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#HalfGirlfriend: विशुद्ध प्रेमकथा को क्यों बताया गया 'अश्लीलता' का उपन्यास

  • Updated on 8/21/2019

चेतन भगत के बहुचर्चित उपन्यास 'हाफ गर्लफ्रेंड' को रंगीन टाइटल वाला और अश्लील बताया गया। क्या होती है अश्लीलता? किस प्रकार की विषयवस्तु हमें अश्लील लगती है? ये इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने आसपास की चीजों में क्या देखते हैं। हमारी सोच किस प्रकार की है। बुरखे या घूंघट में रहने वाली महिलाओं का भी रेप हो रहा है और शॉर्ट ड्रेस पहनने वाली महिलाओं का भी। अगर अश्लीलता को किसी एक वस्तु या दृश्य या लेख से परिभाषित किया जा सकता तो अश्लीलता का पैमाने शायद थोड़ा सा सरल हो जाता। देश की राजधानी में एक विशुद्ध प्रेम कहानी को अश्लीलता का उपन्यास बता दिया गया और सब चुप हैं। क्यों?

यात्री सुविधाओं को लेकर नई दिल्ली स्टेशन पर  पैसेंजर सर्विसेज कमेटी के चेयरमैन रमेश चंद्र रत्न निरीक्षण कर रहे थे। तभी उनकी नजर प्लेटफार्म नंबर 16 स्थित बुक स्टॉल पर रखे चेतन भगत के उपन्यास हाफ गर्लफ्रेंड पर पड़ी। जिसको देख कर वो बिगड़ गए। 

उन्होंने साफ कहा कि स्टेशनों पर ऐसे रंगीन टाइटल की बुक को अनुमति नहीं दी जाएगी। इससे नए जनरेशन में गलत संदेश जाएगा। उन्होंने अधिकारियों से साफ कहा कि रेलवे स्टेशनों पर भारतीय संस्कृति, धार्मिक, साहित्यिक, खेल कूद संबंधी पुस्तकें होनी चाहिए। ऐसे रंगीन फोटो वाले कवर पेज व टाइटल वाली पुस्तकें नहीं चलेगी। 

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विशुद्ध प्रेमकथा या अश्लीलता का उपन्यास

चेतन भगत का उपन्यास 'हाफ गर्लफ्रेंड' एक ऐसी प्रेम कहानी पर आधारित है जिसमें प्रेम को वासना से परे पूजा बताया गया है। एक लड़की के प्यार में एक नौजवान अपनी जिंदगी का बहुमूल्य समय उसके इंतजार में निकाल देता है। उसकी खोज करता है। उसका तलाक हो जाने के बाद भी उससे शादी करने के लिए तैयार होता है। प्रेम में अपनी प्रिय से बिछड़ने का दुख क्या होता है इस उपन्यास में बताया गया है। एक ऐसी प्रेम कहानी जो प्रेरणा स्रोत है, उसे अश्लील बताने वाले की सोच किस प्रकार की होगी? ये कोई छोटी घटना नहीं है। ऐसे लोग हमारे देश में बड़े- बड़े पदों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

लगातार खबरों में बना हुआ उन्नाव रेप केस इसी प्रकार की सोच के लोगों के सत्ता में होने का प्रमाण है। राज्यसभा में पोक्सो एक्ट पर चर्चा के दौरान बीजेपी के एक सांसद को भी शिकायत थी कि टीवी और इंटरनेट आज कल मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता परोस रहे हैं। लोकतंत्र के मंदिर में ‘मुन्नी बदनाम हुई’ जैसे गाने पर कलाकारों की कला की इज्जत उतारी गई थी। सांसद महोदय के शब्द इतने खराब थे कि सदन में बैठी केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी जो पहले टीवी में काम कर चुकी हैं उनको उठना पड़ा। इस प्रकार के कई उदाहरण आए दिन देखने को मिल जाते हैं।

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अश्लील सोच को कैसे मिले सजा?

दरअसल, अश्लीलता किसी के पहनावे या किसी पुस्तक के टाइटल में नहीं, देखने वाली की सोच में होती है। जिनके दिलो-दिमाग में अश्लीलता होती है उनको अजनता की गुफा में बनी कलाकृतियों में भी अश्लीलता ही दिखाई देती है। वहीं जिसको कला की परख और पहचान होगी उसको उन्हीं कलाकृतियों में बनाने वाले की शिद्दत और हुनर नजर आएगा।

आज देश की अदालतों में हजारों रेप केस लड़े जा रहे हैं। अपराधियों को सजा भी मिल रही है, लेकिन इस प्रकार की सोच अगर रही तो अदालतों में इस प्रकार के केस आने का सिलसिला जारी रहेगा। हम अपराधी को सजा दे रहे है, लेकिन अश्लील सोच को समाज से दूर कोई अदालत कैसे करे? इसके लिए तो हर उस व्यक्ति को प्रयास करना होगा जो बिक्नी में रहने वाली महिला को भी उतना ही सम्मान देता हो जितना कि बुरखे या घूंघट में रहने वाली औरतों को देता है।  

दुर्भाग्य है इस देश का कि हमारे समाज में एक प्रेम के उपन्यास को अश्लील बताने वाले व्यक्ति की निंदा नहीं की जा रही। या किसी में इस प्रकार का बौद्धिक दृष्टिकोण या प्रेम और अश्लीलता में फर्क बताने की तार्किक क्षमता ही नहीं है?

लेखिका: कामिनी बिष्ट

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है। 

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