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उत्तराखंड में स्थित इस मंदिर में शिव का छिपा एक ऐसा रहस्य जिससे हर कोई है अंजान

  • Updated on 8/13/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। उत्तराखंड (Uttrakhand) जिसे देव भूमि भी कहा जाता है। यहां आए दिन कई श्रृद्धालु भगवान के दर्शन के लिए आते है। लेकिन हिंदू धर्म में अधिकतर लोग भगवान शिव (Lord Shiv) को ज्यादा मानते हैं और इसी की वजह से लोग दूर-दूर से केदानाथ, बदरीनाथ और अमरनाथ यात्रा के लिए आते हैं। देवो के देव महादेव के भारत के अधिकतर राज्यों में वैसे तो कई धर्म स्थल हैं और उनमें से अधिकतर लोगों ने इसके दर्शन भी किए होंगे।

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2500 वर्ष पुराना है यह मंदिर

लेकिन उत्तराखंड में स्थित एक ऐसा धाम भी है जिसका नाम तो प्रसिद्ध है लेकिन इसका रहस्य कोई भी नहीं जानता है। जी हां, हम बात कर रहे है अलमोढ़ा से 35 किलोमीटर दूर स्थित जागेश्वर धाम की। बता दें कि, भगवान शिव का यह मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों (Jyotirling) में से एक है और यह मंदिर लगभग 2500 वर्ष पुराना है। उत्तराखंड में स्थित इस मंदिर का पौराणिक कथाओं (Mythological History) में भी उल्लेख किया गया है जिसका वर्णन शिव पुराण, लिंग पुराण और स्कंद पुराण में भी मिलता है।

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भगवान शिव और सप्तऋषियों ने की थी तपस्या

यहां तक कि ऐसा माना जाता है कि यही पर भगवान शिव और सप्तऋषियों ने अपनी तपस्या की शुरुआत की थी और इसी जगह से ही शिव रुपि लिंग को पुजा जाने लगा था। इस मंदिर की एक खास बात यह भी है कि इसे गौर से देखने पर इसकी बनावट बिल्कुल केदारनाथ मंदिर की तरह नजर आती है। यहां तक कि इस मंदिर (Temple) के अंदर करीब 124 ऐसे छोटे-छोटे मंदिर बने हुए हैं जो जागेश्वर धाम का परिचय देता है।

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आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी इस मंदिर की स्थापना

साथ ही इस मंदिर के पीछे से एक छोटी सी नदी भी बहती है जो इस मंदिर की खुबसूरती को और भी निखार देती है। उत्तराखंड स्थित इस मंदिर को लेकर एक और मान्यता जुड़ी हुई है जिसमें बताया गया है कि जब आदि गुरु शंकराचार्य केदारनाथ के लिए प्रस्थान करने वाले थे तो उससे पूर्व वह जागेश्वर धाम के दर्शन के लिए गए थे जहां उन्होंने कई मंदिरों को जीर्णोद्धार (Renovation) कर उनकी पुन: स्थापना की थी।

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