Thursday, Aug 16, 2018

IPS को उनकी हदें बताने की तैयारी, आला पुलिस अफसरों की तैनाती को गठित बोर्ड के ज्यादातर सदस्य IAS

  • Updated on 8/10/2018

देहरादून/ब्यूरो। आईपीएस अफसरों की तैनाती के लिए आनन-फानन में गठित किये गये सिविल सर्विसेज बोर्ड को राज्यपाल की मंजूरी मिल गयी है और यह अस्तित्व में आ गया है। दिलचस्प यह है कि पांच सदस्यीय बोर्ड में अध्यक्ष समेत इसके चार सदस्य आईएएस कॉडर के हैं। आईपीएस कॉडर से सिर्फ पुलिस महानिदेशक को इसका सदस्य बनाया गया है। शासन के इस निर्णय को हाल ही में एनएच 74 घोटाले में एसआईटी और इसके प्रभारी की कार्यशैली से नाराजगी के तौर पर देखा जा रहा है।

सिविल सर्विसेज बोर्ड का गठन वर्ष 2014 से लंबित था। आईपीएस अफसरों की तैनाती को लेकर शासन स्तर पर की जाने वाली मनमानी को रोकने के लिए इस बोर्ड के गठन का प्रस्ताव था। इस लिहाज से देखा जाए तो उत्तराखंड में आठ अगस्त को अस्तित्व में आए सिविल र्सविसेज बोर्ड का गठन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। पर यदि हम इसके ढांचे और गठन की टाइमिंग पर जाएं तो स्थिति अपने आप साफ हो जाती है।

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इस बोर्ड में अध्यक्ष समेत पांच सदस्य बनाये गये हैं। मुख्य सचिव को पदेन अध्यक्ष बनाया गया है। इसके अतिरिक्त वरिष्ठतम अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव कार्मिक, प्रमुख सचिव गृह और पुलिस महानिदेशक इसके सदस्य बनाये गये हैं। जाहिर है कि बोर्ड के चार सदस्य आईएएस होंगे तो मर्जी भी उनकी ही चलेगी। सिर्फ ढांचे को लेकर ही नहीं, बोर्ड के गठन की टाइमिंग को लेकर भी सवाल है। करीब एक साल से एनएच 74 घोटाले की जांच चल रही है।

जांच के लिए गठित एसआईटी का प्रभारी एसएसपी सदानंद दाते को बनाया गया है। दाते आईपीएस हैं। उन्होंने अपनी जांच में आईएएस कॉडर के दो अफसरों की भूमिका संदिग्ध पाई है। आईपीएस अफसर की इस जांच रिपोर्ट से आईएएस लॉबी में खलबली है। सिविल सर्विसेज बोर्ड के गठन को इसी खलबली का नतीजा माना जा रहा है।

सीओ भी निशाने पर

जांच को गठित एसआईटी के प्रभारी दाते हैं। परंतु मामले की विवेचना सीओ स्वतंत्र कुमार कर रहे हैं। अब तक की तफ्तीश में दोनों अफसरों का मिलाजुला प्रयास शामिल रहा है। दाते दिल्ली के लिए रिलीव होने वाले हैं। सीओ अपनी पुरानी भूमिका में रहेंगे। आरोपियों को सीओ की भी कार्यशैली पसंद नहीं है। संभव है कि बहुत जल्द आईओ की उनकी भूमिका से मुक्त कर दिया जाए।

 

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