Tuesday, Oct 26, 2021
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haveli which was once the first kachhari of delhi

हवेली जो कभी थी दिल्ली की पहली कचहरी

  • Updated on 9/17/2021

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। दिल्ली के हर पत्थर की अपनी अलग कहानी है लेकिन इन कहानियों में अकसर मुगलों, खिलजी, गुलाम, तुगलक, सुरी सहित अन्य मुस्लिम बादशाह ज्यादा प्रचलित हैं। या ये कहें कि अभी तक उन्हीं के इतिहास को संवारने पर ज्यादा ध्यान दिया गया, जिसके चलते हिंदू राजाओं की दिल्ली अंतिम सांसें गिनने लगी। ऐसी ही एक ऐतिहासिक कहानी दिल्ली के नजफगढ स्थित मित्राऊं गांव से भी जुडी है जोकि अपने बदहाली पर आंसू बहा रही है। बेहद खूबसूरत हवेली अब कूडाघर में तब्दील होती जा रही है। हम आपको आज बता रहे हैं दिल्ली की ऐसी हवेली के बारे में जिसे दिल्ली की पहली कचहरी अंग्रेजों ने बनाया।
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17वीं शताब्दी में मित्राऊं गांव में आकर बसे थे गहलोत 
मित्राऊं गांव में 17वीं शताब्दी में राजस्थान के भरतपुर से आकर गहलोत वंश के लोग बसे थे। इनकी अगुवाई गहलोत वंश के राजा दयाराम सिंह गहलोत किया करते थे। उस समय दिल्ली पर मुगल शासक मुहम्मदशाह रंगीला का राज हुआ करता था जोकि हर समय राग-रंग व भोग-विलास में मस्त रहता था। उसे अपनी प्रजा से कुछ लेना-देना भी नहीं था। वहीं अंग्रेज दिल्ली की सत्ता पर धीरे-धीरे अपने प्रभुत्व को स्थापित करने में लगे हुए थे। 

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साल 1842 में करवाया गया था हवेली का निर्माण
राजा दयाराम सिंह गहलोत ने दिल्ली के तीन सौ गांवों का ठेका उठाया हुआ था और वो इन गांवों से उगाही कर अंग्रेजों को दिया करते थे। राजा दयाराम सिंह गहलोत के छोटे बेटे लक्ष्मण सिंह गहलोत ने हवेली का निर्माण साल 1842 में करवाया था। जिसे अंग्रेजों ने बाद में दिल्ली की पहली कचहरी के रूप में परिवर्तित कर दिया और सुनवाई की जिम्मेदारी भी लक्ष्मण सिंह गहलोत को दे दी। आज भी गांवों के लोग कहते हैं कि लक्ष्मण सिंह इतने ताकतवर थे कि वो बैल पर सवारी किया करते थे। इसी कचहरी से दिल्ली के अलावा भरतपुर रियासत के अंतर्गत आने वाले गांवों के मामलातों का निपटारा किया जाता था। लेकिन वर्तमान में यह दोमंजिला बनी हवेली अब खंडहर में तब्दील हो गई है। गांव के लोग अब यहां कूडा फेंक रहे हैं। वहीं हवेली के वर्तमान वारिसों ने कहा कि उनके पास अब इतने पैसे नहीं बचे हैं कि वो जीर्णोद्धार करवा सकें। ऐसे में यदि समय रहते देखभाल नहीं कि गई तो गहलोत वंश के इतिहास से जुडी यह हवेली सच में कागज के पन्नों में मात्र दर्ज होकर रह जाएगी।


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हवेली में लगा दरवाजा गजनी से युद्ध में जीतकर लगवाया
बताया जाता है कि लक्ष्मण सिंह ने गजनी की लड़ाई में अंग्रेजों का साथ 250 घोड़े व 250 सिपाहियों के साथ दिया, इस लड़ाई को कर्नल चेम्सफोर्ड लीड कर रहा था। जीत के बाद लक्ष्मण सिंह अपने साथ गजनी के किले का दरवाजा ले आए थे और उसे हवेली के मुख्यद्वार पर लगवाया था जोकि देख-रेख के अभाव में जर्जर हो चुका है।
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गजट में भी किया गया था शामिल
बता दें कि इस ऐतिहासिक धरोहर को वर्ष 1911-12 के गजट में पेज नंबर 566-67 में भारत की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल किए जाने का लेखा-जोखा मिलता है। बावजूद इस कचहरी और हवेली पर ध्यान नहीं दिया गया जिससे यह खंडहर में तब्दील होती जा रही है।
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पास ही बनी है राजा दयाराम की छतरी
इस गांव को बसाने वाले राजा दयाराम की छतरी व समाधि स्थल हवेली के पास में ही बना हुआ है। जिसका जीर्णोद्धार उनके वारिसों ने साल 2010 में किया था। उनके वारिसों को यहां हवेलीवालान परिवार के नाम से जाना जाता है। हवेली में सुंदर नक्काशी की गई है और लोककथाओं को चित्रों के माध्यम से दर्शाया गया है।


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वीलेज टूरिम्ज में किया जा सकता है डेवलप
आजकल गांवों में हवेलियों को लेकर वीलेज टूरिज्म डेवलप करने पर काफी जोर दिया जा रहा है। इस हवेली के वारिसों का कहना है कि वो सरकार से गुुहार लगाते हैं कि इसका जीर्णोद्धार कर कम से कम इसे डेवलप कर दे ताकि लोग इस हवेली की सुंदरता व अगल-बगल के शांत माहौल को एंज्वाय कर पाएं।


 

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