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जानें कौन हैं दुल्ला भट्टी जिनकी याद में मनाते हैं #HappyLohri

  • Updated on 1/13/2020

नई दिल्ली/अदिती सिंह। आज के समय में जहां लोगों में लोहड़ी (lohri) के त्यौहार को होटलों में जाकर मनाने का चलन बनता जा रहा हैं, वहीं पर भारत के इस पारंपरिक त्यौहार को असल में लोग अपने परिवार के सदस्यों के साथ मिल- बैठकर मनाने की परंपरा रही है। पंजाब (Punjab) में आम तौर पर में में घरों में गन्ने के रस व चावल की स्वादिष्ट खीर बनाने की परंपरा है इस त्यौहार के दिन। इस दौरान पूरा परिवार-रिश्तेदारों (Relatives) के साथ उत्सव मनाते और गाने गाते जिसे पंजाबी में बोलियां कहा जाता है और हंसी- ठिठोली करते हैं। लोहड़ी के गानों में पंजाब के एक नायक दुल्ला भट्टी का नाम बार-बार आता है।  

लो आ गई लोहड़ी वे, जानिए शुभ मुहूर्त और पर्व से जुड़ी कथा

लोहड़ी से जुड़ी है दुल्ला भट्टी की कहानी
आपको शायद ही लोहड़ी के त्यौहार के साथ जुड़ी हुई है ऐतिहासिक कहानी (Historic story) पता होगी जिससे हम दुल्ला भट्टी के नाम से जानते हैं। दुल्ला भट्टी के नाम का यह शख्स मुगल शासक अकबर के समय पंजाब में रहता था और उससे नायक की उपाधि से भी से भी सम्मानित किया गया है।

दुल्ला भट्टी का समय मुगलों की गुलामी का था। कहा जाता है कि उस समय लड़कियों को बेचने का व्यापार होता था जहां पर वह गुलामी कर अमीरों की सेवा करती थी। मुगलों के कारिंदों की गंदी  नजर गांव-मोहल्ले की लड़कियों पर रहती थी। सबसे अधिक अत्याचार हिंदुओं के परिवारों के साथ हो रहा था। कई ऐसी घटनाएं भी होती थी जिसमें शादी के मंडपों से हिंदू लड़कियों को उठाकर बेच दिया जाता था। गांव- समाज को मुगलों के इसी अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए आगे आते हैं नायक दुल्ला भट्टी। 

सुलतान बलाया साहिबां

ऐ की कीती कार,

गरम रजाइयां छोड़ के

तूं मिली संदल बार

तूं आख जबानी साहिबां

तैनू मारां कहरे तकरार

कौन थे दुल्ला भट्टी
दुल्ला भट्टी उस जमाने के रोबिन हुड थे। दुल्ला भट्टी एक नायक थे जो अमीरों और मुगलों के जमींदारों से सामान लूट कर गरीबों में बांटते थे। बागा बॉर्डर से लगभग 200 किलोमीटर दूर पाकिस्तान (Pakistan) के पंजाब में पिंडी भट्टियां है वहां पर रहते थे। दुल्ला भट्टी को बचपन से ही कष्टों और विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उनके जन्म के कुछ दिनों बाद ही उनके दादा संदल भट्टी और उनके पिता को मुगल बादशाह हुमायूं ने मरवा दिया था। दरअसल कारण यह था कि उनके दादा और पिताजी ने हुमायूं को कर देने से मना कर दिया था। इसका जिक्र आज भी मिर्जा साहिबा के किस्सों में आता है जो पंजाब के लोक- गीतों में आज भी प्रसिद्ध है।

पंजाबी लोक-गीत और भांगड़ा के बगैर अधूरा है लोहड़ी का त्यौहार

तेरा सांदल दादा मारया,

दित्ता बोरे विच पा,

मुगलां पुट्ठियां खालां ला के,

भरया नाल हवा


कराई थी लड़कियों की शादी
लोक कथाओं के अनुसार दुल्ला भट्टी ने दो लड़कियों की शादी कराई थी जिनकी जबरन शादी किसी अमीर के साथ कराया जा रहा था। लोक कथाओं के अनुसार हिंदू लड़कियों का नाम सुंदरी और मुंदरी था जिसको दुल्ला भट्टी ने उनके चाचा के चंगुल से छुड़वा कर दोनों लड़कियों का विवाह जंगल में करा दिया। दुल्ला भट्टी ने जंगल में लकड़ी को आग लगाकर दोनों विवाह कराया और खुद ही उनका कन्यादान कर दिया और साथ ही उन्होंने लड़कियों की झोली में शक्कर डाल कर उनको विदा किया।

दिल्लीवालों पर चढ़ा लोहड़ी का रंग, घर के साथ - साथ होटल में भी दिखा जश्न का इंतजाम

सुंदर मुंदरिये !
........हो तेरा कौन बेचारा,
.......हो दुल्ला भट्टी वाला,
......हो दुल्ले घी व्याही,
......हो सेर शक्कर आई,
.....हो कुड़ी दे बाझे पाई,
.....हो कुड़ी दा लाल पटारा,
.......हो

माना जाता है कि तभी से दुल्ला भट्टी को पंजाब समेेत पूरे उत्तर भारत में नायक और उद्धारक का दर्जा मिला। हर लोहड़ी में उन्हें याद किया जाता है। लोहड़ी के दौरान गाए जाने वाले कई गीतों में उनका नाम लेकर उन्हें याद किया जाता है और मुगलों के अत्याचार से हिंदू लड़कियों को बचाने के लिए आभार जताया जाता है।     

कई और कथाओं के साथ भी जोड़ी जाती है लोहड़ी
लोहड़ी का त्यौहार सिर्फ दुल्ला भट्टी ही नहीं भारत प्रांत के कई और लोक कथाओं के साथ जोड़ा जाता है कहा जाता है कि लोहड़ी का त्यौहार सती के त्याग के रुपए भी मनाया जाता है। कहा जाता है कि जब माता सती के पिता ने महादेव का तिरस्कार किया था तो इस दिन को उनके पश्चाताप के रूप में भी मनाया जाता है इस दिन लोहड़ी पर विवाहित लड़की के घर वालों को अपने घर बुलाकर उनका सम्मान किया जाता है और तोहफे दिए जाते हैं ।

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