Tuesday, Jun 28, 2022
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हाई कोर्ट ने खारिज की Air India की विनिवेश प्रक्रिया को रद्द करने संबंधी स्वामी की याचिका

  • Updated on 1/6/2022

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एअर इंडिया की विनिवेश प्रक्रिया को रद्द करने का अनुरोध करने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका को बृहस्पतिवार को खारिज कर दिया। याचिका में आरोप लगाए गए थे कि एअर इंडिया के मूल्यांकन में सरकार द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली ‘‘ मनमानी,गैरकानूनी और जनहित के खिलाफ’’ थी।  मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने आदेश पारित किया। अदालत ने कहा कि विस्तृत आदेश अपलोड किया जाएगा।  

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पीठ ने कहा,‘‘ डॉ सुब्रमण्यम स्वामी हम इस मामले को खारिज कर रहे है...हम उपर्युक्त कारणों से इस रिट याचिका को खारिज कर रहे हैं।’’ भाजपा नेता ने एअर इंडिया विनिवेश प्रक्रिया के संबंध में अधिकारियों द्वारा की गयी किसी भी कार्रवाई या निर्णय या किसी भी प्रकार की मंजूरी, अनुमति या परमिट को रद्द करने का अनुरोध किया था। अदालत ने चार जनवरी को स्वामी के साथ ही सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता और टैलेस प्राइवेट लिमिटेड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे की दलीलों को सुना था और फैसला सुरक्षित रख लिया था।  

स्वामी ने अधिकारियों की भूमिका और काम के तरीके की जांच भी सीबीआई से कराने का अनुरोध किया था।  इस याचिका का केन्द्र और टैलेस प्राइवेट लिमिटेड के वकीलों ने विरोध किया था। गौरतलब है कि पिछले साल अक्टूबर में केंद्र ने एअर इंडिया और एअर इंडिया एक्सप्रेस के 100 प्रतिशत इक्विटी शेयरों के लिए टाटा संस कंपनी द्वारा की गई उच्चतम बोली के साथ ही जमीनी परिचालन देखने वाली कंपनी एआईएसएटीएस में सरकार की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी को स्वीकार कर लिया था। यह पिछले 20 वर्षों में पहला निजीकरण था। सरकार ने टाटा संस के साथ 25 अक्टूबर को राष्ट्रीय विमानन कंपनी एअर इंडिया की बिक्री के लिए 18,000 करोड़ रुपये के शेयर खरीद समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 

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सरकार ने टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस की इकाई टैलेस प्राइवेट लिमिटेड द्वारा 2,700 करोड़ रुपये का नकद भुगतान करने और एयरलाइन का 13,500 करोड़ रुपये कर्ज की भी जिम्मेदारी ले ली थी। टाटा समूह को एक आशय पत्र (एलओआई) जारी किया गया था जिसमें पुष्टि की गयी थी कि सरकार एयरलाइन में अपनी 100 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की इच्छा रखती है। टाटा ने स्पाइजेट के प्रायोजक अजय सिंह के नेतृत्व वाले संघ को इस नीलामी प्रक्रिया में पछाड़ दिया था। सरकार ने घाटे में चल रही एयर इंडिया के सौ फीसदी शेयर बेचने के लिए 12,906 करोड़ रुपए कीमत निर्धारित की थी। 

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स्वामी ने दलील दी थी कि स्पाइसजेट नीत एक संघ अन्य बोलीदाता के रूप में था, लेकिन मद्रास उच्च न्यायालय में एयरलाइन के खिलाफ दिवाला कार्यवाही चल रही है, इसलिए वह बोली लगाने की हकदार नहीं थी और इसलिए, प्रभावी रूप से केवल एक बोलीदाता था। उन्होंने कहा, ‘‘एअर इंडिया के मूल्यांकन में सरकार द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली मनमानी, अवैध, भ्रष्ट, दुर्भावना और जनहित के खिलाफ थी।’’ 

सॉलीसिटर जनरल ने तर्क दिया कि याचिका तीन गलत धारणाओं पर आधारित है और इस पर किसी विचार की आवश्यकता नहीं है।  उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के अनुसार, स्पाइसजेट दूसरी बोलीदाता थी, लेकिन तथ्य यह है कि एयरलाइन कभी भी उस संघ का हिस्सा नहीं थी जिसने बोली जमा की थी और उसके खिलाफ लंबित कार्यवाही की यहां कोई प्रासंगिकता नहीं है। उन्होंने कहा कि एअर इंडिया का विनिवेश केंद्र का एक नीतिगत निर्णय था, जो एयरलाइन को हो रहे भारी नुकसान को ध्यान में रखते हुए लिया गया था और सरकार ऐसा निर्णय लेने के लिए सक्षम थी। 

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साल्वे ने यह भी तर्क दिया कि याचिका में कुछ भी नहीं है और बोलियां पूरी हो गई हैं, शेयर समझौतों पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं और यह सब काफी समय से सार्वजनिक पटल पर है। उन्होंने कहा कि एयरलाइन व्यवसाय का प्रबंधन करना कठिन है और बहुत बड़े लेन-देन होते हैं और कहा कि यदि कोई व्यक्ति इस स्तर पर आता है और रिट याचिका के साथ चीजों को लंबित रखने की कोशिश करता है, तो कोई भी इसमें निवेश नहीं करेगा। स्वामी ने कहा कि वह विनिवेश की नीति का विरोध नहीं कर रहे हैं और उन्होंने हमेशा एक मुक्त बाजार के विचार में विश्वास किया है, लेकिन वह इस प्रक्रिया में ‘अनुचित, अवैधता, कदाचार और भ्रष्टाचार’ का मुद्दा उठा रहे हैं।

 

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