Wednesday, Sep 18, 2019
flood in many states of india due to heavy rain fall and climate change

दरकते पहाड़, उफनती नदियां और 'भागते' लोग, मॉनसून का कहर या प्रकृति का रोष?

  • Updated on 8/20/2019

नई दिल्ली/ कामिनी बिष्ट। मॉनसून (Monsoon) के आते ही भारत में हर साल तबाही का मंजर देखने को मिलता है। बिहार, असम, महारष्ट्र, केरल, कर्नाटक, जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल इन राज्यों में मॉनसून सुहावने मौसम की याद दिलाने वाला नहीं है। यहां मानसून का मतलब है 'काल'। दरकते पहाड़ और उफनती नदियों ने यहां की खुशहाली को तबाह कर दिया है। सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है, वहीं लाखों को अपना घर छोड़ शरणार्थी बनना पड़ा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हर साल आने वाली इस बाढ़ का मुख्य कारण है क्लाइमेट चेंज। सवाल ये कि क्लाइमेट चेंज हो क्यों रहा है? जिसका सीधा सा जवाब है प्रकृति का बेतहाशा दोहन।

जो नदियां और पहाड़ किसी भी स्थान की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। जिनको मानव का दोस्त कहा जाता है वो ही काल बनकर सैकड़ों लोगों की जान ले रहे हैं। इसका मतबल है कि प्रकृति गुस्से में है। मानव ने प्रकृति का जिस प्रकार से बेहिसाब दोहन किया है उसका बदला तो वो लेगी ही। प्रकृति के दोहन से ही क्लाईमेट चेंज हो रहा है, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। परिणामस्वरूप बाढ़, सूखा, तबाही से लाखों लोगों का जीवन बर्बाद हो रहा है। कई स्थानों पर तो इतनी बारिश हो रही है कि बाढ़ आ रही है तो कहीं सूखा पड़ा है। मॉनसून में बारिश की अनियमितता ही असंख्य लोगों की तबाही का कारण है।

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दो प्रकार से हो रही तबाही मचाने वाली बारिश 

इस साल महाराष्ट्र में 161 प्रतिशत, तेलंगाना में 148 प्रतिशत, कर्नाटक में 128 प्रतिशत, गुजरात में 112 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बारिश दो प्रकार से हो रही है। पहले जितने दिन मॉनसून में बारिश होती थी उतने दिन नहीं हो रही है। मतलब अगर 20 दिन बारिश होती थी तो अब वो महज 10 दिन ही हो रही है। दूसरे प्रकार में बहुत कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होती है। ऐसे स्थान भी हैं जहां पूरे सीजन की बारिश महज 2-3 दिनों में ही हो गई। इस अनियमित बारिश ने पूरे देश में इन दिनों तांडव किया हुआ है।  

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विकास के नाम पर प्राकृतिक दोहन

इस समस्या से निपटने के लिए सरकार क्यों कोई कदम नहीं उठा रही? क्यों देश के नागरिक इसे लेकर जागरूक नहीं हो रहे। लगातार पेड़ काटे जा रहे है, पेड़ लगाने के नाम पर तो सरकार करोड़ों पड़ लगाने का दावा तो कर रही है लेकिन उनकी देखभाल का जिम्मा किसके हाथ है ये किसी को नहीं मालूम। विकास के नाम पर पहाड़ों को तोड़ा जा रहा है। जिसके कारण वो कमजोर हो रहे हैं और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। विकास के नाम पर हो रहे इस प्राकृतिक दोहन का ही परिणाम है कि देश हर साल मौत का तांडव देख रहा है।

क्या बाढ़ के पानी में तैरती लाशें देखने के बाद भी सरकार का कलेजा फट नहीं जाता? क्या सरकार को इससे निपटने के लिए पहले से ही तैयारियां नहीं करनी चाहिए? बाढ़ आने के बाद ही बचाव कार्य क्यों शुरू किया जाता है? क्या इसका मतलब ये समझा जाए कि सरकार को देशवासियों की बर्बादी से कोई फर्क नहीं पड़ता? 130 करोड़ में से कुछ हजार मर भी जाएं तो देश को क्या नुकसान होने वाला है क्या यही सोच है सरकार?

इस देश को तबाही से बचाना है तो बाढ़ से निपटने के लिए मॉनसून से पहले की तैयारी और बेहिसाब प्राकृतिक दोहन पर रोक लगानी होगी वरना इसके परिणाम भयावह होंगे।

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