Tuesday, Jun 22, 2021
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PAK संसद ने भी माना- हिंदुओं का हो रहा जबरन धर्मांतरण, कही ये बड़ी बात

  • Updated on 10/21/2020

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। पाकिस्तान (Pakistan) में अल्पसंख्यकों (Minorities) पर अत्याचार और धर्म परिवर्तन के मामले आए दिन तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। इन अत्याचारों को लबें समय से नजरअंदाज करती आ रही पाक संसद ने आखिरकार स्वीकार कर लिया है कि मौजूदा सरकार अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने में नाकाम साबित हुई है। 

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मामलों की जांच के लिए गठित समिति ने कही ये बात
दरअसल, सीनेटर अनवारुल हक काकर की अध्यक्षता में गठित समिति ने मामले का गहनता से अध्ययन किया। इसके अलावा समिति ने जमीनी स्तर पर भी कई इलाकों में जबरिया धर्म परिवर्तन मामलों के संबंध में दौरा किया। समिति ने पाया कि सिंध प्रांत में व्यापक पैमाने पर 'हदू लड़कियों' का जबरन धर्म परिवर्तन व अत्याचार की घटनाएं हो रही हैं। इसके अलावा अन्य इलाकों में भी ऐसी छोटी-मोटी घटनाएं सामने आती रहती हैं।

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समिति के अध्यक्ष काकर ने कहा
धर्म परिवर्तन व अत्याचार के इस मामले का खुलासा तब हुआ जब समिति के अध्यक्ष काकर ने सिंध प्रांत के इन इलाकों का दौरा करने के बाद अपने जांच निष्कर्ष को लेकर मीडिया से बात की। यहां उन्होंने साफ शब्दों में बताया कि सरकार ने जबरिया धर्म परिवर्तन के मामलों में किसी भी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की है। उन्होंने बताया कि मौजूदा सरकार पूरी तरह इन मामलों को रोकने में विफल साबित हुई है।

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ज्यादातर मामले धर्म परिवर्तन के
अपनी जांच के बारे में उन्होंने अधिक जानकारी देते हुए बताया कि, हमने जांच में पाया कि ज्यादातर मामले धर्म परिवर्तन के सामने आए हैं। सरकार ने घिरते देख कुछ एक मामलों में सफाई देते हुए कहा कि ये इसलिए किया गया ताकि इनके जीवन स्तर में सुधार लााय जा सके, जोकि एकगैर जिम्मेदाराना बयान मालूम होता है। सरकार के इस बयान पर समिति का कहना है कि ये सभी मामले धर्म परिवर्तन के ही हैं। आर्थिक सुधार या लालच देकर किया गया कार्य भी गैरकानूनी है जोकि जबरन धर्म परिवर्तन की श्रेणी में आता है।

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समिति ने दिया ये सुझाव
पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन के मामलों की जांच कर रही इस समिति ने सुझाव दिया है कि जिन-जिन इलाकों में 'हदू लड़कियों' का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है, वहां जिला प्रशासन को नियमों में परिवर्तन करना चाहिए। किसी भी लड़की के विवाह में उसके माता-पिता या संरक्षक की रजामंदी अनिवार्य है। समिति ने आगे कहा कि जिला प्रशासन इन मामलों में लड़कियों को सरल शब्दों में समझाना चाहिए कि जबरन और सहमति से की गई शादी में क्या अंतर है।

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