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former justice lokur says judiciary should decide that police should not encroach on rights rkdsnt

पूर्व जस्टिस लोकूर बोले- न्यायपालिका तय करे कि अधिकारों का अतिक्रमण न कर पाए पुलिस

  • Updated on 7/1/2020


नई दिल्ली/टीम डिजिटल। पुलिस ज्यादतियों के आरोपों के बीच उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मदन बी लोकूर ने मंगलवार को कहा कि न्यायपालिका को सतर्क रहते हुये यह सुनिश्चित करना होगा कि पुलिस प्रशासन जांच के मामले में अपने अधिकारों की सीमा नहीं लांधे और निष्पक्ष रूप से यह काम करे। उन्होंने कहा कि पत्रकारों के खिलाफ राष्ट्रद्रोह के मामले दायर करने के लिए इस कानून का दुरूपयोग हो रहा है। उन्होंने आगाह किया कि मजिस्ट्रेट की अदालत को आंख मूंद कर अभियोजन पर भरोसा नहीं करना चाहिए। 

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सेवानिवृत्त न्यायाधीश लोकूर एक लीगल न्यूज पोर्टल द्वारा ‘संदेशवाहक को निशाना बनाना: पत्रकारिता के अपराधीकरण का प्रभाव’’ विषय पर आयोजित वेबिनार को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जांच के समय और आरोप पत्र दाखिल करते वक्त कानूनों की गलत व्याख्या हो रही है और ऐसी स्थिति में न्यायपालिका को अधिक चौकन्ना रहने की आवश्यकता है और उसे आंख मूंद कर अभियोजन के कथन के आधार पर भरोसा नहीं करना चाहिए। 

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जस्टिस लोकूर ने तमिलनाडु के तूतीकोरिन में हिरासत में पिता पुत्र की मौत की घटना का जिक्र करते हुये कहा कि शुरू में पुलिस का कहना था कि उन्हें दिल की समस्या थी लेकिन अब पता चला कि कुछ साक्ष्य गायब कर दिये गये हैं। इस घटना में पिछले सप्ताह पुलिस ने पिता पुत्र की कथित रूप से पिटाई की थी जिसमें दोनों की मृत्यु हो गयी थी। उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेट आंख मूंद कर अभियोजन की बात पर भरोसा नहीं कर सकते और ऐसे मामलों में बहुत ही सावधानी और विवेक से काम करने की आवश्यकता है। 

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पत्रकारों के खिलाफ मामले दर्ज होने के संदर्भ मे उन्होंने कहा कि इस तरह की पृष्ठभूमि में पत्रकार कभी भी निष्पक्ष जांच के बारे में भरोसा नहीं कर सकते। शीर्ष अदालत द्वारा आवश्यक मामलों को निपटाए जाने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि ये बहुत लंबे समय से पता है। जमानत की अर्जी, संपत्ति गिराने का मामला आवश्यक मामले की श्रेणी में आता है। आवश्यक मामलों की एक लंबी फेहरिस्त और श्रेणी है। 

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