जर्नल ने बताया कि बच्ची का जन्म दिसंबर 2017 में हुआ। हाल तक गर्भाशय की समस्या की शिकार महिलाओं के लिए बच्चों को गोद लेना या सरोगेट मां की सेवाएं लेना ही विकल्प था। जीवित दाता (डोनर) से प्राप्त गर्भाशय के जरिये बच्चे का सफलतापूर्वक जन्म कराने की पहली घटना 2014 में स्वीडन में हुई थी। इसके बाद से 10 और बच्चों का इस तरह से जन्म कराया गया है।  

सफलता : डॉक्टरर्स ने किया देश का पहला गर्भाशय प्रत्यारोपण

हालांकि, संभावित जीवित दाताओं की तुलना में प्रत्यारोपण की चाह रखने वाली महिलाओं की संख्या अधिक है।इसलिए चिकित्सक यह पता लगाना चाहते थे कि क्या किसी मृत महिला के गर्भाशय का इस्तेमाल करके इस प्रक्रिया को अंजाम दिया जा सकता है। बुधवार को इस सफलता की जानकारी दिए जाने से पहले अमेरिका, चेक गणराज्य और तुर्की में 10 प्रयास किए गए। बांझपन से 10 से 15 फीसदी दंपती प्रभावित होते हैं। इसमें से 500 महिलाओं में एक महिला गर्भाशय की समस्या से पीड़ित रहती है। साओ पाउलो विश्वविद्यालय के अस्पताल में पढ़ाने वाले चिकित्सक डानी एजेनबर्ग ने कहा, ‘‘हमारे नतीजे गर्भाशय की समस्या की वजह से संतान पैदा कर पाने में अक्षम महिलाओं के लिए नए विकल्प का सबूत प्रदान करते हैं।’’ उन्होंने इस प्रक्रिया को ‘चिकित्सीय इतिहास में मील का पत्थर’ बताया।

32 वर्षीय महिला दुर्लभ सिंड्रोम की वजह से बिना गर्भाशय के पैदा हुई थी। प्रत्यारोपण के चार महीने पहले उसमें इन-विट्रो निषेचन किया गया जिससे आठ निषेचित अंडे प्राप्त हुए। इन्हें फ्रीज करके संरक्षित रखा गया। गर्भाशय दान करने वाली महिला 45 साल की थी। उसकी मस्तिष्काघात की वजह से मृत्यु हुई थी। उसका गर्भाशय ऑपरेशन के जरिए निकाला गया और दूसरी महिला में प्रत्यारोपण किया गया। यह ऑपरेशन 10 घंटे से अधिक समय तक चला। ऑपरेशन करने वाले दल ने दाता के गर्भाशय को जिस महिला में उसका प्रतिरोपण किया गया उसकी धमनी, शिराओं, अस्थिरज्जु और वेजाइनल कैनाल से जोड़ा गया।

'अब बिना गर्भाशय के मां बनने का सपना होगा पूरा'

महिला का शरीर नए अंग को अस्वीकार नहीं कर दे इसके लिए उसे पांच अलग-अलग तरह की दवाएं दी गईं। पांच महीने बाद गर्भाशय ने अस्वीकार किए जाने का संकेत नहीं दिया। इस दौरान महिला का अल्ट्रासाउन्ड सामान्य रहा और महिला को नियमित रूप से माहवारी आती रही। सात महीने के बाद निषेचित अंडों का प्रत्यारोपण किया गया। दस दिन बाद चिकित्सकों ने खुशखबरी दी कि महिला गर्भवती है। गुर्दे में मामूली संक्रमण के अलावा 32 सप्ताह की गर्भावस्था के दौरान सबकुछ सामान्य रहा। करीब 36 सप्ताह के बाद ऑपरेशन के जरिये महिला ने एक बच्ची को जन्म दिया। जन्म के समय बच्ची का वजन ढाई किलोग्राम था। गुर्दे में संक्रमण का एंटीबायोटिक के जरिए इलाज किया गया।

तीन दिन बाद मां और बच्ची को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ र्फिटलिटी सोसाइटीज के अध्यक्ष रिचर्ड केनेडी ने इस घोषणा का स्वागत किया लेकिन इसको लेकर आगाह भी किया। उन्होंने कहा, ‘‘गर्भाशय का प्रत्यारोपण नई तकनीक है और इसे प्रयोगात्मक रूप में लिया जाना चाहिए’’।

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