Thursday, Jan 23, 2020
has pm modi shown the mirror to neighboring countries on the pretext of citizenship bill

क्या नागरिकता बिल के बहाने पीएम मोदी ने पड़ोसी देशों को दिखाया है आईना?

  • Updated on 12/12/2019

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। संसद (Parliament) से लेकर सड़कों तक नागरिकता संशोधन बिल (Citizenship Amendment Bill) पर जब हंगामा बरपा है तो कई सवाल जेहन में उठता है। हमें इतिहास के पन्ने को खंगालना होगा जब विभाजन की पीड़ा से देश को जूझना पड़ा। अविभाजित भारत (India) के लाखों लोगों का क्या दोष था जब उन्हें बंटवारे का सबसे बड़ा दंश झेलना पड़ा है। जब देश का बंटवारा 15 अगस्त 1947 को हुआ तो सबसे ज्यादा पीड़ा उसे ही झेलना पड़ा जिसे अपना घर-द्वार छोड़कर या तो भारत आना पड़ा या फिर पाकिस्तान (Pakistan) जाना पड़ा। आप कल्पना कीजिये कि आपका अच्छा-खासा भरा-पूरा परिवार है, घर-मकान है या यों कहिये कि भगवान का दिया हुआ सब कुछ है। लेकिन अचानक ऐसा दिन आता है जब आपके घर-परिवार को उजार दिया जाता है। 

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पलायन के कारणों पर खुलकर होनी चाहिये बहस 

आपसे कहा जाता है कि जल्द गांव-शहर खाली करों। आपके परिवार के साथ बदतमीजी की सारें हदें पार कर दी जाती है। तो ऐसे स्थिति में नागरिकता संशोधन बिल का विरोध कर रहे सभी भले मानुष से पूछा जाना चाहिये कि आप अगर ऐसे स्थिति में आज फंस जाते है तो आप को क्या करना चाहिये?  फिर आपको कहा जाएं कि धर्म परिवर्तन करों, मंदिर जाना बंद करो, गुरुद्वारा जाना बंद करो, गिरिजाघर जाना बंद करो, घर की बहू-बेटियों का इज्जत लूटने की घटना हो तो आप अपने दिल पर पत्थर रखकर कहिये कि आप क्या पलायन नहीं करेंगे?

public against citizenship bill 2019

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रात के अंधियारे में घर छोड़कर लोग सीमा लांघे

फिर भारी मन से अपनी बची जिंदगी बचाने, अपने परिवार का इज्जत बचाने अपने पूर्वजों के बसाये आलीशान मकान हो या छोटा सा घर हो उसे त्यागकर रात के अंधेरे में आंखों में आंसू लिये हुए छुप-छिपाते हुए सरहद पारकर भारत आने को अन्ततः आप मजबूर हो ही जाते है। फिर दशकों तक शरणार्थी बनकर इस शहर से उस शहर कभी रेल के पटरियों के बगल में अपना जीवन-यापन करते है।

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अपने पुश्तैनी घरों को छोड़ना नहीं होता है आसान फैसला

आप जब कभी सोते है तो सपने में अपने उस घर को याद करते है जहां आपके पुरखे वर्षों से रहे थे, कल तक जिस घर में किलकारियां गूंजती थी वो आज भारत के शहरों में धक्का खाने को मजबूर होते है। जहां आपका जन्म होता है वहां से हर किसी की यादें जुड़ी रहती है। वैसे भी आप यदि किसी शहर में साल भर भी गुजार लें तो उसे छोड़ने में आपको थोड़ी-सी पीड़ा हो ही जाती है। लेकिन जहां आप का संसार बसता है उसे छोड़कर जाना आसान नहीं होता है। लेकिन क्या करें मजबूरी में ही कोई नए ठौर-ठिकाना की खोज में अपना घर,शहर या देश छोड़कर जाता है। 

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देश के अल्पसंख्यकों को नहीं है कोई खतरा
आप आते है इस नागरिकता संशोधन बिल पर जिसे मोदी सरकार ने बहुत ही दृढ़ता से लागू करने का फैसला किया है। सवाल है कि हमारे देश में बिना भय और बिना भेदभाव के सभी अल्पसंख्यकों को यह संदेश हमारा संविधान ही देता है कि उसके साथ कभी-भी भेदभाव नहीं किया जाएगा। लेकिन इसके वाबजूद कुछ घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर समय तक देश में शांति काल ही रहा है। इसमें भी कोई शक नहीं है कि सरकार फिर चाहे केंद्र की हो या राज्य की हो वोटबैंक के चलते उनका उपयोग या दुरुपयोग करता रहा है।  पिछले 70 साल ही में जिस Article 14 की आड़ में नागरिकता बिल का विरोध किया जा रहा है उसमें ही समानता का अधिकार है तो फिर देश को जानने का हक है कि क्या सभी धर्मों के लोगों में समानता का कानून कितना लागू हो पाया?        

Muslim community oppose citizenship bill

पड़ोसी मुल्कों में होता रहा है अत्याचार
अब सवाल उठता है कि हमारे पड़ोसी देश-पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में क्या अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय नहीं होता था- इस पर कोई दो राय नहीं है, लगभग सभी विरोध करने वाले भी सहमत होंगे कि सच में इन तीनों देशों में अल्पसंख्यकों को जो अधिकार और उनके हितों की रक्षा वहां की सरकारों को करना चाहिये वो 1947 से आज तक पिछले 70 साल में  नहीं हुआ। 

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देश में खड़ी की जा रही है भ्रम की राजनीति
अगर मोदी सरकार ने अपने पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को पनाह 70 साल बाद दिया तो इससे देश के अल्पसंख्यकों के हितों की अनदेखी करते हुए केंद्र सरकार कोई फैसला लेती तो विरोध समझा जा सकता था। उसका विरोध होना भी चाहिये। लेकिन भ्रम की राजनीति करके देश में दीवार खड़ी करना कहां तक उचित है? दूसरी बात जब गृह मंत्री अमित शाह ने संसद के दोनों सदनों के माध्यम से देश को भरोसा दिया है कि पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के हितों की हर हाल में रक्षा की जाएगी तो विरोध में सड़कों पर उतरना कहीं न कहीं राजनीति की ओर ही इशारे कर रही है। जिससे सभी दलों को बचना चाहिये। सच तो यह है कि विरोध करना या समर्थन करना अगर तार्किक हो तो समझा जा सकता है। लेकिन अगर विरोध फैशन हो चला है और कुतर्क गढ़ कर देश के माहौल को खराब करने की साजिश रची जा रही है तो उसे खारिज करना ही बेहतर होगा।

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