घोर अपमान से भी नहीं झुकी मायावती, ठंडी पड़ चुकी यूपी की राजनीति में फूंक रहीं हैं जान

  • Updated on 1/16/2019

नई दिल्ली/श्वेता यादव। पिछले कई सालों से भले ही दलित राजनीति में नए विकल्प देश के अलग-अलग कोने में उभरें हों लेकिन बीएसपी सुप्रीमो मायावती की जगह कोई नहीं ले पाया है। दलित राजनीति के नए चेहरे भी मायावती से सीधे टकराने से कतराते हैं फिर चाहे चंद्रशेखर आजाद हों या फिर जिग्नेश मेवानी। आज मायावती का जन्मदिन है। 

चर्चा में फिर एक बार

आज की तारीख में भले ही मायावती करारी हार का सामना करके विपक्ष में बैठी हों लेकिन राजनीतिक गलियारों में उनकी चर्चा के बगैर हर कहानी अधूरी ही रहती है। पिछले कुछ दिनों से आगामी चुनावों में सपा के साथ गठबंधन की बयार के साथ मायावती एक बार फिर चर्चा में हैं। 

मायावती 15 जनवरी 1956 को एक हिंदू दलित परिवार में पैदा हुई थीं। पिता प्रभु दास और माता रामरति देवी की 8 संतानों में से एक मायावती राजनीति में प्रवेश करने से पहले बीए, बीएड और लॉ की डिग्री के साथ दिल्ली में एक स्कूल में टीचिंग करती थीं।

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'मायावती किसी वेश्या से भी बदतर हैं'...

विरोधियों के निशाने पर हमेशा रहने वाली मायावती की यही सबसे बड़ी ताकत रही है कि वो कभी हार नहीं मानती हैं। सत्ता के शिखर पर पहुंचने के लिए अकेले मायावती ही नहीं उनके समर्थकों का सबसे बड़ा हाथ रहा है। अपने राजनीतिक जीवन के साथ-साथ निजी जीवन में भी कई तरह की कंट्रोवर्सी से घिरी रहीं हैं। माया के ऊपर हमेशा से ही भष्टाचार और आय से अधिक संपत्ती का आरोप लगता रहा है। साथ ही कई बार विपक्ष ने उनके ऊपर कई तरह के आक्षेप लगाएं लेकिन मायावती डरी नहीं और सियासी भूमिका को हमेशा की तरह मजबूत ही करती रहीं। बीजेपी के एक नेता ने मायावती के लिए यहां तक कह दिया था कि 'मायावती किसी वेश्या से भी बदतर हैं।'

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भारतीय राजनीति में एक 'अपवाद'

शुरुआती दिनों में कांशीराम ने इन्हें मेंटर के तौर पर सरंक्षण दिया लेकिन बाद में बसपा की कमान पूरी तौर पर सौंप दी। मायावती भारतीय राजनीति में महिलाओं की स्थिति में एक अपवाद के तौर पर हैं। कई बार उनके प्रधानमंत्री बनने के सपने को उपहास के तौर पर देखा जाता है लेकिन सच ये हैं कि शायद मजाक उड़ाने वालों के लिए इससे ज्यादा खौफनाक कुछ नहीं होगा कि दलितों की राजनीति करने वाली मायावती पीएम पद पर बैठ जाएं और यहीं खौफ मायावती की असली ताकत है। 

अपमान को भुला, लिया राजनीतिक कदम

जीत के लिए समर्थन से ज्यादा जोड़-तोड़ का भी साथ लेती रही हैं और इस क्रम में इस बार बरसों की कड़वाहट और दुश्मनी को भुलाकर मायावती समाजवादी पार्टी के साथ 2019 का चुनाव उत्तर प्रदेश में लड़ने वाली हैं। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी की दुश्मनी को डिफाइन करने वाला एकलौता कांड है गेस्टहाउस कांड जिसमें 1975 में मायावती के समर्थन वापसी के बाद जब मुलायम सरकार संकट में आ गई तो सत्ता में काबिज रहने के लिए जोड़तोड़ की राजनीति शुरू हुई। 

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नाराज सपा कार्यकर्ता और विधायकों ने लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्टहाउस पहुंच गए, जहां मायावती ठहरी हुईं थीं। कहा जाता है कि उस दिन गेस्ट हाउस के कमरे में बंद बसपा सुप्रीमो के साथ कुछ गुंडों ने बदसलूकी की। बसपा का कहना है कि सपा के लोगों ने उस वक्त मायावती के साथ धक्का मुक्की की और फिर मुकदमा भी लिखवाया गया जिसमें कहा गया कि वो लोग उन्हें जान से मारना चाहते थे। इसी कांड को गेस्टहाउस कांड कहा जाता है।

बेखौफ और बेबाक

मायावती ने निजी जीवन में भी बिना शादी के और परिवार की ना इच्छा रखते हुए राजनीतिक जीवन को ही सबकुछ समर्पित कर दिया। भारतीय रुढ़िवादी समाज में इस फैसले को किसी तरह भी देखा जा सकता है लेकिन सच ये है कि इस फैसले को लेने के लिए ताकत, हिम्मत और निडरता बहुत जरुरी है। उनके जीवन में विकल्प और भी हो सकते थे लेकिन राजनीतिक अकांक्षाएं सब पर भारी पड़ीं। 

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देखा है पीएम बनने का सपना

बहरहाल मायावती ने उस काली रात को भुलाकर मुलायम के पुत्र और पूर्व यूपी सीएम के साथ हाथ मिला लिया हैं और साथ चुनाव लड़ने जा रही हैं। सुगबुगाहट ये भी है कि मायावती को पीएम पद का उम्मदीवार घोषित किया जा सकता है। फिलहाल ये दूर की कौड़ी है और खबर में कितनी सच्चाई है इसके लिए वक्त का इंतेजार करना होगा। लेकिन एक बात तो साफ है एक अपवाद के तौर पर मायावती के राजनीतिक और निजी संघर्षों को झुठलाना और बेकार बताना बहुत बचकाना लगेगा। 

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